ब्रह्मपुर की भूमि पर ब्रह्मा के वंशज और युदुकुल के प्रणेता महाराज यदु का धाम

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  • सपने में राजर्षि यदु से मिला धाम की स्थापना का आदेश
  • कालीशंकर यादव ने लिया संकल्प, भूमि की व्यवस्था पूरी, प्रतिमा निर्माण शुरू

आचार्य संजय तिवारी

एक सपना आजकल बहुत चर्चा में है। लगभग दो महीने पहले यह स्वप्न आया कालीशंकर यादव को। सपने में आए ऋषि स्वरूप महाराज यदु ने आदेश दिया, जातीय संकटों से अलग यदुकुल की महत्ता को स्थापित करो। कालीशंकर वस्तुतः यादव समाज की राजनीति के लिए कार्य कर रहे थे, इस स्वप्न ने उनके उद्देश्य को और विराट कर दिया। गोरखपुर जिले के चौरी चौरा क्षेत्र के ब्रह्मपुर में भूमि की व्यवस्था के बाद कालीशंकर अब यदु महाराज की प्रतिमा के निर्माण में जुट गए हैं। ब्रह्मपुर में यदुधाम की स्थापना का कार्य तेजी पर है।

यह जानना जरूरी है कि महाराज यदु हैं कौन? महाभारत में यदुकुल की चर्चा से लगभग सभी परिचित हैं। महाराज यदु सृष्टि के आदि पुरुष भगवान ब्रह्मा के वंश से आते हैं। इन्हीं यदु से कौरव और पांडव वंश का विकास हुआ। अब यह भी दिलचस्प है कि कुल के मूल ब्रह्मा जी के नाम की भूमि ब्रह्मपुर में ही यदु धाम स्थापित हो रहा है। यदु वंश के यादव चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं, जिसकी शुरुआत राजा यदु से हुई, जो पौराणिक राजा ययाति के पुत्र थे, और यह वंश आगे चलकर कई शाखाओं जैसे वृष्णि, अंधक, हैहय आदि में बँट गया। इसी में भगवान श्रीकृष्ण, बलराम, नंद और वासुदेव जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व शामिल हैं। ऐतिहासिक रूप से देवगिरि के यादव शासकों (सेउना) ने भी इस वंश से संबंध होने का दावा किया है।

यदु वंश की प्रारंभिक वंशावली में पता चलता है कि ब्रह्मा के एक पुत्र चंद्रमा हैं। इनसे बुध , इनसे पुरुरवा , इनसे आयु , इनसे नहुष और नहुष से ययाति का जन्म होता है। ययाति के दो विवाह हुए। एक देवयानी से यदु और तुर्वसु, और दूसरी शर्मिष्ठा से द्रुहु, पुरु, अनु का जन्म हुआ। यदु (ययाति के ज्येष्ठ पुत्र) ने अपने वंश को अलग कर यदुवंश की स्थापना की। यदु के चार या पाँच पुत्र थे, जिनसे आगे वंश चला। उनमें एक सहस्त्रजित या हैहय हुए। इनके वंशज हैहयवंशी कहलाए, जिनमें शक्तिशाली कार्तवीर्यार्जुन हुए। क्रोष्टु या क्रोष्टा के वंशज आगे चलकर सात्वत के वंशज कहलाए। सात्वत के कई पुत्र थे जिनमें भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृक्ष, महाभोज, और अंधक हुए। वृष्णि के वंश में शूरसेन, वासुदेव (श्रीकृष्ण के पिता) और नन्द (श्रीकृष्ण के पालक पिता) हुए। अंधक वंश में श्रीकृष्ण की माता देवकी का जन्म हुआ। वृष्णि वंश में श्रीकृष्ण, बलराम, वसुदेव, नंद, सुभद्रा आदि हुए, जो द्वारका और मथुरा के प्रमुख केंद्र थे।

हैहय वंश में कार्तवीर्यार्जुन (सहस्त्रभुजा वाला अर्जुन) इसी वंश में हुए, जिन्होंने कई राज्यों पर शासन किया। मध्यकाल में देवगिरि पर शासन करने वाले यादव शासक भी यदु वंश से माने जाते हैं। यदु वंश एक विशाल और प्राचीन वंश है, जो कई शाखाओं में बँट गया, जिसमें श्रीकृष्ण का वृष्णि वंश और हैहय वंश प्रमुख हैं, और इन शाखाओं ने भारतीय इतिहास और संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब गोरखपुर में ब्रह्मा की पावन धरती पर विश्व की पहली भव्य महाराज यदु की मूर्ति और दिव्य  यदुधाम की स्थापना होने जा रही है। यह ऐतिहासिक कार्य श्रीकृष्ण धर्म ट्रस्ट के तत्वाधान में होगा। आगामी 15 जनवरी को इस भव्य स्थापना की विधिवत आधिकारिक घोषणा श्रीकृष्ण धर्म ट्रस्ट के अध्यक्ष कालीशंकर यदुवंशी एवं ट्रस्ट कमेटी के द्वारा की जाएगी।

इस संकल्प के सिद्धकर्ता कालीशंकर का कहना है कि  यदुधाम आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली महाराज यदु का वंशज होने की याद दिलाएगा, उन्हें स्वाभिमान और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देगा।  यदुधाम केवल एक मंदिर नहीं होगा, यह महाराज यदु के वंशजो के मन में जलती हुई उस लौ का प्रतीक होगा जो कहती है “हम अपने इतिहास को भूलेंगे नहीं, हम अपने आदर्शों को झुकने नहीं देंगे। महाराज यदु की भव्य मूर्ति हर यदुवंशी को रोज़ याद दिलाएगी कि हम वीरता, त्याग और धर्म की उस परंपरा के वंशज हैं, जिसने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और भगवान सहस्रबाहु अर्जुन को जन्म देने वाला यदुकुल दुनिया को दिया।अब समय आ गया है कि हम सब मिलकर अपने इस गौरव को एक स्थायी रूप दें ताकि हमारे बच्चे, हमारे नौजवान जब  यदुधाम में कदम रखें, तो उनमें नई ऊर्जा, नया आत्मविश्वास और समाज के लिए कुछ करने की अटूट प्रेरणा जागे। यह महायज्ञ किसी एक व्यक्ति या संस्था का नहीं, हर उस यदुवंशी का है जो अपने कुलदेव और अपने वंश पर गर्व करता है। श्रीकृष्ण धर्म ट्रस्ट सिर्फ माध्यम है असली शक्ति आप सबकी भावना, आपकी आस्था और आपका सहयोग है आगामी 15 जनवरी को श्री यदुधाम और महाराज यदु की इस भव्य स्थापना की विधिवत, आधिकारिक घोषणा की जाएगी। नए भारत में सनातन इतिहास की पुनर्स्थापना का यह नया अध्याय है।

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