झारखंड: चाईबासा सदर अस्पताल का हाल, मरीजों से जबरन लिखवाया जा रहा बॉन्ड

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  • “मरीज के लिए जो ख़ून ले कर आए हैं वो सुरक्षित है”

नया लुक ब्यूरो

रांची/ चाईबासा। ब्लड बैंक पर राज्य सरकार हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है, ताकि ज़रूरत पड़ने पर मरीजों को सुरक्षित और मानक गुणवत्ता वाला रक्त मिल सके। लेकिन हकीकत यह है कि खून चढ़ाने से पहले उसकी गुणवत्ता की उचित जाँच तक नहीं की जाती। चाईबासा सदर अस्पताल में मरीजों से ही जबरन एक स्वघोषित जिम्मेदारी पत्र लिखवाया जा रहा है कि वे जो रक्त लेकर आए हैं, वह पूरी तरह सुरक्षित है। यानी यदि किसी तरह की गड़बड़ी हो जाए तो उसकी ज़िम्मेदारी अस्पताल की नहीं, बल्कि मरीज की होगी! जब सरकार ब्लड बैंकों पर इतना खर्च कर रही है, तब खून की जांच और प्रमाण की जिम्मेदारी मरीजों पर क्यों डाली जा रही है? जिन थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों और गंभीर मरीजों को सरकारी अस्पतालों से सहारा मिलना चाहिए, उन पर जोखिम का बोझ क्यों डाला जा रहा है?

ब्लड बैंक पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये का उपयोग आखिर हो कहां रहा है? यह आरोप सामने आने के बाद अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मरीजों ने आरोप लगाया कि ब्लड बैंक के कर्मचारियों द्वारा ऐसा पत्र लिखवाना असामान्य और बेहद डरावना है। परिजनों ने बताया कि अस्पताल में कामकाज के दौरान सामान्यतः एक मानक सहमति पत्र भरा जाता है, लेकिन हाल ही में जिस प्रकार का शपथ-पत्र लिखवाया जा रहा है, वह पूरी तरह अलग और गैर-जरूरी लग रहा है। एक मरीज के परिजन ने बताया कि हम तो खून लेने आते हैं ताकि मरीज बच सके। लेकिन यहां तो पहले हमें ही जिम्मेदार ठहरा दिया जा रहा है। अस्पताल में इलाज होने के बावजूद हर जोखिम हम पर क्यों डाला जा रहा है?

थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों में HIV पॉजिटिव पाए जाने के बाद बढ़ी हलचल

मामला तब और गंभीर हो गया जब कुछ सप्ताह पहले चाईबासा के ही पांच थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद उनके एचआईवी पॉजिटिव पाए जाने की बात सामने आई। यह खबर फैलते ही जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठने लगे। इसी घटना के बाद से ब्लड बैंक में रक्त की भारी कमी बनी हुई है और परिजन भय के कारण भी रक्तदान से बचने लगे हैं। परिजनों का कहना है कि अस्पताल के कर्मचारी उन्हें बार-बार जमशेदपुर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल से रक्त लाने के लिए कह रहे हैं।

कई बार कर्मचारी खुद एमजीएम जाकर यूनिट लेकर आते हैं, लेकिन इसके बाद भी परिजनों से एक ऐसी चिट्ठी लिखवाई जाती है जिसमें यह उल्लेख करना होता है कि हमने रक्त स्वयं लाया है और किसी भी अनहोनी की स्थिति में जिम्मेदारी हमारी होगी।मरीजों का कहना है कि यह प्रक्रिया न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि अस्पताल की स्वयं की जवाबदेही से बचने का तरीका भी प्रतीत होता है। क्या कहता है अस्पताल प्रबंधन इस मामले में अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि जब मरीज किसी बाहरी ब्लड बैंक से रक्त लाते हैं, तो सुरक्षा कारणों से इस तरह एक अलग प्रकार का सहमति पत्र लिया जाता है। प्रबंधन का कहना है कि यह एक सामान्य प्रक्रिया है। बाहर से आए रक्त के लिए मरीज पक्ष से सहमति लेना आवश्यक होता है। हालांकि, परिजनों का दावा है कि शपथ-पत्र में उपयोग की गई भाषा अत्यंत कठोर और भय पैदा करने वाली है।

ब्लड बैंक में अनियमितताओं के आरोप पुराने नहीं हैं। चाईबासा ब्लड बैंक में अनियमितताओं के आरोप पहले भी सामने आते रहे हैं। कभी रक्त की कमी, कभी समय पर टेस्टिंग न होने की शिकायत तो कभी कर्मचारियों के व्यवहार पर सवाल उठाए जाते हैं। हाल की घटनाओं ने इन आशंकाओं को और मजबूत कर दिया है। शहर के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस पर चिंता व्यक्त की है और सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह रक्त प्रबंधन प्रणाली की मांग की है। परिजनों ने कहा कि ब्लड बैंक में हमेशा पर्याप्त रक्त की उपलब्धता रहे, रक्त की गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया पारदर्शी हो, किसी भी यूनिट के लिए कठोर जिम्मेदारी मरीजों पर न थोपी जाए, स्वास्थ्य विभाग इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच करे। घटना के बाद जिला स्वास्थ्य विभाग भी सतर्क हो गया है, और सूत्रों के अनुसार मामले की प्रारंभिक रिपोर्ट मांगी गई है।

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