- सरकारी जमीन पर बसा दी कॉलोनी, नाम दिया- मन्नत और पैराडाइज
- लखनऊ-बाराबंकी रोड पर शालीमार के दो आलीशान कॉलोनियां हुई सीज
- अरबों की सरकारी जमीन पर बनी कॉलोनी को प्रशासन ने बताया अवैध
- प्रशासन ने शालीमार पैराडाइज और मन्नत अपार्टमेंट को किया सील
प्रशांत पाल सूर्यवंशी
लखनऊ। यदि आप भी लखनऊ में अपने सपनों का आशियाना बनाना चाहते हैं तो एक बार नहीं कई बार जांच पड़ताल कर लीजिए। लखनऊ और बाराबंकी के आसपास कई ऐसे फ्रॉड बिल्डरों का जमावड़ा बस गया है तो एक जमीन को कई-कई लोगों को बेच दे रहे हैं। इसी कड़ी में नया नाम जुड़ा है, शालीमार वालों का। हालांकि शालीमार बिल्डर्स की विश्वसनीयता कुछ इस तरह थी कि लोग उसके नाम पर जमीन खरीद लेते थे। लेकिन इस बार प्रशासन ने शालीमार की दो बड़ी कॉलोनी (शालीमार मन्नत और शालीमार पैराडाइज) को सील कर दिया है। मुकदमे की जानकारी होने पर हाईवे किनारे बने ‘मन्नत’ और ‘शालीमार पैराडाइज़’ अपार्टमेंट में रह रहे सैकड़ों लोगों में हड़कंप मचा हुआ है।
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खबरों के मुताबिक लखनऊ-अयोध्या हाईवे (NH-27) के किनारे अरबों की सरकारी जमीन पर अवैध कब्ज़ा और कॉलोनी निर्माण के सनसनीखेज़ मामले ने प्रशासनिक हलकों में हड़कम्प मचा दिया है। जानकारी के अनुसार बिल्डर्स ने फर्जी दस्तावेज़ तैयार कर कीमती सरकारी भूमि पर कॉलोनी बसाई और उसे “शालीमार पैराडाइज” और “मन्नत अपार्टमेंट” जैसे नाम देकर लोगों को बेच दिया। सूत्रों का कहना है कि प्रशासन स्तर पर शालीमार ने एक मोटी रकम ‘बड़े साहब’ को दी है, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने दूध का दूध पानी का पानी कर दिया और बड़े साहब के आदेश की हवा निकाल दी। जिलाधिकारी के निर्देश पर लेखपाल ने जांच कर सात लोगों पर धोखाधड़ी समेत कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज कराया है।
जगजीवन दास सतनाम सेवा संस्थान के शिकायती पत्र पर कार्रवाई हुई है। लोगों का कहना है कि इसी पत्र ने बाराबंकी नवाबगंज सदर तहसील क्षेत्र के कमरपुर, सरायं अकबराबाद और मोहम्मदपुर गांव में बेशकीमती जमीन जो कि सरकारी दस्तावेजों में सीलिंग के नाम दर्ज बताया। उसने कहा कि लखनऊ अयोध्या हाईवे किनारे बाराबंकी शहर से सटे बेशकीमती अरबों की सरकारी जमीन बिल्डर्स माफियाओं ने मोहम्मदपुर पुलिस चौकी के निकट कूटरचित दस्तावेज तैयार कर मल्टीस्टोरी रेजिडेंशियल कॉलोनी बसा दी। उसी कड़ी में जालसाजों ने शालीमार को भी शामिल करा दिया। शालीमार मन्नत अपार्टमेंट, शालीमार पैराडाइज़ समेत अन्य जिन लोगों को बैनामा किया है, उसमें अधिकांश लोग पॉश कॉलोनी के निवासी भी हो गए हैं।
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राजस्व न्यायालय के आदेश पर बाराबंकी जिला प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए शालीमार पैराडाइज प्रोजेक्ट को सील कर दिया है। इस कार्रवाई के बाद वहां रह रहे सैकड़ों लोगों में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों की मानें तो यह कार्रवाई सरकारी जमीन पर बने अवैध प्रोजेक्ट्स के खिलाफ चल रहे अभियान का हिस्सा है। इस पूरे प्रकरण ने लखनऊ-बाराबंकी ‘रीयल-इस्टेट’ सेक्टर में हलचल पैदा कर दी है और कई अन्य प्रोजेक्ट्स की वैधता पर भी सवाल उठ गए हैं।
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क्या है पूरा मामला और कैसे हुआ भंडाफोड़
वर्ष 2001 में दायर मुकदमे में साल 2003 में अपर कलेक्ट्रेट की कोर्ट ने सीलिंग घोषित कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ जुलेखा खातून ने न्यायालय अपर आयुक्त फैजाबाद में अपील की थी। जिस पर कोर्ट ने एडीएम के आदेश को निरस्त करते हुए दोबारा जांच करने के आदेश दिए। सुनवाई पर एडीएम की अदालत ने 18 अगस्त 2011 को दोबारा सीलिंग घोषित कर दी। उसके बाद एक बार फिर कोर्ट अपर आयुक्त फैजाबाद अपील की, लेकिन इस दौरान जुलेखा खातून आदि ने सीलिंग की जमीन को कूटरचित दस्तावेज के आधार पर बेच दिया। शिकायत में बताया गया कि पैसार कोठी निवासी चौधरी मोहम्मद अजीमउद्दीन अशरफ, हमीदा बानों और जुलेखा खातून, जहानआरा शेर, मुनव्वर शेर की मृत्यु पूर्व में हो चुकी है। बचे खातेदार अंजुम फातिमा अशरफ और सईदा फातिमा अशरफ पुत्री चौधरी इमामुद्दीन अशरफ, फरोग शेर, अफरोज शेर अशरफ पुत्र मुनव्वर शेर जो जीवित है।
