मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव की मां के खिलाफ FIR दर्ज

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की समधन और भाजपा नेता अपर्णा यादव की मां अंबी बिष्ट समेत लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के पांच तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ जानकीपुरम की प्रियदर्शिनी भूखंड योजना में फर्जीवाड़े और भ्रष्टाचार के आरोप में FIR दर्ज कराई गई है। विजिलेंस विभाग ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए आपराधिक साजिश और अनियमितताओं की जांच के बाद कार्रवाई की है। जानकीपुरम क्षेत्र की प्रियदर्शिनी भूखंड योजना में भूखंडों के आवंटन को लेकर लंबे समय से अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। 23 नवंबर 2016 को राज्य सरकार ने LDA के तत्कालीन लिपिक मुक्तेश्वर नाथ ओझा के खिलाफ योजना में भूखंड आवंटन में परिवर्तन और पंजीकरण में गड़बड़ी के आरोपों पर खुली जांच के आदेश दिए थे। इस जांच के दौरान अधिकारियों द्वारा दस्तावेजों में हेराफेरी, फर्जी आवंटन और साजिश के पुख्ता सबूत सामने आए। विशेष रूप से, फॉरेंसिक जांच में अनियमित दस्तावेजों पर नामजद अधिकारियों के हस्ताक्षर की पुष्टि हुई, जिसकी वजह से योजना में करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ। विजिलेंस लखनऊ सेक्टर ने जांच के आधार पर FIR दर्ज कराई, जिसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट) और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।

FIR में मुख्य आरोपी के रूप में अंबी बिष्ट (तत्कालीन संपत्ति अधिकारी) का नाम प्रमुखता से है। उनके अलावा निम्नलिखित LDA अधिकारी भी नामजद हैं, वीरेंद्र सिंह (तत्कालीन अनुभाग अधिकारी), देवेंद्र सिंह राठौर (तत्कालीन उप सचिव), सुरेश विष्णु महादाणें (तत्कालीन वरिष्ठ कास्ट अकाउंटेंट), शैलेंद्र कुमार गुप्ता (तत्कालीन अवर वर्ग सहायक)। इन सभी पर आरोप है कि उन्होंने मिलीभगत से भूखंडों के आवंटन में हेराफेरी की, फर्जी दस्तावेज तैयार किए और योजना के नियमों का उल्लंघन कर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया। प्रियदर्शिनी योजना में यह अनियमितता 2010-2016 के बीच हुई मानी जा रही है, जब LDA के कई बड़े प्रोजेक्ट्स में पारदर्शिता पर सवाल उठे थे।

अंबी बिष्ट का संबंध समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव से समधन के रूप में जुड़ा है, जबकि उनकी बेटी अपर्णा यादव वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष हैं और भाजपा से जुड़ी हुई हैं। इस मामले ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, क्योंकि यह पुरानी समाजवादी सरकार के दौर की अनियमितताओं को फिर से उजागर कर रहा है। विपक्षी दल इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रहे हैं, जबकि शासन इसे पारदर्शिता की दिशा में कदम करार दे रहा है। विजिलेंस विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जांच में पाया गया कि आरोपी अधिकारियों ने जानबूझकर आवंटन प्रक्रिया में बदलाव किए, जिससे असली पात्र लाभार्थियों को नुकसान हुआ। फॉरेंसिक रिपोर्ट ने हस्ताक्षरों की वैधता साबित की, जो अब अदालती कार्रवाई का आधार बनेगी। विभाग ने कहा कि आगे की जांच में अन्य संभावित आरोपी भी सामने आ सकते हैं।

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