पड़ोसी देशों की अराजकता में भारतीय संविधान की ताकत का संदेश

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   अजय कुमार

“हमें अपने संविधान पर गर्व है… पड़ोसी देशों को देखिए, वहां क्या हो रहा है।” सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की यह टिप्पणी हाल ही में संविधान पीठ की सुनवाई में आई। यह वाक्य केवल एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था, बल्कि दक्षिण एशियाई लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति पर गहन चिंतन और चेतावनी भी था। गवई ने नेपाल और बांग्लादेश का हवाला देकर बताया कि जब संवैधानिक संस्थाएं कमजोर होती हैं, जब जनता का भरोसा व्यवस्था से उठता है, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल जाता है। भारत का संविधान आज इस मायने में सबसे बड़ी ढाल है कि उसने बार-बार हमें संकटों से निकालकर लोकतंत्र की नींव को मजबूत रखा।

नेपाल का उदाहरण सबके सामने है। बीते दिनों वहां की सड़कों पर जिस तरह का आक्रोश देखने को मिला, उसने पूरे दक्षिण एशिया का ध्यान खींचा। सोशल मीडिया पर बैन लगाने के सरकार के फैसले ने आग में घी का काम किया। युवा वर्ग, जिसे ‘जेन-जेड’ कहा जा रहा है, अब केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए नहीं बल्कि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता के खिलाफ आवाज उठा रहा है। संसद भवन तक भीड़ का पहुंचना, सुप्रीम कोर्ट परिसर में तोड़फोड़ और नेताओं के घरों पर हमले यह साबित करते हैं कि जनता का धैर्य टूट चुका है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन हिंसा थमी नहीं। सेना को कर्फ्यू लगाना पड़ा, फिर भी आंदोलन जारी है। नेपाल में यह अस्थिरता नई नहीं है। 2008 में जब राजशाही खत्म हुई, तो लगा था कि अब लोकतंत्र स्थिरता और विकास का रास्ता खोलेगा। लेकिन हकीकत उलट निकली। पिछले 17 वर्षों में वहां 14 सरकारें बदल चुकी हैं, कोई भी प्रधानमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। बार-बार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अधिकारों पर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारें गिराईं और बहाल कीं। संविधान, जो 2015 में लागू हुआ था, वह भी स्थिरता नहीं ला सका। परिणाम यह है कि जनता अब व्यवस्था से मोहभंग कर चुकी है और राजशाही की वापसी की मांग तक उठने लगी है।

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बांग्लादेश का परिदृश्य भी कुछ ऐसा ही है। हाल ही में प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी और वे कुछ समय के लिए भारत में शरण लेने आईं। यह उस देश की त्रासदी है जिसने 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्रता पाई थी और लोकतांत्रिक भविष्य की उम्मीद जगाई थी। लेकिन वहां लगातार सत्ता संघर्ष, विपक्षी दलों के बीच अविश्वास और चुनावी प्रक्रिया पर सवालों ने संस्थाओं को खोखला बना दिया। जनता का भरोसा टूटने का नतीजा यही होता है कि लोकतंत्र केवल औपचारिकता रह जाता है और सड़क पर हिंसा ही असली राजनीति बन जाती है। इन हालातों की तुलना में भारत का लोकतंत्र और संविधान सबसे मजबूत उदाहरण बनकर सामने आता है। भारत ने भी संकटों का सामना किया है। 1975 का आपातकाल हमारे लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला था। उस दौर में मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, मीडिया पर सेंसरशिप लगी और विपक्षी नेता जेल में ठूंस दिए गए। लेकिन वही संविधान, वही लोकतांत्रिक चेतना और वही जनता थी जिसने 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया। और जब जनता ने देखा कि नई सरकार उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही, तो 1980 में उन्होंने इंदिरा को फिर से बहुमत से सत्ता में वापस ला दिया। यही संविधान की खूबसूरती है कि वह न केवल नेताओं को उनकी सीमा दिखाता है, बल्कि जनता को भी सही रास्ता चुनने की ताकत देता है।

भारत की न्यायपालिका इस संविधान की सबसे बड़ी प्रहरी रही है। 1990 में मंडल कमीशन का मामला जब देशभर में हिंसा का कारण बना, तब सुप्रीम कोर्ट ने नौ जजों की पीठ बनाकर यह स्पष्ट किया कि आरक्षण पचास प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगा और ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर रखा जाएगा। इससे सामाजिक न्याय और समान अवसर का संतुलन बना रहा। 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद देश दंगों की आग में झुलस रहा था, तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धार्मिक आस्था भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकती। 2019 में आया फैसला संवैधानिक मर्यादा में रहा और देश ने बिना बड़े दंगे के उसे स्वीकार किया।इसी तरह 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फैसले रद्द कर दिए। यह संदेश गया कि राष्ट्रीय संपत्ति का गलत इस्तेमाल करने वाला कोई भी नेता कानून से ऊपर नहीं है। यही वह तंत्र है, जिसकी वजह से भारत में जनता का संविधान और न्यायपालिका पर भरोसा बना रहा, जबकि पड़ोसी देशों में यह भरोसा टूट गया।

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भारत का संघीय ढांचा भी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता का संतुलन किसी एक को तानाशाह बनने से रोकता है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता ने भी लोकतंत्र को सुरक्षित रखा। यही कारण है कि हर पांच साल में सत्ता बदलने का अधिकार जनता के हाथ में रहता है और कोई भी नेता खुद को अजेय मानने की गलती नहीं कर पाता।चीफ जस्टिस की टिप्पणी दरअसल हमें यही याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल सत्ता का खेल नहीं है, बल्कि यह जनता की ताकत का प्रतीक है। भारत ने हर संकट से संवैधानिक रास्ते से ही बाहर निकलने का सबक सीखा है। इमरजेंसी हो, मंडल हो, बाबरी मस्जिद का विवाद हो या घोटालों का दौर हर बार संविधान ने रास्ता दिखाया। नेपाल और बांग्लादेश के हालात भारत के लिए भी चेतावनी हैं। अगर कभी संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर हुई या नेताओं ने जनता का भरोसा तोड़ा, तो हालात बिगड़ सकते हैं। लेकिन अब तक भारत ने संविधान को ही सबसे बड़ा हथियार बनाया है। यही वजह है कि जब पड़ोसी देश अराजकता और अस्थिरता में झुलस रहे हैं, भारत का लोकतंत्र और संविधान मजबूती का प्रतीक बनकर सामने आता है।नेपाल का ‘जेन-जेड’ आंदोलन बता रहा है कि नई पीढ़ी अब पुरानी राजनीति और पुराने तौर-तरीकों को स्वीकार नहीं करेगी। लेकिन हिंसा और आगजनी समाधान नहीं है। भारत का अनुभव यह कहता है कि परिवर्तन का रास्ता केवल संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही निकलता है। जनता को अधिकार भी यही देता है और जिम्मेदारी का बोध भी यही कराता है।

मुख्य न्यायाधीश गवई की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ गर्व करने की बात नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए चेतावनी भी है। अगर हमने अपने संविधान और संस्थाओं की रक्षा नहीं की, तो हम भी उसी स्थिति में पहुंच सकते हैं, जहाँ आज नेपाल और बांग्लादेश खड़े हैं।भारत की उपलब्धि यही है कि संविधान को व्यवहार में उतारा गया है। यह किताब में बंद दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है जिसने 75 वर्षों से देश को दिशा दी है। इसी संविधान ने हमें लोकतंत्र के अंधेरों से बार-बार रोशनी की ओर पहुँचाया है। यही वजह है कि भारत आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में गर्व से खड़ा है, जबकि पड़ोसी देशों की स्थिति हमें यह याद दिलाती है कि अगर संविधान कमजोर हो, तो लोकतंत्र केवल एक छलावा बन जाता है।

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