देश के अंदरूनी हालात को समझ नहीं पाए ओली

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  • सिर्फ दो दिन में अर्श से फर्श पर आ गए ओली

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

काठमांडू। नेपालमें Gen-Z (1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी) के प्रदर्शन को क्रूरता से कुचलने की कोशिश के कारण केपी ओली पर दबाव बहुत बढ़ गया था। आखिरकार उन्हें पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। उनकी विदाई ने नेपाल के नेतृत्व और 2015 के संविधान के जरिये गठित हुई राजनीतिक व्यवस्था की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सत्ता पर काबिज त्रिकोण – CPN-UML के ओली, नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा और माओवादी प्रमुख प्रचंड नेपाली युवाओं के गुस्से का सबसे बड़ा निशाना हैं। युवाओं में राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही की कमी, कुशासन और भ्रष्टाचार को लेकर गहरी नाराजगी है। अगर संविधान के हिसाब से चला जाए, तो संसद भंग करने के पहले सारे विकल्पों को खंगालना होगा। इस हिसाब से मौजूदा संसद के भीतर से ही एक नई सरकार बनाई जा सकती है। हालांकि देश में जिस तरह का गुस्सा है, उसे देखते हुए लगता नहीं कि ऐसी कोई व्यवस्था जनता स्वीकार करेगी। यह भी चर्चा है कि सेना नेतृत्व संभाल सकती है। लेकिन यह तब की बात है, जब सारे विकल्प खत्म हो जाएं। इसके साथ कुछ पेचीदा मसले भी जुड़े हैं जैसे कि गृहयुद्ध का इतिहास और पूर्व माओवादी लड़ाके।

ओली सरकार नेपाली युवाओं की भावनाओं और हालात को समझ नहीं पाई। इसके पीछे तीन मुख्य वजह हैं। पहला, ओली सरकार का सोशल मीडिया पर अपनी आलोचना को बर्दाश्त न कर पाना। ओली कभी सोशल मीडिया के समर्थक नहीं रहे। अपने पहले कार्यकाल से ही वह सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर बंदिशें लगाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक साल पुराने आदेश का सहारा लिया। सरकार ने उन सभी सोशल मीडिया चैनलों को नोटिस जारी कर दिया, जो नेपाल में रजिस्टर्रड नहीं हैं। इनको एक हफ्ते का समय दिया गया। लेकिन, इस जल्दबाजी में सरकार यह नहीं समझ पाई कि इसके नतीजे क्या निकलेंगे। नेपाल के नेताओं और युवाओं के बीच आज साफ दूरी दिखाई देती है। सोशल मीडिया की वजह से नेपाली युवा अब कोरियाई, इंडोनेशियाई, जापानी और दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे देशों की संस्कृति से प्रभावित दिखता है। इसके अलावा, बड़ी तादाद में नेपाली युवा दूसरे देशों में रोजगार और पढ़ाई के लिए जाते हैं। उनके लिए भी सोशल मीडिया परिवार से जुड़े रहने का साधन है। सरकार इस मामले की संवेदनशीलता को समझ नहीं पाई।

नेपाल में मौजूदा संकट का अगला बड़ा कारण है भ्रष्टाचार। तकरीबन हर नेपाली नेता किसी न किसी तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहा है। भूटानी शरणार्थी घोटाला, गिरी बंधु टी एस्टेट स्कैंडल, कोऑपरेटिव फंड का दुरुपयोग, विजिट वीजा में वसूली और ऐसे ही तमाम दूसरे मामलों ने देश व सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। इसी के चलते Gen-Z आंदोलन में भ्रष्टाचार भी एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। युवाओं का आक्रोश राजनेताओं के बच्चों की ऐशो-आराम भरी जिंदगी को लेकर भी है। जो देश अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर जूझ रहा है और जहां हर दिन हजारों युवा नौकरी की तलाश में दूसरे मुल्कों का रुख करते हैं, वहां यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि ‘नेपो किड्स’ लग्जरी लाइफस्टाइल जिएं। एक अनुमान के मुताबिक, हर साल 8 लाख नेपाली काम की तलाश में अपना देश छोड़कर बाहर जाते हैं।

प्रदर्शन उग्र होने की तीसरी

वजह यह है कि नेपाली राजनेताओं ने क्षेत्र में बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों से कोई सबक नहीं लिया। श्रीलंका और बांग्लादेश का उदाहरण सामने है। आम लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनहीनता के चलते ताकतवर सरकारों को भी जाना पड़ा। नेपाल में भी यही हुआ। उच्च पदों पर बार-बार पुराने चेहरे लौटते रहे और विकास व सुधारों के मोर्चे पर कोई भी सरकार नतीजे नहीं दे सकी।

दुर्भाग्य की बात है कि राजशाही के पतन और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के बावजूद नेपाल का नेतृत्व अब तक पिछले दो जन आंदोलनों – 1990 और 2006 के उद्देश्यों को पूरा करने में नाकाम रहा है। जनता का बहुमत एक नए नेपाल के लिए था, जो प्रगतिशील, समावेशी और लोक केंद्रित हो। खूनी गृहयुद्ध के बाद शांति प्रक्रिया से जो कुछ हासिल हुआ था, आज वह भी खतरे में है, क्योंकि माओवादी नेता प्रचंड तक पर हमले हुए हैं। ओली सरकार ने यह कहकर बचने का प्रयास किया कि प्रदर्शन में बाहरी तत्व शामिल थे। Gen-Z ने भी माना कि विपक्षी दल के कुछ कार्यकर्ता और शरारती तत्व प्रदर्शन में घुस आए थे, खासकर संसद भवन के पास, लेकिन आम जनता को यही लगा कि सरकार हिंसा को सही ठहराने का बहाना तलाश रही है। Gen-Z पीछे हटने को तैयार नहीं है, काठमांडू और दूसरे शहरों में हालात नियंत्रण से बाहर जाते दिख रहे हैं।

ओली ने अपनी मुश्किलें

खुद भी बढ़ाईं। वह देश के अंदरूनी हालात को समझ नहीं पाए। SCO शिखर सम्मेलन और विक्ट्री परेड के लिए वह हाल में चीन गए थे, जहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने लिपुलेख का मुद्दा उठा दिया। इससे नई दिल्ली तक अच्छा संदेश नहीं गया। इस महीने के आखिर में होने वाली ओली की भारत यात्रा अचानक रद्द कर दी गई। अब रहा सवाल कि नेपाल में लोकतंत्र का भविष्य क्या होगा, तो इस पर कोई भी कदम बढ़ाने से पहले जनता का गुस्सा शांत होना जरूरी है।

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