दो टूक : यात्रा के सहारे क्या राहुल गांधी तय कर सकेंगे PM के पद की मंजिल

Rahul Gandhi 1

राजेश श्रीवास्तव

इन दिनों देश में प्रधानमंत्री मोदी से ज्यादा कांग्रेस नेता और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की चर्चा चहुंओर हो रही है। राहुल गांधी की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि इस बार उन्होंने संपूर्ण विपक्ष को अपने पीछे खड़ा करने में कामयाबी हासिल कर ली है । शायद पिछले दस वर्षों में यह पहला मौका है जब तेजस्वी, स्टालिन, अखिलेश सरीखो  सभी नेताओं ने उनकी बाह पकड़कर चलना स्वीकार कर लिया है। दरअसल राहुल गांधी ने जिस तरह चुनावी प्रकिया एसआईआर को तूल दिया और उस पर सड़क से संसद तक बहस खड़ी कर सरकार को घोरने की कोशिश की और पूरी विपक्षी नेताओं की महफिल को लूट लिया। राहुल गांधी एक बार फिर से बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकालने पहुंच चुके हैं। 16 दिन, 23 जिले, 1300 किमी का सफर तय करके राहुल गांधी एक बार फिर देश की जनता का मूड भांपने या फि यूं कहें कि मूड बदलने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल को लोकसभा चुनाव के समय भी निकाली गयी भारत जोड़ो यात्रा से खासा लाभ हुआ था और वह सीटों में परिवर्तित होते दिखा था। राहुल अपनी पिछली यात्राओं से उत्साहित होकर ही इस बार वह बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकाल रहे हैं।

अगर बात करे सासाराम की तो राहुल की यह यात्रा सासाराम से शुरू हो रही है क्यूंकि लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने इस क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया था। सासाराम शाहबाद के क्षेत्र में आता है यहाँ लोक सभा में एनडीए को भारी नुकसान हुआ था । यहाँ इंडिया गठबंधन का एक मज़बूत वोट वोट भी है, राहुल गांधी की कोशिश है की विधान सभा चुनाव में भी इस प्रदर्शन को दोहराया जाए। यह यात्रा इंडिया ब्लॉक के तहत विपक्षी ताकतों की एकता प्रदर्शित करने और 2025 बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल बनाने की रणनीति का हिस्सा है। राहुल की यात्रा रोहतास (सासाराम) से शुरू करना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुविचारित राजनीतिक और प्रतीकात्मक निर्णय है। यह कदम मतदाताओं के अधिकारों का मुद्दा उठाने, लोकतंत्र की रक्षा की बात करने, विपक्षी एकजुटता दिखाने, और बिहार की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ाव की भावना को प्रदर्शित करने की कोशिश है।

इस यात्रा का जो भी लाभ होगा वो बिहार में उनके गठबंधन को होगा। मुझे नहीं लगता है कि इससे तेजस्वी यादव को नुकसान होगा। भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस को लाभ हुआ। इसके बाद राहुल गांधी को यात्रा भाने लगी है। इसीलिए वो बिहार में ये यात्रा निकालने जा रहे हैं। लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने जो संविधान का नरेटिव गढ़ा उसका उसे फायदा हुआ। ये भाजपा भी मानती है भले वो इसे फॉल्स नरेटिव कहती है। अब वोट चोरी का नरेटिव गढ़ने की कोशिश है। ये एक नया नरेटिव राहुल बना रहे हैं। जो कि संविधान से ही जुड़ा हुआ है। मुझे लगता है कि चुनाव आयोग एसआईआर पर आगे बढ़ेगा और राहुल गांधी इस मुद्दे को आगे लेकर जाएंगे। रजानीति में अगर आप बदलाव चाहते हैं तो एक सकरात्मक नरेटिव के साथ आपको आना होगा। 1971 में इंदिरा ने गरीबी हटाओ का नारा दिया, जेपी आंदलोन के दौर में जेपी ने भावी इतिहास हमारा है का नारा दिया, अच्छे दिन का नारा भी ऐसा है। ये सभी पॉजिटिव नरेटिव थे। जबकि वोट चोरी पाजिटिव नेरेटिव नहीं लगता है। मेरा मानना है कि बदलाव के लिए पॉजिटिव नरेटिव काम करता है।

लेकिन जितना SIR  पर शोर दिल्ली में क्या उतना शोर बिहार में कहीं दिखाई दे रहा है, ये देखना होगा। आप यात्रा कर सकते हैं, लेकिन कांग्रेस की समस्या यह है कि कांग्रेस इस बात का मूल्याकंन नहीं कर पा रही है कि बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में उसका जनाधार क्यों खत्म हो गया। क्या चुनाव आयोग के विरुद्ध अभियान चालने से कांग्रेस पार्टी के वोटर वापस आ जाएंगे। जब जमीन पर मुद्दा ही नहीं उसे लेकर आप यात्रा कर रहे हैं। राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वो विपक्ष के गठबंधन का प्रधानमंत्री पद का दावेदार या यूं कहें कि वो विपक्षी गठबंधन के निर्विवाद नेता बनने के लिए बेचैन दिखने लगे हैं। इस मुद्दे को राहुल गांधी इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाले हैं। राहुल गांधी जो ठान लेते हैं वो करके दिखाते हैं भले ही उसका उन्हें ही नुकसान क्यों न हो जाए। जिस तरह से 2019 के चुनाव में मतदाताओं ने चौकीदार चोर है के नारे को नकारा था, उसे देखकर लगता है कि वोट चोर, गद्दी छोड़ का नारा भी उनके खिलाफ जा सकता है। इसलिए राहुल को फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।

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