देश से मेधा निकल गई तो कहीं का नहीं रहेगा अपना देश

देश को नहीं मिल रही तरुणाई की कीमत

देश की हालत चिंताजनक है। मेधावी युवा क्षुब्ध हैं। यह क्षोभ अब बहुत गहरा होता जा रहा। कोई प्रतियोगी परीक्षा कराना और परिणाम देना तक कठिन हो गया है। सरकारें अपने ही तंत्र से पराजित हैं। सुरक्षा अलग से डरा रही। महिला और युवा सुरक्षा का कुछ पता नहीं। चुनावी नारों की रवड़ियां अलग से दंश दे रहीं। मेधा की कोई इज्जत नहीं। नौकरशाही अपनी गैंडा की खाल लेकर अलग रौब में है। शिक्षा लक्ष्यहीन और अनुपयोगी दिख रही। परिवेश में जाति और मजहब का ही प्रभुत्व रह गया। ऐसे में भारत का विश्वगुरु बनाने का सपना दूर की कौड़ी लगने लगा है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के निजी प्रयासों के अलावा कहीं , किसी मोड़ से निजता छोड़ राष्ट्र प्रथम का संकल्प नहीं दिख रहा। प्रधान मंत्री तो चलते युद्धों के बीच भी जाकर शांति का प्रयास कर रहे लेकिन भारत के भीतर की राजनीति स्व से ऊपर नहीं उठ पा रही। भारत इस समय भयानक पलायन का दंश झेल रहे भारत की स्थिति बहुत चिंताजनक है।
यह तथ्य अनेक स्थानों और आंकड़ों से आ रहा है कि भारत से अभी तक करीब 5 करोड़ युवा और मेधावी देशवासी विदेश जा चुके हैं । जैसा घुटन भरा माहौल लगातार बनता जा रहा है , आरक्षण एवं सांप्रदायिक आग जिस तरह भड़क रही है , अब स्वाभाविक रूप से भारत से प्रतिभा और मेधा का पलायन बहुत तेजी से हो जाएगा । आप जानते ही हैं कि देश का व्यापार जगत बड़ा दूरदृष्टा होता है। भारत के ही कुछ विशेष लोग जब दुनिया के मंचों पर सनातन के खिलाफ कीचड़ उछाल कर अपनी राजनीति चमकाते हैं और देश के भीतर गलत नेरेटीव चलाकर राजनीति को भी विद्रूप करते हैं तो डर तो लगता है। काम करने वालों को अवसर नहीं लेकिन अयोग्य लोगों के लिए रेड कारपेट।
भविष्य को भांपकर भारत के बहुत बड़े उद्यमी हिंदुजा फैमिली लंदन जा बसी है । लक्ष्मी मित्तल भी काफी पहले निकल गए थे । बहुत से उद्योगपति दक्षिण अफ्रीका और कीनिया में कारोबार कर रहे हैं । अब मुकेश अडानी ने भी लंदन में एक महल खरीद लिया है । अडानी पहले ही विदेशों में अपना साम्राज्य फैला चुके हैं । देश के अच्छे चिकित्सक, अभियंता, विधिवेत्ता, टेक्नोक्रेट, बौद्धिक, चिंतक सभी के सभी एक घुटन का माहौल महसूस कर रहे। रील बना कर सोशल मीडिया पर ज्ञान देने और अनाप शनाप परोसने में जुटे कुछ लोग हो सकता है खुश हों लेकिन यह संतोष देने वाला नहीं है। वास्तविक मेधा को संरक्षण का कोई रोडमैप यहां दिख नहीं रहा। स्थिति चिंताजनक है।
ठीक भी है , जब राजनीति दिन रात अंबानी अडानी को कोसती रहेगी तो वे क्यों रहेंगे यहां ? बाकी काम आरक्षण दर आरक्षण और जाति जाति चिल्लाने वाले पूरा कर दिखाएंगे । आरक्षण वालों की नजर प्राइवेट सैक्टर पर पड़ चुकी है जो प्रतिभाओं का प्रयोग कर काफी पल्लवित हो रहा है । सरकारी सैक्टर को तो कामचोरी , लालफीताशाही, भाई भतीजावाद और 50% तक आरक्षण पहले ही बर्बाद कर चुके हैं ।
सार्वजनिक सैक्टर के अनेक प्रतिष्ठान बिकने के लिए बाज़ार में खड़े हैं । भेल जैसा महारत्न प्रतिष्ठान अंतिम सांसें गिन रहा है । इस सरकारी मकड़जाल ने अनेक स्टार्टअप बंद करा दिए हैं । यूनिकॉर्न कंपनियों की बारी कब आ जाए , कहना मुश्किल है । तो क्या राजनीति द्वारा पैदा किया जा रहा यह आत्मघाती माहौल देश के लिए शुभ है ? या फिर कुछ दशकों बाद हमारी तमाम प्रतिभाएं अमेरिका , ब्रिटेन , कनाडा और यूरोप के काम आएंगी ? दक्षिण में तमिलनाडु का उदाहरण देखिए । हालांकि उससे सबक लिया जा सकता है ।
तमिलनाडु में सत्ता हथियाने के लिए एमजीआर , करुणानिधि , जयललिता और अब स्टालिन ने आरक्षण को हथियार बना लिया । सुप्रीमकोर्ट ने निर्धारित किया है कि 50% से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता । लेकिन तमिलनाडु में 70% तक आरक्षण दिया गया है । बाकी बचे 30% में से अधिकांश ने उद्योग और व्यापार जगत अपना लिया । खैर ! कहने का मतलब है कि राजनीति आगे भी बहुत लम्बा खेलने के मंसूबे बना रही है । अब मुख्य मसला राजनीतिज्ञों के पार्टी हितों से जुड़ गया है । रोजगार अभी भी कम हैं । प्रतिभा सम्मान घटते जाने की संभावनाएं बहुत बढ़ गई हैं ।
अनेक लेखक और विचारक इस गभीरता से सरकार को अवगत करा रहे हैं लेकिन सिस्टम पर इसका कोई असर नहीं हो रहा।
जहां तक प्रतिभा पलायन की बात है यह पचास दशक पुरानी है , अब और भी तेजी आ गई है । यूं आजादी से पहले भी अविभाजित पंजाब से भारतीय विदेश गए , लेकिन उनका मकसद बिजनेस करना था । आजादी मिलने के बाद पंजाब और गुजरात से बड़ा पलायन हुआ । तीसरा राज्य केरल है , जहां के श्रमिक विदेश गए । बात आज की करें तो आज तो राजनीति नफ़रती और दमघोंटू हो गई है । ऊपर से आरक्षण और आने वाला जातीय विष ?
भला पढ़ा लिखा तरक्की को आमादा भारतीय युवा कहां रुकेगा ? पचड़े में पड़ने से बचकर युवा वर्ग बड़ी संख्या में विदेश भाग रहा है । मतलब ? भारत की तरुणाई भारत के काम न आई ? तो देश पर रहम खाओ राजनीति के पुरुषों ? राजनीति करो , पर हवस भरी दमघोंटू राजनीति से बाज आओ । मान लो , अन्यथा कल जब भावी पीढ़ी सवाल पूछेगी तो बहुत भारी पड़ेगा ? सारी हेकड़ी निकल जाएगी और देश से मेधा का समग्र पलायन हो चुका होगा ?

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