दो टूकः एक बार फिर योगी बन गए देश में मोदी से बड़ा चेहरा

राजेश श्रीवास्तव

वर्ष 2006 में खाद्य सुरक्षा कानून के तहत तत्कालीन केंद्र की मनमोहन सरकार ने एक कानून बनाया था कि दुकान खोलने वाले को अपनी दुकान से संबंधित जानकारी अपनी दुकान के बोर्ड पर डिस्पले करनी होगी और ऐसा न करने वाले को दस लाख रुपये का जुर्माना देना होगा। लेकिन इस कानून को तत्कालीन सरकार से लेकर अब तक कोई अमल में नहीं ला सका। तब मनमोहन को भी नहीं उम्मीद रही होगी कि उनके बनाये कानून को भाजपा सरकार का कोई मुख्यमंत्री अमल में लायेगा। देश भर के फायर ब्रांड और हिंदुत्व के अलंबरदार बने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दो दिन पहले इस आदेश को अमल में ला दिया और इसे सख्ती से लागू करने का आदेश दे दिया। इस आदेश के बाद खाली उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में घमासान मच गया है। और दिलचस्प तो यह है कि यह घमासान तब है जब इसे केवल कांवड मार्ग में लागू किया गया है अगर पूरे प्रदेश में लागू कर दिया जायेगा तो शायद सिर-फुटौव्वल की स्थिति आ जायेगी। उत्तर प्रदेश के बाद उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भी इसे लागू करने की आवाजें उठ रहीं है तो एनडीए के तीन सहयोगी दल इसे लेकर भाजपा पर दबाव बना रहे हंै और विरोध के स्वर बुलंद कर रहे हैं।

योगी आदित्यनाथ को ऐसे ही नहीं फायर ब्रांड कहा जाता है। पिछले लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद लगातार उनकी पार्टी के अंदर ही उनके विरुद्ध स्वर बुलंद हो रहे थे। कोई कह रहा था कि संगठन बड़ा है सरकार नहीं। कोई कह रहा था कि एक शख्स अपने नाम के आगे से डिप्टी हटा कर दूसरे के आगे से सीएम हटाना चाहता है। तो कोई केंद्र की नाराजगी बता रहा था लेकिन योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इशारे पर एक ऐसा दांव फेंका कि सभी विरोधी चित हो गये इतना ही नहीं पूरे देश में फिर योगी के समर्थन में आवाजें उठनी शुरू हो गयीं। योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मोदी के असली उत्तराधिकारी वहीं हैं और कोई नहीं। गौरतलब है कि कांवड़ यात्रा के मार्ग पर खाने पीने की दुकानों पर संचालक मालिक का नाम लिखने के योगी सरकार के आदेश पर सियासत तेज हो गई है। जहां विपक्ष इसे सामाजिक सौहर्द बिगाड़ने वाला फरमान बता रहा है। वहीं, सत्ता पक्ष इसे आस्था की शुचिता बनाए रखने वाला कदम बता रही है। पहले यह आदेश केवल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के लिए था, लेकिन बाद में इसे राज्यभर में लागू कर दिया गया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पूरे यूपी में कांवड़ मार्गों पर खाने पीने की दुकानों पर संचालक मालिक का नाम और पहचान लिखना होगा। ऐसा ही आदेश उत्तराखंड में हरिद्बार पुलिस प्रशासन ने भी जारी किया है। एक वर्ग चाहता है कि सिर्फ सावन में ही क्यों? सिर्फ कांवड़ियों के मार्ग पर ही क्यों? यह आदेश पूरे देश में और पूरे सालभर के लिए लागू किया जाना चाहिए। जब आप किसी होटल में जाते हैं तब क्या वहां काम करने वाले नाम का बिल्ला लगाए रहते हैं। पहचान बताने से क्या परहेज? जब पहचान छुपाकर कोई काम होता है तो दिक्कत है। यह नियम बहुत पहले से लागू है। यह नियम सालभर लागू होना चाहिए। पहचान छुपाकर कोई काम नहीं होना चाहिए। कांवड़ियों का जो खानपान है उसकी सुचिता बनाए रखने के लिए यह काम किया गया है। जिस होटल में जा रहे हैं वो शुद्ध शाकाहारी है की नहीं यह जानना उनकी सुचिता बनाए रखने के लिए जरूरी है। ये कहीं नहीं कहा गया है कांवड़िये कहां जाएंगे और कहां नहीं जाएंगे। मुझे लगता है कि यह आदेश ठीक है। कांवडियों को किसी तरह की तकलीफ नहीं हो भ्रम नहीं हो उसके लिए यह आदेश दिया गया है। माहौल खराब करने की कोशिश करने वाले पर भी नजर रखने के जरूरत है।

वैसे देखा जाये तो इस आदेश के तीन पहलू है। पहला धार्मिक, दूसरा कानून व्यवस्थ्था और तीसरा राजनीतिक पहलू। धार्मिक आधार पर यात्रा की सुचिता बनाए रखना सही है। लेकिन इस विवाद को खड़ा करने वाले राजनीतिक दलों की बात कहेंगे तो एनडीए के सहयोगियों ने भी इस पर सवाल उठाए हैं। योगी सरकार के इस फैसले पर विपक्ष के साथ ही एनडीए की प्रमुख सहयोगी जनता दल यूनाइटेड की प्रतिक्रिया आई। इस प्रतिक्रिया ने दिखाया कि योगी सरकार के फैसले से एनडीए में खटपट दिख रही है। यह पहली बार है जब किसी मुद्दे को लेकर एनडीए में सरकार गठन के बाद मतभेद दिखे। खास बात है कि यह खटपट भी केंद्र के फैसले से नहीं बल्कि एक राज्य सरकार के फैसले से दिख रही है।

बुल्डोजर बाबा के नाम से पूरी दुनिया में मशहूर हो चुके बीजेपी के सीएम महंत आदित्यनाथ से बीजेपी के छोटे पदाधिकारी भी नहीं मिल पाते हैं, ये भी एक कारण है कि जमीन पर चल रही कारगुजारियों का अंदाजा उन तक नहीं पहुंच पा रहा है।

अब सवाल है कि एनडीए का अगुआ दल होने के नाते बीजेपी इस मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। एनडीए के सहयोगी दल ही सरकार से आदेश वापस लिए जाने की मांग कर रहे हैं। जेडीयू के नेता केसी त्यागी ने कहा कि कांवड़ यात्रा मार्ग पर खाने-पीने की दुकानों पर मालिकों का नाम प्रदर्शित करने के आदेश को वापस लिया जाना चाहिए। त्यागी का कहना था कि इससे सांप्रदायिक तनाव फैल सकता है। त्यागी ने कहा कि धर्म और जाति के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। त्यागी ने कहा कि यह फरमान प्रधानमंत्री मोदी की ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ वाली अवधारणा के विरूद्ध है। इससे सांप्रदायिक विभाजन होता है।

केंद्रीय मंत्री और बीजेपी की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा कि वह जाति या धर्म के नाम पर भेद किए जाने का कभी भी समर्थन नहीं करेंगे। मैं बिलकुल सहमत नहीं हूं। चिराग ने कहा, उनका मानना है कि समाज में अमीर और गरीब दो श्रेणियों के लोग मौजूद हैं। विभिन्न जातियों एवं धर्मों के व्यक्ति इन दोनों ही श्रेणियों में आते हैं। रालोद की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष रामाशीष राय ने आदेश का विरोध करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश प्रशासन का दुकानदारों को दुकान पर अपना नाम और धर्म लिखने का निर्देश देना जाति और सम्प्रदाय को बढ़ावा देने वाला कदम है।

प्रशासन इसे वापस ले, यह असंवैधानिक निर्णय है। बिजनौर लोकसभा सीट से रालोद सांसद चंदन चौहान ने कहा कि ”गंगा-जमुनी तहजीब’ को बचा कर रखना चाहिए। हम सब चौधरी चरण सिह के अनुयायी हैं और उन्हीं के मार्ग पर चलेंगे। वो हमेशा धर्म और जाति व्यवस्था के खिलाफ थे। चौधरी चरण सिह कभी नहीं चाहते थे कि समाज धर्म और जाति के आधार पर बंटे। विरोध और समर्थन चाहे जो हों लेकिन इतना तय है कि इस फैसले ने योगी सरकार के कद को एक बार फिर बढ़ा दिया है।

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