उत्तर प्रदेश के सातवें चरण की बलिया लोकसभा का हाल बलिया से भाजपा लगा पाएगी जीत की हैट्रिक या सपा-बसपा का ब्राह्मण-यादव फैक्टर बनेगा रोड़ा

उत्तर प्रदेश की बलिया लोकसभा सीट पर 7वें और अंतिम चरण में 1 जून को वोट डाले जाएंगे. बलिया लोकसभा सीट समाजवादी नेता और भारत पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सियासी जमीन रही है. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर इस सीट से 8 बार चुनाव जीते थे. लगातार 6 बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यह सीट समाजवादी पार्टी के टिकट पर चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर के पास आ गई. लंबे समय से बलिया में जीत का बाट जोह रही बीजेपी को आखिरकार 2014में यहां से विजयश्री का आशीर्वाद मिला. मौजूदा समय में बीजेपी के वीरेंद्र सिह मस्त यहां से सांसद हैं. बीजेपी यहां से जीत की हैट्रिक लगाने की भरपूर कोशिश कर रही है तो समाजवादी पार्टी अपनी खोई हुई सीट को पाने के लिए ऐड़ी-चोटी के जोर लगा रही है.
बीजेपी ने इस बार बलिया से नीरज शेखर को उम्मीदवार बनाया है. समाजवादी पार्टी से सनातन पांडेय मैदान में हैं. बीएसपी से लल्लन सिह यादव सहित यहां कुल 13 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं. सनातन पांडेय साइकिल पर सवार होकर लगातार दूसरी बार अपने राजनीतिक भाग्य का फैसला करने के लिए चुनावी रण में आए हैं.
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के वीरेंद्र सिह मस्त ने सपा के सनातन पांडेय को 15,519 वोटों से हराया था. 2014 के चुनाव में मोदी लहर के आगे बलिया का किला भी ध्वस्त हो गया और बीजेपी के भारत सिह ने सपा के नीरज शेखर को 1.39 लाख वोटों से परास्त किया था.
बलिया पर लंबे समय तक समाजवादी नेता चंद्रशेखर का कब्जा था. उनके निधन के बाद 2007 में हुए उपचुनाव में उनके बेटे नीरज शेखर यहां से समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और जीत हासिल की. 2009 के चुनाव में भी नीरज शेखर सांसद चुने गए. लेकिन 2014 के चुनाव में मोदी लहर के आगे नीरज शेखर टिक नहीं पाए और भरत सिह मस्त के आगे पस्त हो गए. लोकसभा चुनाव हारने के बाद समाजवादी पार्टी ने नीरज शेखर को राज्यसभा भेज दिया. वर्ष 2019 में नीरज समाजवादी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. उसी दिन वो भाजपा से राज्य सभा के लिए चुने गए और वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं. बीजेपी ने उन्हें इस बार बलिया लोकसभा सीट से टिकट दिया है.
सरयू और गंगा नदी के बीच बागियों की धरती बलिया लोकसभा क्षेत्र में विधानसभा की 5 सीटें बलिया नगर, फ़ेफना, बैरिया, जहूराबाद और मोहम्मदाबाद आती हैं. इनमें तीन पर समाजवादी पार्टी, एक पर बीजेपी और एक सीट पर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का कब्जा है.
समाजवादी पार्टी ने बलिया से सनातन पांडेय को टिकट देकर ब्राह्मण वोटरों में सेंध लगाने का प्रयास किया है. उधर, बीएसपी ने लल्लन यादव को टिकट देकर सपा के परंपरागत यादव वोटरों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है. बलिया सीट पर सबसे अधिक करीब 3 लाख ब्राह्मण वोटर हैं. इसके बाद 2.5-2.5 लाख यादव, राजपूत और दलित आते हैं. मुस्लिम वोटर भी लगभग एक लाख हैं.
गंगा और सरयू नदी के किनारे बसा बलिया जिला बागी तेवर के साथ ही चुनावी राजनीति में अपना अलग स्थान रखता है। इस जिले के चित्तू पांडेय ने देश की आजादी से पहले 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पहली आजाद और समानांतर सरकार की स्थापना कर खुद को बलिया का मुख्य प्रशासक घोषित किया था।
धारा के उलट राजनीति करने वाले युवा तुर्क के नाम से मशहूर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी बलिया के ही लाल रहे। अपने राजनीतिक इतिहास के लिए मशहूर बलिया में पहले ही आम चुनाव में मतदाताओं ने बगावती तेवर दिखाते हुए पैराशूट कांग्रेस प्रत्याशी को खारिज कर निर्दलीय को संसद में भेजने का काम किया था। इसके बाद से अब तक चुने गए सांसदों का मिजाज ‘बगावती’ ही रहा है।
यहां 2019 के आम चुनाव में मजेदार चुनावी मुकाबला देखने को मिला था। कमल खिलाने का श्रेय हासिल करने वाले भाजपा के वीरेंद्र सिह मस्त इस बार चुनाव मैदान से बाहर हो गए हैं। भाजपा ने मस्त का टिकट काट वर्तमान में राज्यसभा सांसद और दो बार लोकसभा में बलिया का प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेख को कमल खिलाने का जिम्मा सौंपा है। इस बार के चुनाव में अब तक एक मात्र घोषित उम्मीदवार नीरज शेखर के सामने सियासी विरासत बचाने की बड़ी चुनौती है। सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा की जिताऊ उम्मीदवार की तलाश पूरी नहीं हो सकी है।
बलिया का ‘नारद इफ़ेक्ट’: पूर्वांचल में कितना निकालेगा साइकिल की हवा, कमल को कितना देगा खाद-पानी?
जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है. वैसे-वैसे राजनीतिक उठापटक देखने को मिल रही है. इसी कड़ी में बलिया लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका लगा है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नारद राय के बागी होने से समाजवादी की साइकिल की रफ्तार पर ब्रेक लगने की अटकलें लगाई जा रही हैं. दरअसल, यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जब सोमवार को बलिया में पार्टी के प्रत्याशी सनातन पांडे के समर्थन में हुई रैली के दौरान अखिलेश यादव ने मंच से सभी नेताओं का नाम लिया. लेकिन नारद राय का नाम नहीं लिया. इससे खफा होकर नारद राय ने बागी तेवर अपनाते हुए भाजपा का दामन थामने का मन बना लिया है.
नारद राय की भूमिहार समाज में बड़ी पैठ
अपने समर्थकों के साथ बैठक के बाद साइकिल में ताला लगाने के साथ नारद राय ने भाजपा को जिताने की अपील कर दी. बता दें कि नारद राय भूमिहार समाज के बड़े नेता माने जाते हैं और भूमिहार समाज पूर्वांचल की कई सीटों पर अपनी पैठ बनाए हुए हैं, जिनमें बलिया, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, वाराणसी, जौनपुर, देवरिया, मिर्ज़ापुर, चंदौली, भदोही, महाराजगंज, गोरखपुर और संत कबीर नगर जिला शामिल है. छात्र नेता के तौर पर राजनीति की शुरुआत करने वाले नारद राय को संगठन का कुशल नेता और स्ट्रैटिजिस्ट माना जाता है.
अमित शाह से नारद राय ने की मुलाकात
नारद राय की अपनी समर्थकों के साथ पूरी बैठक फ़ेसबुक पर लाइव चली. इस दौरान नारद राय ने राष्ट्रीय और जिला नेतृत्व पर उपेक्षा और अपमानित करने का आरोप लगाया. इसके बाद उन्होंने रात में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात भी की. इस दौरान सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर भी मौजूद रहे.
मुलाकात के बाद नारद राय ने किया ट्वीट
मुलाकात के बाद नारद राय ने ट्वीट करते हुए लिखा, ‘दुनिया में भारत का डंका बजाने वाले प्रधानमंत्री मोदी और भारत के गृह मंत्री, राजनीति के चाणक्य अमित शाह के संकल्प की समाज के अंतिम पंक्ति में बसे ग़रीब को मज़बूत करने वाली सोच और राष्ट्रवादी विचारधारा को मज़बूत करूँगा. जय जय श्री राम.’
ब्राह्मण मतदाता बलिया में ताकतवर
बता दें कि नारद राय भूमिहार समाज के बड़े नेता माने जाते हैं. ऐसे में बलिया का सियासी समीकरण समाजवादी पार्टी के लिए खराब होता हुआ नजर आ रहा है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बलिया में ब्राह्मण 15.5 प्रतिशत, भूमिहार 8.9 प्रतिशत, राजपूत, 13.8 प्रतिशत, ओबीसी 15.3 प्रतिशत, मुसलमान 6.59 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति 3.4 प्रतिशत, राजभर 4.9० फीसदी, निषाद 3.3, कुशवाहा 4.1 और कुर्मी 3.4 प्रतिशत हैं.
नीरज शेखर की राह हुई आसान
बता दें कि सपा के उम्मीदवार ब्राह्मण जाति से हैं. जबकि भाजपा के उम्मीदवार नीरज शेखर राजपूत जाति से आते हैं. ऐसे में ग्राउंड रिपोर्ट की बात करें तो सनातन पांडे के पक्ष में ब्राह्मण मतदाताओं के लामबंद होने से नीरज शेखर की राह मुश्किल हो रही थी. लेकिन नारद राय के आने से अब नीरज शेखर की राह आसान होती हुई नजर आ रही है.
भाजपा हैट्रिक लगाने की कोशिश में जुटी
हालांकि 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव में बलिया लोकसभा सीट पर भाजपा का कब्जा रहा है. अब भाजपा यहां से हैट्रिक लगाने की कोशिश में जुटी हुई हैं. बलिया लोकसभा सीट पर ब्राह्मणों की आबादी सबसे अधिक है. बलिया लोकसभा क्षेत्र में बैरिया, बलिया नगर और फ़ेफना तथा गाजीपुर जिले की जहुराबाद और मुहम्मादाबाद विधानसभा सीटें आती हैं.
आइएनडीआइए की घेराबंदी से भाजपा की राह में कई रोड़े
बलिया लोकसभा में सदर, बैरिया, फ़ेफना और गाजीपुर के दो विधानसभा क्षेत्र मुहम्मदाबाद और जहूराबाद हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में मात्र एक सीट बलिया सदर में भाजपा विजयी रही। तीन सीट बैरिया, फ़ेफना और गाजीपुर के मुहम्मदाबाद में सपा के विधायक जीते। जहूराबाद सीट सुभासपा के खाते में गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के वीरेंद्र सिह मस्त ने सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय को मात्र 15,519 मतों के अंतर से हराया था। सपा और बसपा ने मिलकर टक्कर दी थी।
इस बार सपा और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में वोटों का बिखराव भी निश्चित है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी सभी अलग-अलग थे। इस कारण पांच विधानसभा क्षेत्रों के वोटों को जोड़ दिया जाए तो भाजपा को 3,11,217 वोट मिले। सपा और सुभासपा मिलकर 4,78,417 वोट, कांग्रेस ने 9679 वोट हासिल किए थे। उस चुनाव में सुभासपा सपा के साथ थी, अब भाजपा के साथ है।
आम आदमी पार्टी को पांचों विधानसभा क्षेत्रों में 2444 वोट मिले। इस हिसाब से देखा जाए तो विपक्षी आइएनडीआइए सपा, कांग्रेस और आप को मिला दिया जाए तो भाजपा के लिए बलिया सीट चुनौतिपूर्ण होगी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 4,69,114 वोट, सपा व बसपा गठबंधन को 453595 वोट और सुभासपा को 35;900वोट मिले थे। कांग्रेस की ओर से कोई प्रत्याशी नहीं दिया गया था। 10 प्रत्याशियों में भाजपा और सपा में ही सीधी टक्कर थी। वैसे राजनीति में दो और दो हर बार चार नहीं होते। बहुत सी परिस्थितियां, प्रत्याशी, जाति समीकरण आदि कार्य करता है। फिर भी लड़ाई कांटे की होगी।
ब्राह्मण व पिछड़ी जाति निर्णायक
बलिया संसदीय सीट पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, यादव, अल्पसंख्यक, राजभर बहुल्य है। ब्राह्मण व पिछड़ी जाति मतदाता निर्णायक होते हैं। यहां दल के हिसाब से जातिगत गोलबंदी भी हर साल देखी जाती है।
तीन विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा दो में सपा रही आगे
2019 के लोकसभा चुनाव में बलिया लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली पांच विधानसभा क्षेत्रों में बैरिया, बलिया नगर और फ़ेफना में भाजपा आगे थी। गाजीपुर की दो सीटों मुहम्मदाबाद और जहूराबाद में सपा आगे रही थी। उस चुनाव में बलिया सीट पर कांटे की टक्कर थी।
देश के पहले चुनाव में कांग्रेस नहीं निर्दलीय की हुई थी जीत
बागी बलिया को फक्कड़ नेता था पसंद, अब लहरा रहा भगवा
बलिया को बागी बलिया कहा जाता है क्योंकि इसके तेवर में बगावत है. बलिया वो है जहां आजादी से पांच साल पहले ही तिरंगा फहरा दिया गया था. बात आजादी के बाद की राजनीति की करें तो तब भी इसके तेवर बागी ही रहे. स्वतंत्रता के बाद जब 1952 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुआ था तब कांग्रेस पार्टी ने यहां के लोगों की मर्जी के खिलाफ मदन मोहन मालवीय के बेटे गोविद मालवीय को टिकट थमा दिया. यह बात यहां के लोगों को नागवार गुजरी. बलिया ने फिर अपना बागी तेवर दिखाया और कांग्रेस की लहर में निर्दलीय मुरली मनोहर को जीत दिला दिल्ली भेजा.
1957 में कांग्रेस ने यहां अपनी खोई साख फिर वापस पा ली. कांग्रेस ने यहां राधामोहन सिह को मैदान में उतारा और जीत दर्ज की. बलिया में कांग्रेस पार्टी का जलवा 1971 तक कायम रहा है नेता जरूर बदलते रहे. कभी कांग्रेस को हराने वाले मुरली बाबू कांग्रेस की टिकट पर फिर 1962 में सांसद बने. 1967 और 1971 में चंद्रिका लाल ने यहां से जीत दर्ज की. जब कांग्रेस के खिलाफ जयप्रकाश नारायण ने देशव्यापी आदोंलन छेड़ा तो बागी बलिया के फक्कड़ चन्द्रशेखर सिह को यहां की जनता ने चुना. चन्द्रशेखर सिह बलिया से लगातार चुनाव जीतते रहे. (1984 को छोड़कर) इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुआ चुनाव अपवाद है. तब कांग्रेस पार्टी के जगन्नाथ चौधरी ने जीत दर्ज की थी.
एक नजर 2019 के चुनाव पर
2019  के चुनाव में बलिया में सबसे पहले भगवा परचम लहराने वाले भरत सिह को भारतीय जनता पार्टी ने टिकट नहीं दिया . बीजेपी ने यहां वीरेंद्र सिह मस्त को मैदान में उतारा. वहीं समाजवादी पार्टी ने भी अपना प्रत्याशी बदला था. 2007 से एसपी की टिकट पर चुनाव लड़ रहे पूर्व पीएम और समाजवादी नेता चन्द्रशेखर सिह के बेटे नीरज शेखर की टिकट काट कर अखिलेश ने सनातन पांडे को साइकिल सिबल थमाया. सनातन पांडे ने बीजेपी प्रत्याशी को कड़ी टक्कर दी लेकिन वह जीत दर्ज नहीं कर पाए. बीजेपी के वीरेंद्र सिह को 2009 में 469,114 वोट जबकि सनातन पांडे को 4,53,595 वोट मिले थे. 2009 का चुनाव यहां एक तरफा नहीं था. 214 में बीजेपी के भरत सिह ने जहां करीब 1 लाख 4० हजार वोटों से जीत दर्ज की थी वहीं 2019 में जीत का अंतर महज 15519 वोट ही रहा.
चन्द्रशेखर के बेटे को मिली पिता की विरासत
बलिया के सांसद और फिर देश के प्रधानमंत्री बने चन्द्रशेखर के निधन के बाद यहां लोगों ने उनके बेटे नीरज शेखर को उनकी विरासत सौंपी. बलिया सीट से चन्द्रशेखर और उनके परिवार ने 10 बार जीत दर्ज की है. नीरज शेखर ने सपा की टिकट पर बलिया से तीन बार चुनाव लड़ा, दो बार जीत दर्ज की. उन्होंने यहां 2007 उपचुनाव और 2009 के चुनाव में जीत दर्ज की. 2014 के मोदी लहर में बीजेपी ने भी यहां अपना खाता खोला. तब भगवा पार्टी के भरत सिह ने नीरज शेखर को शिकस्त दी थी. इसके बाद 2019 में बीजेपी के वीरेंद्र सिह मस्त ने यहां जीत दर्ज की. 2019 में नीरज को सपा ने टिकट नहीं दिया तो नीरज शेखर बीजेपी में शामिल हो गए. नीरज शेखर अभी बीजेपी से राज्यसभा सांसद हैं. बहन मायावती की पार्टी ने यहां अबतक खाता नहीं खोला है. जबकि दिवंगत समाजवादी नेता चन्द्रशेखर सिह ने पहली बार आरएलडी की टिकट पर ही यहां से जीत दर्ज की थी.
बलिया का जातीय समीकरण
बीजेपी बलिया में हैट्रिक लगाने की कोशिश में है और समाजवादी पार्टी अपनी खोई जमीन पाने की जुगत में. इसके बाद यहां जातीय समीकरण महत्वपूर्ण हो जाता है. बलिया में कुल 23 लाख 58 हजार 606 मतदाता हैं. इसमें पुरुषों की संख्या 12 लाख 93 हजार 860 जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 10 लाख 64 हजार 676 है. बलिया जिले की 90 प्रतिशत से ज्यादा आबादी गांवों में रहती है. बात जातिगत वोट की करें तो यहां सबसे ज्यादा करीब तीन लाख ब्राह्मण वोटर हैं. इसके बाद यादव और राजपूत वोटरों की संख्या करीब ढाई-ढाई लाख हैं. मुस्लिम वोटर की आबादी भी एक लाख से ज्यादा है. भूमिहार वोटों की भी संख्या अच्छी खासी है. बीजेपी ने 195 उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की है उसमें बलिया सीट शामिल नहीं है.
बलिया के लोग शुरू से ही फक्कड़ स्वभाव वाले जनप्रतिनिधि को चुनते रहे हैं. चन्द्रशेखर सिह यहां से आठ बार सांसद बने, फिर उनके बेटे भी दो बार. लेकिन अब यहां की राजनीति ने करवट बदली है. अब यहां जाति के साथ-साथ धार्मिक आधार पर भी वोटों की गोलबंदी हो रही

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