सुप्रीम कोर्ट में कल फिर गूंजा, बड़ौदा डाइनामाइट केस !

के. विक्रम राव

सुप्रीम कोर्ट में कल (8 मई 2024) न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने पचास वर्ष पुराने बड़ौदा डायनामाइट केस का उल्लेख किया। वे अरविंद केजरीवाल की जमानत याचिका पर विचार कर रहे थे। खंडपीठ के दूसरे जज थे न्यायमूर्ति दीपांकर दत्त। दिल्ली के मुख्यमंत्री के वकील का अनुरोध था कि लोकसभा चुनाव प्रचार हेतु उन्हें अंतरिम जमानत दी जाए।
इस याचिका को अस्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति खन्ना ने याद दिलाया कि बड़ौदा डायनामाइट केस के मुख्य अभियुक्त जॉर्ज फर्नांडिस ने तिहाड़ जेल में ही रहकर मुजफ्फरपुर (बिहार) से चुनाव लड़ा था और विशाल बहुमत से विजयी हुए थे। जॉर्ज के साथ के 24 सहअभियुक्तों में द्वितीय क्रमांक पर मैं था। जॉर्ज की कोलकाता में गिरफ्तारी तक इस मुकदमें का शीर्षक था “भारत सरकार बनाम के. विक्रम राव तथा 23 अन्य।” हमें सजाये मौत की आशंका थी। हालांकि हमने कहीं भी प्राणहानि नहीं की थी।
कैसा संयोग है कि चंद महीनों बाद बड़ौदा डायनामाइट केस की स्वर्ण जयंती होगी। भारत का द्वितीय स्वाधीनता आंदोलन (इंदिरा गांधी के इमरजेंसी राज के खिलाफ : लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में) चला था। जेपी दूसरे महात्मा गांधी बनकर उभरे थे।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना का आभार कि जनसंघर्ष के एक हीरो को भरी अदालत में याद किया। कौन हैं यह विद्वान जज साहब ? वे उसे न्यायिक खानदान के हैं जिसकी महती भूमिका रही लोकस्वतंत्रता हेतु संघर्ष में। संजीव खन्ना छः माह बाद (11 नवंबर 2024) को भारत के 51वें प्रधान न्यायाधीश होंगे। वर्तमान प्रधान न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ के रिटायर होने पर।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के पिताश्री देवराज खन्ना दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे। यह खन्ना कुटुंब भारत की न्यायिक स्वतंत्रता का त्राता और खेवैया रहा है। भारत के सुप्रीम कोर्ट का इतिहास गवाह है कि न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना (संजीव जी के चाचा) ने किस निडरता और साहस से इंदिरा गांधी की इमर्जेंसी वाली तानाशाही का प्राणपण से विरोध किया था। नतीजन उन्हें प्रधान न्यायाधीश पद से वंचित कर कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने अपने चहेते न्यायमूर्ति अजित नाथ राय को नामित कर दिया था।
जिला जबलपुर वाले मुकदमे में न्यायालय ने नागरिक अधिकारों के हनन को निरस्त नहीं किया। तर्क था कि आपातकाल में समस्त नागरिक अधिकारों को निरस्त कर दिया गया था। इस तानाशाही वाले निर्णय के कारण हेबियस कार्पस का अधिकार भी खत्म कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के जिन चार जजों ने इस मौलिक नागरिक अधिकार को निरस्त माना था उनमें थे यही प्रधान न्यायाधीश एन राय, न्यायमूर्ति मोहम्मद हमीदुल्लाह बेग, यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ (प्रधान न्यायाधीश के पिताश्री) और न्यायमूर्ति पीएन भगवती। उसी के बाद इंदिरा गांधी ने कनिष्ठ बेग साहब को साल भर के लिए प्रधान न्यायाधीश बनाया था।
न्यायमूर्ति खन्ना ने त्यागपत्र दे दिया था। उन्होंने मशहूर केशवानंद भारती केस में निर्णय हेतु याद रखा जाता है कि भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे को बदला नहीं जा सकता है। मगर इंदिरा गांधी ने अंततः इस निर्णय को भी नाकारा बना डाला। यह पोते राहुल गांधी को याद रखना चाहिए जब वह नरेंद्र मोदी पर संविधान खत्म करने का आरोप लगाते हैं।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने अपने सगे-चाचा की भांति उस परिवार से संबंधित हैं जो भारत के स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय था। उनके पितामह स्व. सर्वदयाल खन्ना अमृतसर में लाला लाजपत राय के साथ ब्रिटिश अत्याचारों के खिलाफ लड़े थे। यह खन्ना परिवार की मर्यादित परंपरा का प्रतीक है।
बड़ौदा डायनामाइट केस के उल्लेख के समय सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ के दूसरे न्यायमूर्ति थे दीपांकर दत्त जो कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे। उनके पिता सलिल कुमार दत्त भी हाईकोर्ट के जज रहे।
आज इस संपूर्ण प्रकरण पर विशेष रपट प्रस्तुत की दैनिक “इंडियन एक्सप्रेस” (मुंबई 2024 : पृष्ठ 14 : कालम एक से आठ तक।) इस रपट में एक्सप्रेस के प्रख्यात तथा वरिष्ठ संवाददाता श्री श्यामलाल यादव ने बड़ा सटीक और विस्तृत विवरण दिया है। वह प्रभावी है, यादगार भी। उन्होंने लिखा कि किस भांति के. विक्रम राव तथा अन्य ने इंदिरा गांधी की इमर्जेंसी का विरोध किया था। उन दिनों बड़ौदा में विक्रम राव दैनिक “टाइम्स आफ इंडिया” के संवाददाता थे। दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में तिहाड़ जेल से हथकड़ी में ले जाकर पेश किए जाते थे। ये सारे 25 कैदी रिहा हुए 22 मार्च 1977 को, जब रायबरेली के वोटरों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लोकसभा चुनाव में हराया था। जनता पार्टी के राज नारायण विजयी हुए थे। गत सप्ताह में रायबरेली चुनाव एक बार फिर खास हो गया है। राहुल यहां से प्रत्याशी हैं।

 

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