बस्तर का एकमात्र दक्षिणमुखी शिवलिंग दंतेवाड़ा की मावली गुड़ी में

  • करीब एक हजार साल पुराना है यह शिवलिंग

बस्तर में छिंदक नागवंशी राजाओं का वर्चस्व रहा है और यह शिव उपासक थे, इसलिए पूरे बस्तर में शिव परिवार की प्रतिमाएं सर्वाधिक हैं किंतु दक्षिणमुखी शिवलिंग सिर्फ एक है। यह शिवलिंग दंतेवाड़ा में मावली माता मंदिर परिसर में है। यह करीब एक हज़ार साल पुराना तथा करीब ढाई फीट लंबा है। माना जाता है कि दंतेवाला की शासिका मासक देवी इसकी पूजा अर्चना करती थीं।
संभागीय मुख्यालय से 84 किमी दूर दंतेश्वरी शक्तिपीठ है। यहां दो गुड़ी है। एक में मां दंतेश्वरी और दूसरे में मां माणिकेश्वरी अर्थात मावली माता विराजित हैं। इस गुड़ी में ही भैरवी प्रतिमाओं के पास यह दक्षिणमुखी दुर्लभ शिवलिंग है। आमतौर पर शिवलिंग की जलहरी उत्तर दिशा की तरफ होती है किंतु इस जलहरी की दिशा दक्षिण की तरफ है और लोग बाकायदा इसकी भी पूजा अर्चना करते हैं।
इस शिवलिंग निर्माण के संदर्भ में बताया जाता है कि वर्ष 1025 के आसपास प्रथम छिंदक नागवंशी नरेश नृपतिभूषण ने इसका निर्माण करवाया था।
कौन थीं मासक देवी
लाला जगदलपुरी मासकदेवी के संदर्भ में लिखते हैं कि बस्तर के छिन्दक नाग-कुल में एक बड़ा प्रतापी नरेश था, जिसकी एक विदुषी-बहिन थी उसका नाम मासकदेवी था । उसने तत्कालीन वातावरण में नारी चेतना, प्रजा-प्रेम, सेवा-भाव, कृषि-उत्थान आदि प्रवृत्तियों के विकास के लिये प्रशंसनीय कदम उठाया था। मंदिर परिसर के शिला-लेख में उनका आदेश उकेरा गया है कि सर्व साधारण को यह सूचित किया जाता हैं कि राज्य अधिकारी कर उगाहने में कृषक जनता को कष्ट पहुँचाते हैं। अनियमित रूप से कर वसूलते हैं। अतएव, प्रजा के हित-चिन्तन की दृष्टि से पाँच महासभाओं और किसानों के प्रतिनिधियों ने मिल कर यह नियम बना दिया है कि राज्याभिषेक के अवसर पर जिन गाँवों से कर वसूल किया जाता है, उनमें ही ऐसे नागरिकों से वसूली की जाय, जो गाँव में अधिक
समय से रहते आये हों। जो इस नियम का पालन नहीं करेंगे, वे चक्रकोट के शासक और
मासक देवी के विद्रोही समझे जावेंगे।
क्या कहते हैं पुजारी
इधर दंतेश्वरी शक्तिपीठ के पुजारी बताते है कि वर्ष 1932 में दोनों देवी गुड़ियों का तत्कालीन बस्तर महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय भी यह शिवलिंग दक्षिणमुखी था। वर्ष 1982 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग ने भी यहां की मूर्तियों को व्यवस्थित करते समय इस शिवलिंग को नहीं हटाया था।

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