उत्तर प्रदेश के पांचवे चरण की रायबरेली लोकसभा का हाल

  • गांधी परिवार का दबदबा,क्या भाजपा कर पायेगी कोई जादू

उत्तर प्रदेश में कई लोकसभा सीटें अपनी हाई प्रोफाइल सीट होने की वजह से विशेष पहचान रखती हैं. लखनऊ मंडल में पड़ने वाली रायबरेली जिले की संसदीय सीट भी वाराणसी और लखनऊ संसदीय की तरह हमेशा चर्चा में रही है. कांग्रेस पिछले 1० सालों से सत्ता से दूर है तब भी यह सीट उसके कब्जे में रही है. फिरोज गांधी, इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी जैसे दिग्गज नेता यहां से चुनाव लड़ चुके हैं. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी कई बार यहां से चुनी गईं. फिलहाल यहां से अभी सोनिया गांधी लोकसभा सांसद हैं और इस बार उनके पुत्र और युवा कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने परिवार की सीट और अपने यूपी के आखिरी गढ़ को बचाने के लिए यहां से पर्चा दाखिल कर चुके हैं।
रायबरेली जिले की स्थापना अंग्रेजों ने 1858 में की थी. रायबरेली का नाम पड़ने के पीछे दावा यह किया जाता है कि इस शहर को भरो ने स्थापित किया था जिसे भरौली या बरौली के नाम से जानते थे, बाद में नाम में परिवर्तन होता चला गया और यह बरेली हो गई. बरेली से पहले उपसर्ग राय लगने के पीछे की कहानी यह है कि कायस्थ बिरादरी के लोग जो कभी इस शहर के स्वामी हुआ करते थे और उपाधि के तौर पर राय लिखा करते थे.
ऐसे में शहर के नाम के साथ राय भी जुड़ गया. रायबरेली जिले के तहत 5 विधानसभा सीटें आती हैं, जिसमें बछरावां, हरचंदपुर, रायबरेली, सरेनी और ऊंचाहार शामिल हैं. इसमें बछरावां सीट अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व है. 5 विधानसभा सीटों में से महज एक सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को जीत मिली थी तो अन्य 4 सीटों पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है.
2०19 में परिणाम
2०19 के लोकसभा चुनाव को देखें तो यहां पर भी पिछली बार की तरह एकतरफा चुनाव रहा था. कांग्रेस ने सोनिया गांधी को यहां से मैदान में उतारा था. वह पिछली कई बार से सांसद चुनी जाती रही थीं. भारतीय जनता पार्टी ने दिनेश प्रताप सिह को यहां से मौका दिया था. जबकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने यहां से अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था. समाजवादी पार्टी ने तो 2०14 में भी अपना कोई उम्मीदवार यहां खड़ा नहीं किया था. हालांकि रायबरेली सीट से कुल 15 उम्मीदवार मैदान में थे.
यूपीए संयोजक सोनिया गांधी को चुनाव में 5,34,918 वोट मिले तो बीजेपी के दिनेश प्रताप सिह को 367,74० वोट ही मिल सके. इसके बाद तीसरे स्थान पर गग्Tइ रहा था जिसके पक्ष में कुल 1०,252 वोट पड़े थे. सोनिया ने 167,178 मतों के अंतर से चुनाव में जीत हासिल की थी. तब के चुनाव में यहां पर कुल वोटर्स की संख्या 16,28,549 थी जिसमें पुरुष वोटर्स की संख्या 8,63,32० थी तो महिला वोटर्स की संख्या 7,65,184 थी. इसमें से कुल 9,58,556 (59.5%) वोटर्स ने वोट डाले.
राजनीतिक इतिहास
देश की सियासत में अहम स्थान रखने वाली रायबरेली संसदीय सीट के राजनीतिक इतिहास को देखें तो यह सीट हमेशा से कांग्रेस का गढ़ रहा है. बीजेपी को महज 2 बार ही रायबरेली सीट पर जीत मिली है. यहां पर 3 उपचुनावों समेत कुल 2० चुनाव में कांग्रेस को 17 बार जीत मिली है, तो 2 बार भारतीय जनता पार्टी के खाते में जीत गई. एक बार जनता पार्टी को जीत मिली थी. बसपा और सपा का यहां पर अब तक खाता तक नहीं खुल सका है, हालांकि पिछले 2 चुनाव से सपा यहां से अपने उम्मीदवार नहीं खड़ा कर रही है.
1952 और 1957 के चुनाव में फिरोज गांधी ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की थी. 1962 के चुनाव में कांग्रेस के बैजनाथ कुरील विजयी हुए थे. 1967 के संसदीय चुनाव में इंदिरा गांधी यहां से चुनाव मैदान में उतरीं और विजयी हुईं. 1971 में भी इंदिरा फिर से यहीं से चुनी गई थीं. इसके बाद पीएम इंदिरा ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी, जिसका असर 1977 के चुनाव में पड़ा और वह जनता पार्टी के राजनारायण के हाथों 55,2०2 मतों के अंतर से चुनाव हार गईं. हालांकि 198० के चुनाव में इंदिरा ने फिर से वापसी की और यहां से चुनाव जीत गईं.
लेकिन 198० में ही यहां पर उपचुनाव कराया गया, जिसमें कांग्रेस के अरुण नेहरू ने जीत हासिल की. 1984 में भी अरुण नेहरू फिर से चुनाव जीतने में कामयाब रहे. कांग्रेस की पकड़ यहां पर लगातार बनी रही. 1989 के आम चुनाव में कांगेस ने दिग्गज शीला कौल को रायबरेली सीट से उतारा और वह भी विजयी रहीं. 1991 में राम लहर के दौरान भी शीला कौल ने कांग्रेस को यहां से जीत दिलाई. लगातार प्रयास के बाद 1996 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को यहां से जीत मिली. बीजेपी के अशोक कुमार सिह यहां से चुनाव जीतकर सांसद बने. 1998 में भी अशोक कुमार सिह ने बीजेपी के लिए जीत हासिल की. इन दोनों ही चुनावों में कांग्रेस चौथे स्थान पर रही थी.
जातिगत समीकरण
लगातार 2 हार के बाद कांग्रेस को रायबरेली सीट से 1999 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल हुई. तब कैप्टन सतीश शर्मा ने यहां से जीत हासिल की थी. 2००4 के चुनाव से सोनिया गांधी की रायबरेली सीट पर एंट्री हुई और उन्होंने जीत का लगातार सिलसिला बनाए रखा. 2००4, के बाद 2००6 के उपचुनाव, 2००9, 2०14 और 2०19 में सोनिया गांधी ने लगातार पांच जीत हासिल की. 2०14 के चुनाव में जब हर जगह मोदी लहर का असर दिखा था तब भी सोनिया ने यहां से 3,52,713 मतों के अंतर से बीजेपी के अजय अग्रवाल को हराया था. हालांकि 2०19 के चुनाव में सोनिया की जीत का अंतर कम हो गया और 1,67,178 मतों के अंतर से जीत हासिल कर सकीं.
हाई प्रोफाइल सीटों में शुमार की जाने वाली रायबरेली संसदीय सीट पर किसी तरह का जातीय समीकरण काम नहीं करता है. यहां पर हमेशा से ही कांग्रेस का दबदबा रहा है. 2०19 के चुनाव में यहां पर अनुसूचित जाति के वोटर्स की संख्या 32 फीसदी से ज्यादा थे. यहां पर ब्राह्मण वोटर्स की संख्या 11 फीसदी थी तो ठाकुर बिरादरी के वोटर्स 9 फीसदी थे. यादव बिरादरी के वोटर्स की संख्या 7 फीसदी रही है. इनके अलावा मुस्लिम वोटर्स की संख्या भी 6 फीसदी के करीब रही है. साथ ही लोध और कुर्मी वोटर्स भी अपनी अहम भूमिका रखते हैं.
रायबरेली में ब्राह्मणों की आबादी 11 फीसदी, ठाकुरों की 9 फीसदी, यादव 7 फीसदी, एससी 34 फीसदी, मुस्लिम 6 फीसदी, लोध 6 फीसदी, कुर्मी 4 फीसदी और अन्य आबादी 23 फीसदी है। यहां कुल मतदाताओं की संख्या 779813 है। रायबरेली सीट पर पासी जाति का प्रभाव माना जाता है।
इसके अलावा ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय जातियों के लोकल नेता निकाय चुनाव, विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव तक प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। हालांकि, सोनिया गांधी और गांधी परिवार के नाम पर जातीय समीकरण खास फर्क नहीं डाल पाते हैं।
इतिहास में देखें तब पता चलता है कि रायबरेली को गांधी परिवार का हिस्सा बना देने का काम सबसे पहले इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी ने किया। बाद में इंदिरा और सोनिया गांधी भी यहां से सांसद बनीं। कांग्रेस यहां इस कदर मजबूत हुई कि 1957 से अबतक मात्र तीन बार लोकसभा चुनावों में उसे यहां हार का सामना करना पड़ा है।
सबसे चर्चित चुनाव 1977 का रहा, जब भारतीय लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़े समाजवादी धड़े के नेता राज नारायण ने इंदिरा गांधी को हरा दिया था। सोनिया गांधी पहली बार रायबेरली से 2००4 में चुनाव लड़ीं और तब से अब तक वह यहां की सांसद हैं। आमतौर पर बाकी पार्टियां कांग्रेस को इस सीट पर वॉकओवर देती आई हैं लेकिन 2०19 में सोनिया के गांधी के ही खास सिपहसलार रहे दिनेश सिह ने ही पार्टी बदलकर सोनिया को चुनौती दी थी।
अटकलों को खत्म करते हुए, कांग्रेस ने आखिरकार घोषणा की कि सोनिया गांधी के बेटे और आगामी लोकसभा चुनावों के लिए कथित तौर पर कांग्रेस के पीएम चेहरे राहुल गांधी , रायबरेली से उनके लोकसभा उम्मीदवार होंगे। विशेष रूप से, राहुल केरल की वायनाड सीट से मौजूदा सांसद हैं और 2०24 में भी उसी से चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे उनकी इसी चुनाव में दूसरी बार रायबरेली से उम्मीदवारी होगी।
कांग्रेस के गढ़ में बीजेपी ने तीन बार के विधायक और पूर्व कांग्रेस सदस्य दिनेश प्रताप सिह को अपना लोकसभा उम्मीदवार घोषित किया है. सिह ने तीन बार उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव जीता है , दो बार कांग्रेस के टिकट पर (2०1० और 2०16) और एक बार भाजपा के टिकट पर (2०22)। सिह ने 2०19 का लोकसभा चुनाव भी रायबरेली से लड़ा, लेकिन अंतिम विजेता सोनिया गांधी के बाद दूसरे स्थान पर रहे।
2०24 के आम चुनावों में उत्तर प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने वाली एकमात्र पार्टी होने के नाते, बहुजन समाज पार्टी ने रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से अपने लोकसभा उम्मीदवार के रूप में ठाकुर प्रसाद यादव के नाम की घोषणा की। ठाकुर इससे पहले 2०17 और 2०22 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। यह भारतीय संसद के निचले सदन में यादव का पहला प्रयास होगा।
12 दिन, 2० नुक्कड़ सभाएं, नेहरू-इंदिरा-राजीव का जिक्र, अमेठी-रायबरेली के लिए ऐसा है प्रियंका का प्लान
लोकसभा चुनाव के लिए राजनीतिक पार्टियां जमकर प्रचार कर रही हैं. सभी की नजरें उत्तर प्रदेश पर टिकी हुई हैं. यहां लोकसभा की 8० सीटें हैं. कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता इसी राज्य से होकर गुजरता है, लेकिन इन सब के बीच इस समय रायबरेली और अमेठी हॉट सीटें हैं, जहां मुकाबला दिलचस्प बना हुआ है. यहां गांधी परिवार की साख दांव पर लगी ही. यही वजह है कि कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी ने इस क्षेत्र में डेरा डाला हुआ है और मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए हर संभव रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं.
प्रियंका गांधी अमेठी और रायबरेली क्षेत्र मे 12 दिनों तक रहेंगी. उन्होंने अमेठी-रायबरेली की हर विधानसभा के ज्यादा से ज्यादा गांवों को टच करने का टारगेट सेट किया है ताकि पार्टी के पक्ष में बेहतर से बेहतर माहौल बनाया जा सके. कांग्रेस महासचिव रोजाना करीब 2० नुक्कड़ सभाएं करेंगी. साथ ही साथ उन्होंने दोनों सीटों पर विश्वासपात्र 5०० कार्यकर्ताओं को तैनात किया है, जो बारीकी से चुनाव की रणनीति को जमीन पर उतारने का काम करेंगे.
प्रियंका गांधी कार्यकर्ताओं के साथ रोजाना रणनीतिक बैठक करेंगी और सोशल मीडिया के जरिए विपक्षी पार्टी को घेरेंगी और तीखा प्रचार करेंगी. इसके अलावा अमेठी में अशोक गहलोत और रायबरेली में भूपेश बघेल के अनुभव का इस्तेमाल किया जाएगा. गांधी परिवार ने इन इलाकों का मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, राजीव गांधी के जुड़ाव वाले वाकयों का इस्तेमाल करके चुनाव में भावनात्मक अपील करने की कोशिश की है.
अमेठी से उम्मीदवार किशोरी लाल शर्मा के अनुभव का रायबरेली में भी इस्तेमाल किया जाएगा. कांग्रेस ने आजादी आंदोलन, संविधान बचाओ के नारों के जरिए क्रांति की धरती पर सत्य की लड़ाई थीम रखी है. इसके अलावा महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी जैसे जनता से जुड़े मुद्दों पर जोर देने की कोशिश है. प्रियंका गांधी सोमवार को कार्यकर्ताओं से मिलने के बाद आज जनता के बीच रायबरेली-अमेठी की सड़कों पर उतरेंगी. प्रियंका गांधी ने लक्ष्य निर्धारित किया है कि रायबरेली से कांग्रेस उम्मीदवार व उनके भाई राहुल गांधी को केरल की वायनाड सीट से ज्यादा मतों के अंतर से जिताया जाए. इसके पीछे की रणनीति ये है कि अगर राहुल गांधी रायबरेली में ज्यादा मतों से जीतते हैं तो वायनाड छोड़ने के लिए तर्क रहेगा. पिछले चुनाव में वायनाड से राहुल गांधी 4 लाख 3० हजार वोटों से जीते थे. इस बार रायबरेली से राहुल के सामने बीजेपी के उम्मीदवार दिनेश प्रताप सिह हैं.
आसान नहीं होगी भाजपा की राह, प्रत्याशी के सामने गुट
बाजी का खतरा;कई नेताओं की गैरमौजूदगी बनी चर्चा
राहुल के नामांकन के साथ ही रायबरेली का राजनीतिक पारा चढ़ने लगा है। वोटरों को साधने के लिए प्रत्याशी और पार्टी कार्यकताã जुट गए हैं। भाजपा प्रत्याशी दिनेश प्रताप सिह के सामने इस बार दोहरी चुनौती है। 2०19 के लोकसभा चुनाव में दिनेश प्रताप को सोनिया गांधी का सामना करना पड़ा था तो इस बार उनके सामने राहुल गांधी हैं लेकिन राहुल गांधी के साथ ही उनके सामने पार्टी की खेमेबंदी भी बड़ी चुनौती होगी। नामांकन में कुछ बड़े नामों की गैर मौजूदगी चर्चा का विषय बनी है। दिनेश को मालूम है कि मुकाबला कठिन है, लेकिन उनका उत्साह कम नहीं। उन्होंने कहा, जब अमेठी में राहुल हार सकते हैं तो रायबरेली से क्यों नहीं?
साल 2०19 के चुनाव में दिनेश ने सोनिया गांधी अच्छी टक्कर दी थी। उदाहरण के तौर पर पाने वाले मतों की संख्या को छोड़कर यदि पूर्व के चुनाव में हासिल मतों की बात करें तो दिनेश सिह पहले ऐसे प्रत्याशी हैं जिन्हें सोनिया गांधी के सामने अब तक के सर्वाधिक वोट मिले। शायद 2०19 के चुनावी परफार्मेंस को आधार माना गया और उन्हें राज्यमंत्री बनाया गया। ऐसे में समीकरण साधकर चलना दिनेश के लिए बेहद जरूरी होगा। बीते साल जिले में भाजपा के सामने गुटबाजी और अंतर्कलह एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है। पार्टी पदाधिकारियों के बीच इस विषय को लेकर स्वीकार्यता-अस्वीकार्यकता हो सकती है पर इसे खारिज नहीं किया जा सकता। रायबरेली लोकसभा में पांच विधानसभा हैं। सलोन विधानसभा अमेठी में आती है। सदर विधान सभा की बात करें तो यहां भाजपा की विधायक अदिति सिह और दिनेश सिह के बीच की तनातनी किसी से छिपी नहीं। दोनों नेता अधिकांश सार्वजनिक व पार्टी कार्यक्रमों पर मंच साझा करने से भी बचते देखे गए हैं। हरचंदपुर, सरेनी और बछरावां विधानसभा सीटें सपा के पास हैं। ऊंचाहार विधानसभा से विधायक डॉ मनोज कुमार पांडेय हैं। मनोज और दिनेश के संबंध भी किसी से छिपे नहीं, हालांकि नामांकन से पूर्व डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक अपने साथ दिनेश सिह को लेकर डॉ पांडेय के आवास भी पहुंचे। पाठक ने दोनों ध्रुवों को मिलाने का प्रयास भी किया, इसी का नतीजा रहा कि ऊंचाहार विधायक ने अपने बेटे प्रतीक राज को दिनेश सिह के नामांकन में शामिल होने के लिए भेजा। अब यह साथ और मेल मिलाप वोट में कितना परिवर्तित होगा यह देखना दिलचस्प होगा। इन सब सवालों पर दिनेश प्रताप सिह दो टूक कहते हैं कि पार्टी का हर कार्यकताã उनके साथ है। सभी विधायक साथ हैं, यहां भी अमेठी की तरह अप्रत्याशित नतीजा होगा।

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