चुनाव है भाई चुनाव, यहीं लोग तो चकल्लस सजाते हैं

के. विक्रम राव 

वर्षा का मौसम आए तो दादर न टर्राए ? ठीक ऐसे ही कतिपय प्रत्याशी भी ऐन चुनाव के वक्त ही उपजते हैं। गंभीर और कड़वाहटभरी राजनीति में मधु-हास्य का पुट डालते हैं। ठीक ऐसी ही खबर आई है तमिलनाडु के शहर मेट्टूर से जो कावेरी नदी पर बांध के लिए मशहूर है। यहां की पहाड़ियां और खाइयाँ भी अपना महत्व रखती हैं।
मेट्टूर में टायर मरम्मत करने वाले मैकेनिक के. पद्मराजन ने 239वीं दफा लोकसभा के लिए नामांकन दायर किया है। वह 238 बार हार चुके हैं, जमानत गवां चुके हैं। यह 65-वर्षीय कारीगर अपने को भारतीय निर्वाचन का बादशाह कहता है। विश्व का महानत्तम चुनाव हारने वाला बताने में गर्व महसूस करता है। हाल ही में तेलंगाना के गजेवल क्षेत्र से पंचायत का भी चुनाव लड़ा था। अब 18वीं लोकसभा का उम्मीदवार है।
पद्मराजन की विशिष्ट पहचान यही है कि वह नरेंद्र मोदी, मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेई के खिलाफ चुनाव लड़ा था। स्वयं को होम्योपैथ डॉक्टर बताने वाला यह मैकेनिक दावा करता है कि इन सवा दो सौ मतदानों में वह एक करोड रुपए खर्च कर चुका है। पिछली बार (2019) वह वायनाड (केरल) से राहुल गांधी के विरुद्ध उम्मीदवार था।
पद्मराजन ने अपनी संपत्ति में दिखाई कि उसके पास चौंतीस ग्राम सोना है, ऊंचास हजार रुपए नगद हैं, एक दुपहिया है। वह 17 विधानसभा और छः राष्ट्रपति निर्वाचन में भी नामांकन दाखिल कर चुका है। अतः लिम्का के विश्व रिकॉर्ड में जगह पा चुका है।
उनका कहना है कि वह यह साबित करना चाहते हैं कि कोई भी आम आदमी चुनाव लड़ सकता है। कंधे पर चमकीला शॉल और मोटी मूंछों वाले श्री पद्मराजन ने कहा, “सभी उम्मीदवार जीत हासिल करना चाहते हैं। लेकिन मैं नहीं।” उनके लिए असली जीत चुनाव में हिस्सा लेने में है, और जब उन्हें उनकी हार का पता चल जाता है, तो वह हारकर भी खुश होते हैं। पद्मराजन बोला 2011 में तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव में 6273 मत मिले थे। अपनी संपत्ति के बारे में उनका कहना है कि एक लाख रुपए के मालिक हैं। एक दुपहिया है। दर्जा 8 तक पढ़े हैं। अधुना वे अन्नामलाई विश्वविद्यालय से आधुनिक इतिहास में एम ए कर रहे हैं। “मैं जीतने के लिए नहीं वरन भागीदारी हेतु लड़ता हूं।” पद्मराजन राष्ट्र के सर्वाधिक असफल उम्मीदवार हैं। उनका पता है : 23 A पद्मनिवास बिल्डिंग, रमण नगर, धरमपुरी जिला सेलम (तमिलनाडु)। पिता का नाम कुंचन्वु नायर हैं।
भारतीय लोकसभा के 18वें आम चुनाव में कई ऐसे प्रत्याशी आए जिन्होंने नीरस वोटिंग में हास्य का पुट डाला। इनमें से कई लोगों का दावा है कि सब जाट अग्रणी किसान नेता चौधरी चरण सिंह के पद्चिन्हों पर चलते हैं। भारत के प्रधानमंत्री पद पर चरण सिंह केवल 23 दिन रहे। कार्यवाहक के रूप में अस्थाई रूप से अगस्त 1979 तक थे। वे लोकसभा में विश्वास मत नहीं पा सके क्योंकि राष्ट्रपति ने उसे भंग कर दिया था। तभी डॉ. धर्मवीर भारती द्वारा संपादित साप्ताहिक “धर्मयुग” में गोलाकार संसद भवन और चौधरी चरण सिंह की फोटो साथ छापी थी। शीर्षक था : “बिन फेरे, हम तेरे।” बड़ा सार्थक था।
इस चुनावी संग्राम में पद्मराजन की भांति और भी रहे हैं, वह अकेले नहीं है। मसलन इंदौर नगर के 93-वर्षीय नागमाल बजोरिया उर्फ धरती पकड़ हैं। वे अब तक 18 दफा चुनाव हार चुके हैं।
वर्तमान विधानसभा चुनाव के समय भाजपा से बगावत करने वाले विधायकों में सबसे बड़ा नाम चित्तौड़गढ़ के विधायक चंद्रभान सिंह आक्या का था। भाजपा ने सीटिंग एमएलए आक्या का टिकट काटकर पूर्व सीएम भैरोसिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी को टिकट दिया था। बाद में आक्या चुनावी मैदान में निर्दलीय उतरे और उन्होंने भाजपा प्रत्याशी की जमानत तक जब्त करा दिया। विधानसभा चुनाव में जीत के बाद आक्या ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मिलकर उन्हें समर्थन दिया।
कुछ अचंभा भी चुनावों में होता है। विजयी उम्मीद्वार जमानत खो बैठा। यूपी से ही जमानत जब्त होने का सिलसिला शुरू हुआ था। पहली बार वर्ष 1952 में आजमगढ़ की सगड़ी पूर्वी विधानसभा सीट पर कांग्रेस के बलदेव निर्दलीय प्रत्याशी शंभू नारायण से चुनाव लड़ा था। इस सीट पर कुल 83,438 वोट पंजीकृत थे, जिनमें से 32,378 लोगों ने वोट डाले, चुनाव में कांग्रेस के बलदेव को शंभूनारायण पर जीत मिली, लेकिन जीतने के बाद भी उनकी जमानत जब्त हो गई थी क्योंकि उन्हें कुल वोटों का 1/6 फीसद वोट भी नहीं मिल पाया था। मतलब बलदेव जीते फिर भी जमानत जब्त करवा बैठे थे। जब इनसे पूछा कि आप क्यों और किसके दम पर चुनाव लड़ रहे हैं? इस पर इनके रोचक जवाब मिले। कोई क्षेत्र के बेरोजगारों को नौकरी देने के लिए तो कोई देशभक्ति जगाने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में चंद मशहूर उम्मीदवारों के नाम सर्वविदित हैं। मसलन 93-वर्षीय नागमाल बजोरिया उर्फ धरती पकड़। वे तीन सीटों पर नामांकन दाखिल कर चुके हैं। सब जगह जमानत खो दी। वे दृढ़ प्रत्याशी हैं इंदौर के। अब तक 18 बार चुनाव लड़ चुके हैं। सभी हारे। मिलता जुलता व्यक्तित्व है कानपुर के घोड़ेवाला का। वे अश्वारोहण पर अभियान करते हैं।
एक थे पुणे के ओमवीर प्रकाश खांडेकर। अब तक ठीक दो दर्जन बार लड़े। जूता उनका चुनाव चिन्ह है। गुना से 1971 में महाराज माधवराज सिंधिया के खिलाफ लड़े थे। बहुधा श्रोता और पाठक आक्रोशित हो जाते हैं कि ऐसे लोग चुनाव के गांभीर्य को नष्ट कर देते हैं। पर यह पूर्ण सत्य नहीं है। बिना हास्य-परिहास के राजनीति बोरिंग हो जाएगी। सर्कस में जोकर तथा साहित्य में विदूषक भी तो होते हैं। फिर हम खबरनवीसों को यूं भी नीरसता और रूखे पन से भिड़ना पड़ता है ताकि पाठक हमारी रपट, हमारा विवरण पढ़े। मात्र यही लक्ष्य है।

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