निर्गुण और सगुण उपासको के आराध्य राम

  • लोकतंत्र के संस्थापक थे श्रीराम
  • वैश्विक स्तर पर व्यापक चेतना के संवाहक श्रीराम
     
  • वन्यप्रांत मे सभी को एक सूत्र मे जोड़ा
  • ऋषियो और मुनियों ने दिया तपोबल
बलराम कुमार मणि त्रिपाठी
बलराम कुमार मणि त्रिपाठी

निर्गुण सगुण दोनो रूप मे श्रीराम हमारे आराध्य हैं। गोरखपुर महायोगी गोरक्षनाथ की तपस्थली है.. जो अलख निरंजन का संदेश दे रही है तो संतकबीर नगर के मगहर मे जीवन के अंतिम साढ़े तीन साल संत कबीर दास ने काशी से आकर बिताये और कपड़े की बुनाई करते हुए.. इंगला पिंगला के ताना-भरनी के बीच सुषमन धागे में राम को तलाशा। ज्यों ज्यों गोरखपुर (पूरब )से अयोध्या की ओर पश्चिम मे बढ़ते रहे निर्गुण से सगुण श्रीराम मिलते गए। बस्ती के मखौड़ा मे राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया और चार पुत्र राम, लक्ष्मण ,भरत व शत्रुघ्न पाया। पवित्र सरयू नदी के तट पर बसे श्री अयोध्या धाम मे महाराजा दशरथ के राजमहल के आंगन में चारो भाईयों की किलकारी गूंजी। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और उनकी भार्या जनक नंदिनी सीता ने एक आदर्श राज्य राम राज्य यहां स्थापित किया। पहली बार जीवन की युवावस्था मे किसी राजकुमार ने चौदह साल उदासीन रहते हुए.. वन मे ऋषियों मुनियों को अभयदान देते हुए वन्य जातियों को संगठित कर रावण जैसे महाबली और अधर्मी राजा का अंत कर उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक रामराज्य का विस्तार करते हुए राजतंत्र में लोकतंत्र की बुनियाद रखी।

वैर न करु काहू सन कोई। राम प्रसाद विषमता खोई।।

सूत्र अपनाते हुए सर्वसमाज को भय मुक्त होकर अपनी बात रखने का अधिकार दिया। राम ने प्रजा के बीच यह कह कर जो अनीति कछु भाषौं भाई । तो मोहिं बरजेहु भय बिसराई।। प्रजा को सर्वोपरि माना और एक सामान्य व्यक्ति की उलाहना पर अपनी प्रिय पत्नी को पुन: वन मे भेज दिया। यद्यपि उनके शासन काल मे अरण्य भी सुरक्षित है ,यह इस बात का भी सूचक है। जहां राजा हो या रंक अपनी गर्भवती पत्नी का सुरक्षित रूप से प्रसव कराते हुए वहां निर्भय रूप से रख सकता है। इस बात का संकेत है। राम की उदारता और बाहुबल ने उन्हें राजपुरुष से मर्यादा पुरुषोत्तम बना कर ईश्वर कोटि मे पहुंचा दिया। सारे काम उनके अलौकिक लगने लगे। जो इतिहास उन्होंने रचा उसका गुणगान सदियों तक गाया जाएगा।

 

जनकपुरी बिहार- नेपाल के संबंध.. से राम मिथिला की जानकी का वरण कर अयोध्या लाये। वहीं माता कौशिल्या के मायका छत्तीस गढ़, तब कैकय देश आज के पंजाब काश्मीर के राजा अश्वपति की कन्या कैकयी,राजगीर के काशीनरेश की पुत्री सुमित्रा माता के साथ अपने सद्व्यवहार का डंका बजाया ही.. चारो भाईयो के बीच भ्रातृभाव की मिसाल सारे दुनिया के बीच आदर्श भाई के रूप मे कायम की। माताओं के साथ व्यवहार.. गुरु जनों का सम्मान.. बानर भालू पशुपक्षी सबके प्रति प्रेम भाव कायम करना और वन वासियों को भी अपना बना लेने की कला राम मे थी। इसीलिए सभी तपस्वी ऋषि मुनियों ने उन्हैं अपने अपने यज्ञ और तप से पाई सिद्धियां और दिव्यास्त्र राम को देकर उन्हे परम शक्ति से संपन्न बना दिया।

बक्सर में विश्वामित्र,बलिया मे जमदग्नि- परसुराम,बस्ती मे बशिष्ठ दक्षिण भारत मे अगस्त्य ऋषि ,सुग्रीव और हनुमान , गृद्ध राज जटायु , जामवंत और लंका के विभीषण सभी श्रीराम के व्यवहार से इनके सहायक बने। चक्रवर्ती राजा दशरथ ने हिमालय से समुद्र पर्यंत अपने राज्य का बिस्तार किया था। परंतु राजतंत्र में भी वास्तविक लोकतंत्र का शासनकाल राम के समय मे कायम हुआ। राम निर्गुण और सगुण दोनों रूप में जन जन मे हृदय मे बसने वाले जनार्दन सिद्ध हुए।

शैव- शाक्त उपासक थे श्री राम

‌अद्भुत बात है,श्रीराम के जीवन मे शैव और शाक्त दोनों के उपासना की परंपरा दिखती है‌। श्रीराम ने जहां रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना कर शिव की उपासना की वहीं देवर्षि नारद के कहने पर शक्ति उपासना कर देवी से दिव्यशक्तियां अर्जित कीं। राम कीशक्ति पूजा मे सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने उसी का संदर्भ लेकर राम की शक्ति पूजा लिखी। महाबली रावण वेदपाठी होने के साथ शिव और शक्ति का उपासक था। उस अजेय रावण को मारने के लिए उसकी दिव्यशक्तियां पाये बिना उसे जीत पाना असंभव था। रावण महाबली के साथ यज्ञ यागादिक द्वारा दिव्य शक्तियां अर्जित करने वालो को वह सामर्थ्य नहीं हासिल करने देना चाहता था इसलिए ऋषि मुनियों के यज्ञ को विध्वंस करने के लिए जगह जगह असुर छोड़ रखा था‌ अगस्त्य सूर्य उपासक थे और भगवान आदित्य से मिले दिव्यास्त्र (आदित्य हृदय)दिये ,पौराणिक आख्यानों के अनुसार देवर्षि नारद ने शक्ति उपासना के सूत्र बताये और विश्वामित्र यज्ञ द्वारा तरह तरह के दिव्यास्त्रों के अनुसंधान मे लगे थे। देवी पुराण मे लंकाविजय के पूर्व नवरात्र मे राम के शक्ति उपासना किए जाने का वर्णन है। पूर्व मे क्षत्रिय राजा रहे ऋषि विश्वामित्र तपोबल से ब्रह्मर्षि बनने मे सफल होगए । वशिष्ठ उनकी तप: साधना के कायल थे। इसलिए यज्ञ की रक्षा के लिए जब विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को राजा दशरथ से मांगा तो उन्होंने महाराज से उन्हे दोनो पुत्रों को दिये जाने की सिफारिश की। दशरथ को विश्वामित्र का पूर्व का इतिहास मालूम था। उनके की पूर्वज राजा हरिश्चंद्र के सत्य की परीक्षा मे उनकी भूमिका वे देख चुके थे। दशरथ के चारो बेटो को गुरुकुल मे शिक्षा देते समय गुरु वशिष्ठ ने साधना शिक्षा युद्ध विद्या मे निपुण बना दिया था। विश्वामित्र से और भी अनेक दिव्यशक्तियां मिल सकेंगी इसलिए भी वे विश्वामित्र के साथ राम लक्ष्मण को भेजने के पक्ष मे थे। ताड़का, सुबाहु आदि को मारने पर विश्वामित्र वे दिव्य शक्तियां राम लक्ष्मण को प्रदान कीं।इसके अलावा भूख प्यास पर विजय पाने की यौगिक सिद्धियां भी दीं। देवकाली इनकी कुल देवी और भगवान नागेश्वर नाथ इष्टदेव थे।

प्रणव का ही स्वरूप ‘राम’

यह बड़ा ही रहस्यमय तथ्य है कि वेद ने जिस प्रणव को वेद का मूल माना। जिस प्रणव ॐ से सृष्टि का उद्भव कहा । वह प्रणव ही राम नाम कह दिया। राम वर्ण विपर्यय से र+ अ+ म~अ+र+म हुआ र का (सस जुषोरु: ,सूत्र) से उ मे परिणत हुआ। इस तरह अ+उ+म =ॐ हुआ। इसे देवर्षि नारद के एक प्रश्न मे शिव जी ने तारक मंत्र बताया। इसे विष्णु सहस्रनाम के तुल्य कहा यथा ‘राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने’ ।। राम नाम के स्मरण से जीव का उद्धार होता है। पद्मपुराण में रमंते योगिनो यस्मिन् नित्यानंदे चिदात्मनि। इति रामपदेनैतत परब्रह्माभिधीयते।। कहते हुए राम नाम का महत्व प्रतिपादित किया गया। ध्यान करते समय मणिपूरक चक्र से राम का नाम लेते हुए सहस्रार तक कुंडलिनी शक्ति का उत्थान किया जासकता है‌। ध्यातव्य है कि सीताराम का मंत्र मूलाधार से सहस्रार तक का आयाम है‌। भगवान शिव काशी मे राम मंत्र की दीक्षा देते हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र माना जाता है। छ: सौ साल पहले समकालीन आचार्य रामानंद ने सीढ़ियों पर लेटे कबीर को राम नाम दिया। जिसे जप कर कबीर ने मगहर मे अंतिम काल मे मुक्ति पाई।

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