Varanasi: संस्कृति संसद में भारतीय धर्मशास्त्रों, मनुस्मृति और सनातन परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विमर्श करते हुए स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य मनुस्मृति में संशोधन करना नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रों में कथित रूप से किए गए प्रक्षेप, मूल ग्रंथों में मिलावट और विदेशों में पहुंचाई गई दुर्लभ पांडुलिपियों की वास्तविकता को सामने लाना है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में संशोधन करना न तो हमारा अधिकार है और न ही हमारा उद्देश्य। आवश्यकता इस बात की है कि मूल ग्रंथों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की प्रमाणिकता की जांच हो तथा भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक संपदा को वापस लाने के प्रयास किए जाएं।
शास्त्रों में प्रक्षेप और पांडुलिपियों की पड़ताल जरूरी
स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि भारतीय धर्मशास्त्रों में कहां और किस प्रकार प्रक्षेप किए गए, किन मूल ग्रंथों में मिलावट हुई और किन परिस्थितियों में भारत की बहुमूल्य पांडुलिपियां विदेशों तक पहुंचीं, इन सभी विषयों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इन तथ्यों को प्रमाणों के साथ समाज के सामने लाना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने भारत में मुद्रण व्यवस्था के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1556 में गोवा के पणजी में बाइबिल के मुद्रण के लिए छापाखाने की मशीन आई थी। इससे पहले भारत में ऋषि-मुनि और विद्वान ताड़पत्रों पर ग्रंथों का लेखन करते थे। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपराओं, धर्मग्रंथों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को लेकर समय-समय पर अनेक विवाद खड़े किए गए। गोस्वामी तुलसीदास के जन्मस्थान और सूरदास के जन्मकाल को लेकर भी अलग-अलग मत सामने आए। ऐसे विषयों का अध्ययन ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।
अंग्रेजों के दौर में पांडुलिपियों के संग्रह का उठाया मुद्दा
स्वामी जी ने वर्ष 1793 से पहले की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत में अंग्रेजी शासन स्थापित होने के बाद अंग्रेज न्यायाधीशों के सामने स्थानीय लोगों के मामलों में फैसले देने के लिए कानून और परंपराओं को समझने की चुनौती थी। इसी क्रम में हिंदू लॉ तैयार करने के उद्देश्य से भारतीय धर्मशास्त्रों और पांडुलिपियों का संग्रह किया गया। उन्होंने विलियम जोन्स का उल्लेख करते हुए भारतीय विद्वानों के साथ कथित अपमानजनक व्यवहार और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रदर्शित एक चित्र का जिक्र किया।
उनके अनुसार, ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेजों और चित्रों को भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि इतिहास के विभिन्न पहलुओं की जानकारी सामने आ सके। उन्होंने दावा किया कि भारत से बड़ी संख्या में पांडुलिपियां ब्रिटेन भेजी गईं। इस संदर्भ में उन्होंने रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन और लॉर्ड टिग्नामेंट बाउंस से संबंधित एक पत्र का उल्लेख किया। स्वामी जी के मुताबिक, इस पत्र में पांडुलिपियों की वापसी और उनके उपयोग से जुड़ी शर्तों का जिक्र है। उन्होंने कहा कि ऐसे दस्तावेजों की प्रमाणिकता और ऐतिहासिक महत्व की पड़ताल जरूरी है।
मनुस्मृति में संशोधन का कोई प्रस्ताव नहीं
मनुस्मृति को लेकर चल रही बहस पर स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि सभी ऋषियों ने अपने-अपने कालखंड और परिस्थितियों के अनुसार धर्म एवं समाज से जुड़े विचार प्रस्तुत किए हैं। ‘कलौ पराशर स्मृति’ की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मनुस्मृति में संशोधन की बात हम सोचते भी नहीं हैं।
ये भी पढें
UGC विवाद की सियासी गूंज! 53,615 अवैध वोटों ने बढ़ाई BJP की चिंता
उन्होंने कहा कि मनु और पितृसत्ता के नाम पर सनातन धर्म को कठघरे में खड़ा किया जाता है। ऐसे सवालों का जवाब तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर दिया जाना चाहिए। उनका कहना था कि जिस भारतीय परंपरा में नारी को शक्ति और देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, उसके संदर्भ में उठने वाले प्रश्नों पर संत समाज और विद्वानों को गंभीरता से अपना पक्ष रखना चाहिए।
श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता में समिति बनाने का प्रस्ताव
स्वामी जी ने श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता और पूज्य आचार्यों के संरक्षण में एक विशेष समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि समिति में सनातन परंपरा और व्यापक हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व हो तथा उसका काम किसी पूर्वाग्रह से प्रभावित हुए बिना प्रमाणों के आधार पर आगे बढ़े। उन्होंने अगले दो वर्षों में दुनिया के अलग-अलग देशों में उपलब्ध भारतीय पांडुलिपियों और सांस्कृतिक संपदा की पहचान करने तथा उन्हें भारत वापस लाने के लिए अभियान चलाने का आह्वान किया।
चीन, जर्मनी, फ्रांस और कनाडा में मौजूद पांडुलिपियों की वापसी पर जोर
स्वामी जी ने कहा कि भारत की अनेक महत्वपूर्ण पांडुलिपियां चीन, जर्मनी, फ्रांस और कनाडा सहित विभिन्न देशों में उपलब्ध हैं। इसके अलावा कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी और रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन में भी भारतीय पांडुलिपियां मौजूद हैं। इन सभी की पहचान कर उन्हें भारत वापस लाने के लिए संगठित प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस अभियान में आवश्यकता पड़ने पर भारत सरकार के पांडुलिपि मिशन का सहयोग लिया जा सकता है। विदेश यात्राएं करने वाले संतों और आचार्यों से भी इस दिशा में मदद लेने का सुझाव दिया।
सनातन की बौद्धिक संपदा के संरक्षण के लिए एकजुट होने का आह्वान
स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने सनातन परंपरा के विरुद्ध उठाए जा रहे विभिन्न वैचारिक सवालों का जवाब देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय धर्मशास्त्रों में कथित मिलावट, फर्जी ग्रंथों को मूल शास्त्रों के रूप में प्रस्तुत किए जाने और पांडुलिपियों के विदेश पहुंचने से जुड़े मामलों की प्रमाणों के साथ पड़ताल होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इन कथित प्रक्षेपों के आधार पर ब्राह्मण समाज और सनातन परंपरा को लेकर कई तरह के सवाल खड़े किए जा रहे हैं। ऐसे में पूरे विषय का तथ्यात्मक और प्रमाणिक समाधान जरूरी है।
नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
Google Play Store: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.nayalooknews
भारत-नेपाल सीमा पर पिकअप गाड़ी से 75 बोरी कद्दू का बीज बरामद, चालक गिरफ्तार
UN में पाकिस्तान समर्थित प्रस्ताव के खिलाफ भारत ने किया मतदान
सोनौली में पटाखा की दुकानों पर पुलिस ने मारा छापा,व्यापारियों में हड़कंप
सलमान खान की आवाज और चित्रांगदा सिंह के ग्लैमरस अंदाज ने जीता दिल
