
रंजन कुमार सिंह
New Delhi: केंद्र सरकार के विनिवेश अभियान के तहत IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया को लेकर सरकार की रणनीति, सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका और आम जनता के पैसे से खड़ी हुई संस्थाओं के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) मिलकर बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने जा रहे हैं, जिसकी कुल कीमत 52,878 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
Fairfax Financial के हाथों में जा सकता है नियंत्रण
इस प्रस्तावित सौदे में कनाडा की कंपनी Fairfax Financial Holdings का नाम सामने आ रहा है। कंपनी के प्रमुख भारतीय मूल के अरबपति प्रेम वत्सा हैं, जिन्हें अक्सर कनाडा का ‘वॉरेन बफेट’ कहा जाता है। उपलब्ध दावों के मुताबिक, सौदे में प्रति शेयर 81 रुपये की कीमत तय की गई है। हालांकि, सौदे की अंतिम स्थिति, खरीदार और मूल्यांकन की आधिकारिक पुष्टि संबंधित सरकारी दस्तावेजों से किया जाना जरूरी है।
बताया जा रहा है कि इस बिक्री के तहत केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत और LIC अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी। इस तरह कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी निजी निवेशक के पास जा सकती है। यदि सौदा इसी स्वरूप में पूरा होता है, तो बैंक के प्रबंधन और नियंत्रण में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
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हिस्सेदारी बेचने के बाद भी सरकार और LIC के पास शेयर रहेंगे
प्रस्तावित लेनदेन के बाद केंद्र सरकार के पास 15 प्रतिशत और LIC के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी रहने की बात कही जा रही है। यानी दोनों के पास मिलाकर 34 प्रतिशत शेयर रह सकते हैं। हालांकि, किसी कंपनी में हिस्सेदारी बनाए रखना और उसके प्रबंधन पर नियंत्रण रखना दो अलग-अलग बातें हैं। वास्तविक नियंत्रण का निर्धारण शेयरधारिता, मतदान अधिकारों और नियामकीय मंजूरियों के आधार पर होगा।
LIC के निवेश पर भी उठ रहे सवाल
IDBI बैंक के इतिहास में LIC की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2019 में LIC ने बैंक में बड़ा निवेश किया था, ताकि उसकी वित्तीय स्थिति को मजबूत किया जा सके। अब LIC की हिस्सेदारी बेचने की योजना को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि सार्वजनिक धन से किसी वित्तीय संस्थान को संकट से उबारने के बाद उसका नियंत्रण निजी हाथों में सौंपना कितना उचित है।
विनिवेश की नीति पर बहस तेज
IDBI बैंक की बिक्री को लेकर सरकार की विनिवेश नीति पर बहस होना स्वाभाविक है। सरकार आमतौर पर ऐसे फैसलों को बैंक की कार्यक्षमता बढ़ाने, पूंजी जुटाने और प्रबंधन में सुधार लाने के प्रयास के रूप में पेश करती है। दूसरी ओर, आलोचकों का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों का निजीकरण करते समय आम जमाकर्ताओं के हितों, रोजगार और वित्तीय सेवाओं की पहुंच को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
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One thought on “IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी बेचने की तैयारी”
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