
शारदीय नवरात्र आज से , घटस्थापना के श्रेष्ठ मुहूर्त
Lucknow : सनातन परंपरा में शक्ति की उपासना का महापर्व शारदीय नवरात्र रविवार (11 अक्टूबर) से शुरू होंगे। शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म का एक बेहद पवित्र और प्रमुख त्योहार है। शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस दिव्य अनुष्ठान में मां दुर्गा के नौ नवदुर्गा स्वरूपों की आराधना की जाती है। नवरात्रि की संपूर्ण पूजा की नींव ‘घटस्थापना’ (कलश स्थापना) पर टिकी होती है।
शास्त्रों में कलश को ब्रह्मांड का लघु रूप और तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का साक्षात वास माना गया है। यदि घटस्थापना शुभ मुहूर्त, शुद्ध दिशा और उचित विधान के साथ की जाए, तो घर में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का स्थायी संचार होता है।
आइए जानते हैं शारदीय नवरात्रि 2026 में घटस्थापना के श्रेष्ठ मुहूर्त, सही दिशा, आवश्यक सामग्री, कलश स्थापना की चरणबद्ध विधि और नारियल व जवारे (जौ) का शास्त्रीय रहस्य।

शारदीय नवरात्रि 2026: घटस्थापना के श्रेष्ठ मुहूर्त
शास्त्रों के अनुसार, घटस्थापना प्रतिपदा तिथि के पहले एक-तिहाई भाग में या फिर दोपहर के अभिजित मुहूर्त में करना परम कल्याणकारी होता है। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का त्याग करने का विशेष निर्देश रहता है।
प्रातःकालीन शुभ मुहूर्त:
समय: सुबह 06:21 AM से 10:14 AM तक
कुल अवधि: लगभग 3 घंटे 53 मिनट
अभिजित मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ व दोषमुक्त समय):
समय: दोपहर 11:48 AM से 12:36 PM तक
कुल अवधि: 48 मिनट
(नोटः यदि सुबह किसी कारणवश घटस्थापना न हो सके, तो अभिजित मुहूर्त सभी प्रकार के दोषों को समाप्त करने वाला सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त माना गया है।)
घटस्थापना के लिए आवश्यक सामग्री
जवारे के लिए: मिट्टी का चौड़ा पात्र, शुद्ध और छनी हुई उपजाऊ मिट्टी, साफ धोए हुए जौ (यव) और शुद्ध जल।
कलश व पूजन: तांबे, पीतल या मिट्टी का कलश (स्टील या प्लास्टिक का प्रयोग न करें), गंगाजल, आम या अशोक के 5 या 7 पत्ते।
कलश के भीतर डालने की वस्तुएं: शुद्ध जल, सुपारी, हल्दी की गांठ, एक चांदी या तांबे का सिक्का, अक्षत (अखंडित चावल) और दूर्वा।
नारियल की तैयारी: जटा वाला सूखा श्रीफल (नारियल), लाल कपड़ा या चुनरी, और कलावा (मौली)।
चौकी: लकड़ी की चौकी (पाटा), लाल या पीला नया वस्त्र, धूप, दीप, देशी घी, रोली, चंदन और पुष्प माला।
सही दिशा: वास्तु के अनुसार घटस्थापना कहाँ करें?
ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा): वास्तु शास्त्र और तंत्र ग्रंथों के अनुसार, घटस्थापना के लिए घर का ईशान कोण (North-East) सर्वश्रेष्ठ स्थान है। यह दिशा देवताओं और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र मानी जाती है।
वैकल्पिक दिशा: यदि ईशान कोण उपलब्ध न हो, तो उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा में चौकी स्थापित करें।
मुख की दिशा: पूजा करते समय साधक का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
घटस्थापना की संपूर्ण चरणबद्ध विधि (
शुद्धिकरण व संकल्प:
स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर मां दुर्गा के सम्मुख 9 दिनों के व्रत अथवा पूजन का निष्काम संकल्प लें
जौ का पात्र तैयार करना: मिट्टी के चौड़े पात्र में पहले शुद्ध मिट्टी बिछाएं। उस पर जौ फैलाएं, फिर हल्की मिट्टी की परत चढ़ाकर थोड़ा जल छिड़कें।
कलश तैयार करना: कलश के गले पर तीन फेरे कलावा (मौली) बांधें और उस पर कुमकुम से पवित्र ‘स्वास्तिक’ का चिह्न बनाएं। कलश में गंगाजल युक्त शुद्ध जल भरें।
कलश में दिव्य वस्तुएं डालना: जल भरे कलश के अंदर एक सुपारी, हल्दी की गांठ, अक्षत, दूर्वा और सिक्का अर्पित करें।
पल्लव और नारियल की स्थापना: कलश के मुख पर आम या अशोक के 5 या 7 पत्ते इस प्रकार सजाएं कि वे चारों ओर से बाहर फैलें। एक जटा वाले नारियल को लाल चुनरी या कपड़े में लपेटकर मौली से बांध लें।
नारियल का सही मुख: नारियल को कलश के पत्तों के ऊपर बीच में स्थापित करें। नारियल का मुख साधक (आपकी तरफ) होना चाहिए। (नारियल का मुख वह सिरा होता है जहां तीन आंखें या डंठल का जुड़ाव होता है; इसे कभी ऊपर या नीचे की ओर सीधा खड़ा नहीं रखना चाहिए, बल्कि क्षैतिज/थोड़ा झुका हुआ अपनी ओर रखें)।
अखंड दीप व आवाहन: कलश के दाईं ओर घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। वरुण देव, मां दुर्गा और समस्त नवग्रहों का आवाहन कर धूप, दीप, गंध, नैवेद्य और पुष्प अर्पित करें
जवारे (जौ) बोने का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक रहस्य
सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न की गई सबसे पहली वनस्पति ‘जौ’ (यव) ही मानी जाती है। अन्नपूर्णा और समृद्धि का प्रतीक: नवरात्रि में उगने वाले जवारे घर में आने वाली सुख-समृद्धि और आरोग्य का संकेत देते हैं। यदि जवारे घने, सीधे और हरे-सफेद उगते हैं, तो यह परिवार के लिए अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है।
वैज्ञानिक कारण: जौ अत्यंत तीव्र गति से नकारात्मक ऊर्जा को सोखकर वातावरण में प्राणवायु (ऑक्सीजन) और सात्विक तरंगों का उत्सर्जन करता है।
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