
- पार्टी के सामने बड़ा सवाल: क्या 2027 से पहले अपना खोया जनाधार वापस जुटा पाएंगी मायावती?
- छह चुनावी हार, संसद में घटता प्रतिनिधित्व और बिखरता संगठन
- कांशीराम की विरासत के सहारे नौ अक्टूबर को शक्ति प्रदर्शन
- क्या रैली की भीड़ वोट बैंक में बदल पाएगी?
भौमेंद्र शुक्ल
Lucknow: साल 2007 से 2012 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रही मायावती के लॉ एंड ऑर्डर की चर्चा यूपी की सीमा से बाहर देश के तकरीबन हर राज्यों में हुआ करते थी। तब अपने सोशल इंजीनियरिंग कार्ड के बूते मायावती ने बहुमत से सरकार बनाई थी। लेकिन एक दशक बाद ही पार्टी अर्श से फर्श पर आ गई। आज लोकसभा में बसपा का कोई नुमाइंदा नहीं है। विधानसभा का एकमात्र प्रतिनिधि उमाशंकर सिंह कल के गाल में समा चुका है। राज्यसभा का अंतिम प्रतिनिधित्व अगले माह उच्च सदन से बाहर हो जाएगा। इतना सब कुछ अनायास नहीं हुआ। कोई तो कमी बसपा सुप्रीमो मायावती और उनकी टीम ने की होगी। आज पार्टी संकट के दौर में है और सांस लेने के लिए जो राजमाइश कर रही है।

उमाशंकर सिंह
सवाल सवाल कई है लेकिन उसके उत्तर नदारद हैं। क्या बहुजन समाज पार्टी (BSP) 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस हासिल कर पाएगी? क्या मायावती दलित वोट बैंक पर पार्टी की पुरानी पकड़ मजबूत करने के साथ नया सामाजिक गठबंधन तैयार कर सकेंगी? और क्या कांशीराम के नाम पर होने वाला नौ अक्टूबर का शक्ति प्रदर्शन कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने के साथ BSP के चुनावी पुनरुत्थान का आधार बन पाएगा? लगातार चुनावी हार और संगठनात्मक चुनौतियों से जूझ रही पार्टी के सामने ये सवाल अब सबसे अहम हो गए हैं।
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कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ काबिज रही BSP आज विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व से वंचित है। राज्यसभा में पार्टी के एकमात्र सदस्य का कार्यकाल भी नवंबर में पूरा होने जा रहा है। ऐसे में कांशीराम स्मारक पर होने वाला शक्ति प्रदर्शन केवल श्रद्धांजलि या राजनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि पार्टी के मौजूदा संगठनात्मक प्रभाव और उसके मूल कैडर की सक्रियता को परखने का अवसर भी है।
कांशीराम ने जिस बहुजन राजनीति की नींव रखी थी, उसका सबसे बड़ा विस्तार मायावती के नेतृत्व में हुआ। जून 1995 में पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं मायावती देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं। उनके नेतृत्व में BSP ने दलित राजनीति को सत्ता की मुख्यधारा से जोड़ने और व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार करने की रणनीति अपनाई।

कांशीराम
2007 में बहुमत, अब सिमटता चुनावी आधार
BSP की राजनीतिक ताकत का सबसे बड़ा प्रदर्शन 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हुआ। दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाताओं को जोड़ने की रणनीति के सहारे पार्टी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। उस चुनाव में BSP को 30.43 प्रतिशत वोट मिले थे। यह परिणाम दिखाता था कि बहुजन राजनीति को व्यापक सामाजिक गठबंधन में बदलकर सत्ता तक पहुंचा जा सकता है।
लेकिन 2012 में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी दोबारा सरकार बनाने की स्थिति में नहीं लौट सकी। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी BSP सत्ता से दूर रही और 2022 में उसका प्रदर्शन और कमजोर हो गया। लोकसभा चुनावों में भी पार्टी को लगातार झटके लगे। 2014 और 2019 के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी BSP एक भी सीट नहीं जीत सकी। 2007 के विधानसभा चुनाव में 30.43 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली पार्टी का वोट शेयर 2024 के लोकसभा चुनाव में घटकर 9.39 प्रतिशत रह गया। दोनों चुनावों की प्रकृति अलग होने के बावजूद ये आंकड़े पार्टी के घटते चुनावी प्रभाव की ओर संकेत करते हैं।
दलित वोट बैंक पर बढ़ी प्रतिस्पर्धा
BSP की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उसका पारंपरिक दलित वोट बैंक रहा है, विशेषकर जाटव समुदाय का समर्थन। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दलित समाज के भीतर राजनीतिक विकल्पों का विस्तार हुआ है। भारतीय जनता पार्टी ने गैर-जाटव दलित समूहों के बीच अपना आधार मजबूत करने की कोशिश की है। वहीं समाजवादी पार्टी ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को जोड़ने के लिए PDA की राजनीति को आगे बढ़ाया है।
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम), अपनी जनता पार्टी और AIMIM जैसे दल भी दलितों और वंचित समूहों के बीच अपनी राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे BSP के सामने चुनौती केवल पुराने समर्थकों को वापस जोड़ने की नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखने की भी है।

क्या पुराने बहुजन मॉडल को नए रूप में पेश कर पाएंगी मायावती?
कांशीराम आज भी BSP के सबसे प्रमुख वैचारिक और संगठनात्मक प्रतीक हैं। हालांकि, 2027 का विधानसभा चुनाव उन परिस्थितियों में नहीं लड़ा जाएगा, जिनमें पार्टी ने 1990 और 2000 के दशक में अपना प्रभाव स्थापित किया था। दलित समाज के भीतर राजनीतिक पसंद में बदलाव आया है और अन्य दलों ने भी इस वर्ग के बीच अपनी पहुंच बढ़ाई है।
ऐसे में मायावती के सामने दोहरी चुनौती है। उन्हें अपने पारंपरिक समर्थकों के साथ संगठनात्मक संपर्क मजबूत करना होगा और साथ ही बहुजन की अवधारणा को व्यापक सामाजिक गठबंधन में बदलने की संभावनाओं पर काम करना होगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन के प्रदर्शन ने भी BSP के लिए राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाई है।
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संगठन और संसद में प्रतिनिधित्व का संकट
लगातार चुनावी हार के बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के दूसरी पार्टियों में जाने से संगठन को नुकसान पहुंचा है। विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व नहीं होने के कारण BSP की संसदीय मौजूदगी समाप्त हो चुकी है। राज्यसभा में एकमात्र सदस्य का कार्यकाल पूरा होने के बाद उच्च सदन में भी पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं रहने की स्थिति बन सकती है।
राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। निर्वाचन आयोग के नियमों के तहत राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता बनाए रखने के लिए निर्धारित चुनावी मानदंडों को पूरा करना जरूरी है। BSP की मान्यता पर अंतिम स्थिति आयोग के लागू नियमों और औपचारिक समीक्षा के आधार पर ही स्पष्ट होगी।
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रैली की भीड़ से आगे वोट में बदलने की चुनौती
नौ अक्टूबर की रैली BSP के लिए कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और संगठन की सक्रियता प्रदर्शित करने का अवसर है। इसमें जुटने वाले समर्थकों की संख्या और उनकी भागीदारी पार्टी के मौजूदा जनाधार के कुछ संकेत दे सकती है। लेकिन किसी रैली में भीड़ जुटना और मतदान के समय उसे वोट में बदलना अलग-अलग बातें हैं।
BSP के सामने अब सवाल केवल यह नहीं है कि कांशीराम की विरासत के नाम पर कितने लोग जुटते हैं, बल्कि यह भी है कि पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर कितना सक्रिय कर पाती है, नए सामाजिक समूहों तक कितनी पहुंच बनाती है और मतदाताओं का भरोसा किस तरह वापस हासिल करती है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नौ अक्टूबर का शक्ति प्रदर्शन इन सवालों का अंतिम जवाब नहीं देगा, लेकिन यह जरूर सामने ला सकता है कि BSP का संगठन किस हद तक सक्रिय है और पार्टी अपनी राजनीतिक वापसी के लिए कितनी तैयारी कर रही है। कांशीराम की विरासत और मायावती का नेतृत्व BSP की पहचान के केंद्र में बने हुए हैं। अब इस पहचान को बदलते राजनीतिक माहौल में व्यापक जनसमर्थन से जोड़ना ही पार्टी के सामने प्रमुख चुनौती है।
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One thought on “दरक गया माया का गढ़, कांशीराम की साख बचाने की कवायद में बसपा”
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