जाट लैंड में अखिलेश को क्यों दो बार कैंसिल करना पड़ी जनसभा

Akhilesh Yadav's Public Meeting

अजय कुमार

Akhilesh Yadav’s Public Meeting: उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी मतों के ध्रुवीकरण और जातीय समीकरणों की बिसात बिछती है, तो केंद्र में ‘एम-वाई’ यानी मुस्लिम और यादव गठजोड़ सबसे मजबूत धुरी बनकर उभरता है। राज्य की लगभग 20 से 22 प्रतिशत मुस्लिम आबादी और तकरीबन सात से आठ प्रतिशत यादव मतदाताओं का यह पारंपरिक मेल लंबे समय तक समाजवादी पार्टी की ताकत का मुख्य आधार रहा है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के बीच उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इस पारंपरिक समीकरण के भीतर एक सूक्ष्म और बेहद गंभीर बदलाव की सुगबुगाहट महसूस की जा रही है।

क्या सूबे का मुस्लिम वोटर एक बार फिर आंख मूंदकर अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए लामबंद होगा, या फिर वह अपने लिए किसी नए और अधिक सुरक्षित विकल्प की तलाश में है यह सवाल आज सूबे की राजनीति का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न बन चुका है।

मुस्लिम समाज के भीतर समाजवादी पार्टी को लेकर आ रहा यह बदलाव अचानक नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक असहजता और आत्मनिरीक्षण का एक लंबा दौर है। पिछले चुनावों, विशेषकर 2022 के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं ने एकमुश्त होकर समाजवादी पार्टी के पक्ष में रिकॉर्ड मतदान किया था। उस चुनाव में लगभग 79 प्रतिशत मुस्लिम वोट SP के खाते में गए थे, क्योंकि समुदाय को लगा था कि अखिलेश यादव ही भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बेदखल करने का एकमात्र ठोस जरिया हैं। लेकिन चुनाव के बाद बदले राजनीतिक परिदृश्य और SP की हार ने मुस्लिम समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया।

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समुदाय के भीतर इस बात को लेकर एक गंभीर विमर्श शुरू हुआ है कि जब भी उनके हितों, नागरिकता से जुड़े मुद्दों या सुरक्षा से जुड़े संकटों की बात आती है, तो समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अक्सर वैचारिक रूप से रक्षात्मक या मौन नजर आता है। यादव की राजनीति में हाल के दिनों में आया ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का झुकाव, हनुमान चालीसा का पाठ, मंदिरों के निर्माण और मुस्लिम नेताओं के धार्मिक प्रतीकों से दूरी बनाने की रणनीति ने मुसलमानों के एक बड़े तबके को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वे सिर्फ BJP को हराने का एक जरिया मात्र बनकर रह गए हैं।

अखिलेश का हालिया राजनीतिक नारा PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक है। इस नारे के जरिए वे अपने पारंपरिक आधार से आगे बढ़कर गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस पूरी रणनीति में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को जिस तरह से हाशिए पर या अत्यधिक सधे हुए अंदाज में इस्तेमाल किया जा रहा है, उसने मुस्लिम नेतृत्व को नाराज किया है। UP के कई प्रमुख मुस्लिम विद्वानों और संगठनों, जैसे ऑल इंडिया मुस्लिम जमात, द्वारा अखिलेश यादव को पत्र लिखकर यह मांग उठाना कि सूबे में मुस्लिम मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जाए, इसी गहरी बेचैनी का प्रतीक है। मुस्लिम समाज अब यह सवाल पूछ रहा है कि 22 फीसदी हिस्सेदारी होने के बावजूद वे केवल सात से आठ फीसदी आबादी वाले नेतृत्व के रहनुमा क्यों बने रहें।

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यह नैरेटिव समाजवादी पार्टी के कोर वोट बैंक में एक बड़ी दरार पैदा कर सकता है। इस बदलते मिजाज के बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) इस बार सूबे की कई सीटों पर पूरी ताकत से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी भले ही खुद सरकार बनाने की स्थिति में न हों, लेकिन उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश की कम से कम 30 से 40 ऐसी सीटों पर, जहां मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है, खेल बिगाड़ने की पूरी क्षमता रखती है।

ओवैसी सीधे तौर पर अखिलेश यादव की धर्मनिरपेक्षता की राजनीति पर हमला बोलते हैं और मुसलमानों को अपना स्वतंत्र नेतृत्व खड़ा करने की वकालत करते हैं। जब भी ओवैसी किसी मुस्लिम बहुल सीट पर 15 से 20 हजार वोट भी हासिल करते हैं, तो इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को होता है, क्योंकि वे वोट सीधे तौर पर SP के पाले से कटते हैं। ओवैसी का यह प्रभाव अखिलेश यादव के सत्ता के सफर को बेहद मुश्किल बना सकता है।

दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में अपने पुराने और ऐतिहासिक ‘ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम’ समीकरण को दोबारा जिंदा करने की पुरजोर कोशिशों में लगी हुई है। लोकसभा चुनावों के बाद से ही राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने दलितों और अल्पसंख्यकों के हक, उनके संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के मुद्दों को काफी आक्रामक तरीके से उठाया है। कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर BJP का मुकाबला केवल वही कर सकती है, क्षेत्रीय दल नहीं। दलित और मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए कांग्रेस जमीन पर कई तरह के सामाजिक संपर्क अभियान चला रही है।

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मुसलमानों को यह लगने लगा है कि कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वह उनके हक में समाजवादी पार्टी की तुलना में ज्यादा मुखर होकर बोल सकती है। अगर मुस्लिम वोटर का झुकाव कांग्रेस की तरफ बढ़ता है, तो SP का बना-बनाया गणित पूरी तरह ध्वस्त हो सकता है। इस त्रिकोणीय राजनीतिक रस्साकशी के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या हिंदू वोट बैंक समाजवादी पार्टी के पिछड़ा और दलित (PDA) कार्ड के चलते BJP से दूर हो जाएगा।

उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी हमेशा से पिछड़ी जातियों के हाथ में रही है। BJP ने पिछले एक दशक में गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलितों का एक बेहद मजबूत और अटूट सामाजिक गठबंधन तैयार किया है। अखिलेश यादव अपनी रणनीति के तहत इसी गठबंधन में सेंधमारी करने की कोशिश कर रहे हैं। वे लगातार जातीय जनगणना की मांग और आरक्षण के मुद्दों को उठाकर पिछड़ों और दलितों को यह विश्वास दिलाने में जुटे हैं कि उनके वास्तविक हितों की रक्षा SP ही कर सकती है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक ताकत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे का आकर्षण इतना मजबूत है कि हिंदू वोटों को पूरी तरह से काटना SP के लिए बेहद दुष्कर कार्य है।

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BJP इस काउंटर नैरेटिव को बेहद आक्रामक तरीके से जनता के बीच ले जा रही है कि SP का PDA गठबंधन केवल परिवारवाद और तुष्टिकरण का एक नया आवरण है। इसके साथ ही,  यादव द्वारा अपनाए जा रहे नरम हिंदू रुख के बावजूद, BJP उन्हें आसानी से बहुसंख्यक हितों के रक्षक के रूप में स्थापित नहीं होने दे रही है। गंभीरता से विश्लेषण किया जाए तो इस बार का चुनाव उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समाज के लिए केवल सरकार बदलने का चुनाव नहीं है, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान और वजूद को तय करने का चुनाव है।

वे इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि मतों के बिखराव का सीधा फायदा BJP को मिलेगा। इसलिए उनका एक धड़ा आज भी मजबूरी में ही सही, समाजवादी पार्टी को सबसे व्यावहारिक विकल्प मानता है। लेकिन यह समर्थन अब बिना किसी शर्त या पूर्ण निष्ठा के नहीं है। मुस्लिम समुदाय के भीतर युवाओं और प्रबुद्ध वर्ग का एक हिस्सा अब SP के ‘बंधुआ वोटर’ के ठप्पे से बाहर निकलना चाहता है। वे विकास, सुरक्षा और वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं। यदि अखिलेश यादव समय रहते इस आंतरिक बदलाव और मुसलमानों की इस खामोश नाराजगी को भांपने में नाकाम रहते हैं, और केवल यादव-मुस्लिम के पुराने अंकगणित के भरोसे बैठे रहते हैं, तो ओवैसी की सेंधमारी और कांग्रेस का बढ़ता जनाधार समाजवादी पार्टी की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है। सूबे का यह राजनीतिक मोड़ तय करेगा कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की सियासत किस करवट बैठेगी।

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