

मनमानी पर उतारू हैं निदेशक धीमान और उनकी टीम
पत्रकारों का भी फोन नहीं उठाते पीजीआई निदेशक के PRO
SGPGI Lucknow : बात राजधानी लखनऊ के संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) की है। अगर आप किसी को एडमिट कराना चाहते हैं तो पुलिस वालों से मजबूत सम्बन्ध रखिए। ये ‘नया लुक’ नहीं कह रहा हैं, वहां इलाज करा रहे मरीजों और उनके तीमारदारों का कहना है। पुलिस वालों की सिफारिश पर ये तेजी से कार्य करते हैं। पुलिसवालों के अलावा ये किसी की सुनते हैं तो केवल और केवल मुख्यमंत्री कार्यालय की। यदि ‘पंचम तल’ से आपके लिए कोई संदेश SGPGI पहुंचा है तो वो झटपट इलाज करना शुरू कर देंगे, बाकी कहीं से भी टरका देना इनकी आदत में शुमार है। इनके आगे उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक और अपर मुख्य सचिव का संदेश कोई मायने नहीं रखता। सीधे ‘सरकार’ से ताल्लुक रखने वाले निदेशक और उनके कर्मचारियों ने तय कर रखा है कि यदि पंचम तल की सिफारिश है तो बात होगी।

सरकारी अस्पतालों में मरीजों का लोड ज्यादा है। डॉक्टर जल्दी-जल्दी देखते हैं और जितनी जल्दी हो सके, मरीज को अपने सामने से हटाने में लगे रहते हैं। ये उनकी मजबूरी भी हो जाती है। सैकड़ों लोगों की भीड़ बाहर खड़ी इंतजार कर रही हैं। लोग लाइनों में खड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। कुछ चिल्ल-पों मचा रहे हैं। हल्ला-गुल्ला के बीच वह जल्दी-जल्दी मरीजों को देखता हैं। संतकबीर नगर के नाथनगर से आए एक मरीज के साथ भी यही हुआ। लोहिया के डॉक्टर ने दवा दी, ड्रॉप दिया और कहा कि ठीक हो जाएगा, चिंता की बात नहीं है। जब तीन दिनों तक दवा असर नहीं दिखाई तो परिजनों ने कहीं और दिखाने का तय किया। एक निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर को अलीगंज के एक अस्पताल में दिखाया गया। उन्होंने मरीज देखा और कुछ जांचें लिख दीं। अगले दिन तक जांच रिपोर्ट आई तो उन्हें रिपोर्ट दिखाने परिजन पहुंचे। उन्होंने गम्भीर बीमारी देखी तो सीधे राजधानी लखनऊ के सबसे बड़े अस्पताल SGPGI रिफर कर दिया। कहा- ‘ब्रेन की हड्डी गलनी शुरू हो गई है, बचाना है तो SGPGI में एडमिट करा दो… अन्यथा बचाया नहीं जा सकता।
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SGPGI का नाम सुनते ही होश फाख्ता हो गए। बड़ा सवाल गूंजा- ‘कैसे एडमिट कराया जाए?’ तब दिमाग में आया कि उपमुख्यमंत्री और मौजूदा स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक से सम्पर्क किया जाए। उनका फोन जो मीडिया के लोगों के पास है उनका कोई न कोई पीआरओ ही उठाता है। सीधे उन्हें परेशानी बताई। उन्होंने कहा कि अमित द्विवेदी को डिटेल्स भेज दीजिए, ये आपकी मदद करेंगे। मन में कई सवाल थे। अपर मुख्य सचिव से सीधे बात करने की सूझी। लेकिन खुद को रोका और कहा कि यदि एक बड़ी अथॉरिटी के वहां से मैसेज जाएगा तो कार्य हो ही जाएगा। लेकिन तब भी उनके कैम्प के एक पीए से अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि मैं फोन कर दूंगा, मैसेज मैं तभी भेजता हूं, जब ‘सर’ का आदेश होता है। लाख मनुहार के बाद उन्होंने फोन किया। जब मैं पीजीआई पहुंचा तो रजिस्टर में नाम नोट था। मुझे भी इमरजेंसी से लेकर मुख्य पीआरओ कार्यालय तक भगाया गया। लेकिन जवाब यही मिला कि बिना विशेषज्ञ एडमिट करने के क्या फायदा?
लेकिन ओपीडी में विशेषज्ञ डॉक्टर ने यह कह दिया कि हड्डी गल रही है तो दाखिला क्यों नहीं ले रहे? जगह नहीं है या फिर जान की कीमत नहीं है। फिर साफ-साफ क्यों नहीं कहा कि किसी निजी अस्पताल में चले जाइए? ब्रेन की हड्डी गल रही है और एडमिट भी नहीं कर रहे, वो भी तब जब डिप्टी सीएम के वहां से सिफारिश गई। लगातार कई कॉल (8004901818) के बाद किसी अजय नाम के शख्स ने फोन उठाया। फोन उठाते ही उन्होंने कहा कि आप किस मीडिया से हैं, मैं भी दैनिक जागरण छोड़ के आया हूं। ऊपर से यह भी बता दिया कि एक ही फोन पर पूरे उत्तर प्रदेश से फोन आता है, कैसे सबका फोन उठा लूं। यदि फोन ही उठाता रहूं तो टेलिफोन ऑपरेटर बन जाऊंगा। अब सवाल सरकार से करें या फिर डिप्टी सीएम से। शासन से करें या खुद से दिमाग चकरघिन्नी है… अगली बार फिर लिखूंगा…। तब तक आप किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के लॉरी कार्डियोलॉजी का एक वाकया पढ़िए।
किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी का भी वही हाल
क्या लिखूं। क्या न लिखूं। मन व्यथित हैं। सरकार के असहाय होने की खबर लिखूं या मंत्री के खत्म हो चुकी इकबाल की कथा लिखूं। मेडिकल कॉलेज लखनऊ में जर्जर हो चुकी चिकित्सा व्यवस्था पर लिखूं या एक डॉक्टर के अमानवीय चेहरे की कहानी लिखूं। लिख दूं तो आप भी समझ जाएंगे कि सरकार का इकबाल दम तोड चुका है। डॉक्टर अमानवीय हो चुके हैं। पैसे के साठगांठ ने भगवान को शैतान बना दिया है। कहानी की शुरुआत 18 अप्रैल 2026 की शाम छह बजे होती है। एक मरीज सीताराम पांडेय, जिनकी वय 70 साल के आसपास है, को एक प्राइवेट अस्पताल इसलिए रेफर करने पर आमादा हो जाता है क्योंकि उनकी रिपोर्ट HIV पॉजिटिव आ जाती है। लाख मनुहार के बाद भी जब वो नहीं माने तो फैसला हुआ लारी कार्डियोलॉजी चला जाए। अब वहां आसानी से एडमिशन नहीं मिलता, लिहाजा सोर्स सिफारिश शुरू की गई। पहला फोन विधान सभा के OSD डॉ रमेश तिवारी को किया। उन्होंने लारी कार्डियोलॉजी के PRO को फोन किया। PRO एडमिट करा पाएगा, सोच के संशय हुआ। मैंने चिकित्सा विभाग के एक विशेष सचिव को फोन किया। इस आशय से कि रजिस्ट्रार भी उनकी तरह PCS सेवा से होंगे या प्रमोट हुए होंगे। उन्होंने न केवल फोन किया, बल्कि पलट के ये भी बता दिया कि जाइए, फोन आ जाएगा और देख रेख ठीक हो जाएगा।

जब आपका अपना कोई गंभीर हो तो मन हर जगह सपोर्ट चाहता है। मैने लखनऊ के लोकल विधायक और स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक को फोन किया। फोन का रिस्पॉन्स भी मिला और उनकी तरफ से अरुण ने कहा कि CMS से बात हो गई है, आपको कोई परेशानी नहीं होगी। मैं लारी कार्डियोलॉजी पहुंचा। PRO ने पेपर लिया और डॉक्टर के पास पहुंचा। ड्यूटी पर एक लेडी डॉक्टर थीं, उन्होंने कहा पेशेंट ले आइए। मैं तुरंत गोमती नगर के निजी अस्पताल से उन्हें लारी कार्डियोलॉजी शिफ्ट कराने में जुट गया।
एम्बुलैंस सेवा दिख गई तो मन में आया एक बार हमें भी ये प्रयास करनी चाहिए। लिहाजा 108 डायल किया गया। वहां से झटपट एक एंबुलेंस आई लेकिन वो मरीज को लेकर इसलिए लारी कार्डियोलॉजी नहीं आई, क्योंकि उनके वहां नियम है कि नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया जाएगा। वो बार बार लोहिया ले जाने की जिद कर रहा था। मैंने खुद एक बार 108 डायल किया। कई बार फोन होल्ड पर डालने के बाद फोन वाली लड़की ने कहा मैं अपने सीनियर से बार कराती हूं। फिर कई बार फोन होल्ड हुआ। तब भी उनसे बात नहीं हो पाई। एक बार बात हुई तो उसने अपनी सहमति दी। हम अपने रिश्तेदार को किसी तरह लारी कार्डियोलॉजी शिफ्ट करा पाए।
वहां डॉ रविकांत ने मरीज देखा और एक दो जांच कराई। जांच के बाद सीधे 15 दिन की दवा लिखी और कहा, आप घर ले जाइए। घर के बच्चे परेशान हो गए। रोने लगे। मुझे बताया। मैं आनन फानन लारी पहुंचा। डॉ रविकांत से बात की। उन्होंने मुझे भी समझाया, कहा ऐसा कुछ नहीं हुआ है कि मैं एडमिट रखूं। आप लोग घर ले जाइए। हम लोग उनसे मिन्नत कर रहे थे। मनुहार करने में जुटे रहे। वो नहीं पसीजे। PRO के पास पहुंचा वो साथ में आए तो उन्हें भी रिस्क बता दिया। लिहाजा थक हार कर मंत्री को फोन किया। मंत्री ने रिस्पॉन्स दिया और मुख्य PRO के पास भेजा। मैं भी तीमारदार के साथ मुख्य PRO के पास पहुंचा। PRO मैडम ठहरी, बड़ी अधिकारी। उन्होंने जाल के अंदर से बात की और एक लड़का भेज दिया साथ। उन्होंने भी मंत्री, विशेष सचिव और विधान सभा के OSD के फोन को इतना ही तवज्जो दिया। मुख्य PRO के संदेश वाहक को भी डॉ रविकांत ने समझा दिया। मुझे लगा अब डॉक्टर मंत्री, नेता, अफसर, विधायक और पत्रकार की नहीं सुनता होगा। इसलिए एक डॉक्टर को कॉल किया। उसने दो टूक लहजे में मना किया कि लारी कार्डियोलॉजी के डॉक्टर मनमानी करते हैं। सॉरी भाई।
मंत्री का संदेश आया है, ये सुनकर डॉक्टर ने रात भर रहने की इजाजत दी, लेकिन अलसुबह छह बजे डिस्चार्ज कर दिया। ऑक्सीजन सपोर्ट और 85/43 ब्लड प्रेशर के मरीज को बाहर भेज दिया। परिजनों ने ART सेंटर में नंबर लगाया तो वहां से डॉक्टर ने इमरजेंसी में एडमिट कराया। अब सीताराम पांडेय ट्रॉमा के मेडिसिन विभाग की इमरजेंसी में जीवन और मौत से जूझ रहे हैं। कहानी खत्म। सवाल यह कि लारी कार्डियोलॉजी का डॉक्टर मनमानी पर आमादा था या फिर सरकार के इकबाल की उनके जैसे डाक्टरों को कोई डर नहीं है। ऑक्सीजन सपोर्ट के मरीज को जबरिया बाहर कर देने की सजा उसे मिलनी चाहिए या फिर ईनाम। इसे मंत्री का फेल्योर कहना चाहिए या नौकरशाही की असफलता।
एक मंत्री क्या कर सकता है फोन, सिफारिश और आदेश। इलाज तो डॉक्टर को करना होता है। वो मनमानी कर रहा है तो उसे किसी न किसी का सपोर्ट होगा। क्या शासन में बैठे किसी अफसर के बूते वो इतनी हनक दिखा रहा है या फिर पैसे के दम पर। सूत्रों का कहना है कि यहां से अधिकांश डॉक्टरों का निजी अस्पतालो से बड़ा साठगांठ है। वो वहां के मरीजों को सीधे भरती करते हैं। इलाज करते हैं और बड़ा पैसा ऐंठते हैं। दवा कारोबारियों से इनकी बड़ी पटती है। ये उनकी महंगी महंगी दवाईयां लिखते हैं और मोटा कमीशन भी वसूल करते हैं। डॉक्टर PRO की नहीं सुनता। डॉक्टर मंत्री की नहीं सुनता। डॉक्टर अफसर की नहीं सुनता। फिर वो अपना निजी अस्पताल क्यों नहीं चलाता? रजिस्ट्रार और कुलपति क्यों तैनात किया जाता है? क्या ये दोनों पद केवल बजट का हिसाब किताब करने के लिए ही होता है? क्या मंत्री के फोन की इतनी भी इज्जत नहीं कि PRO सीधे डॉक्टर से संवाद कर सके? क्या प्राइवेट गार्ड उनकी दलाली के लिए तैनात रहता है, वही पर्चा हाथ में पकड़े तो डॉक्टर देखेगा?
एक कहानी और
कुछ दिन पहले की बात है। स्थानीय विधायक नीरज बोरा के किसी परिजन की तबियत खराब थी। वो स्वयं आए लेकिन डॉक्टरों ने उनसे बहस कर लिया। सभी डॉक्टर एकजुट होकर चिकित्सा का बहिष्कार करने की धमकी देने लगे। अन्दर के मरीजों और उनके परिजनों को जब लगा कि डॉक्टर आंदोलन पर उतारू हो जाएंगे तो वो भी विधायक का विरोध करने लगे। ये देखकर विधायक पीछे हट गए। ये गर्वित गाथा रविकांत के निजी गार्ड ने सुनाई। एक सवाल और … क्या कोई ऐसा धड़ा है, जो अंदरखाने मंत्री को असफल करने में जुटा हुआ है? क्या कोई ऐसा गुट है जो ये कहता फिर रहा है कि मंत्री की n भी सुनोगे तो तुम्हारा कुछ नहीं होगा? सवाल हजारों हैं, जवाब कौन देगा भगवान जानें।

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