
लखनऊ कोर्ट में वकील से मारपीट मामले में बड़ा अपडेट, हाईकोर्ट ने IB की जगह इंटेलिजेंस को सौंपी जांच
Lucknow : राजधानी लखनऊ के कैसरबाग स्थित जिला कोर्ट परिसर में दिल्ली से आए अधिवक्ताओं और एक वादी के साथ कथित मारपीट के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने मामले में स्थानीय अधिवक्ताओं की गतिविधियों और पृष्ठभूमि की गोपनीय जांच अब यूपी पुलिस के इंटेलिजेंस विभाग को सौंपने का आदेश दिया है। इससे पहले कोर्ट ने जांच की जिम्मेदारी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) को दी थी, लेकिन केंद्र सरकार की आपत्ति के बाद आदेश में बदलाव किया गया।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि अब यह गोपनीय जांच यूपी पुलिस के इंटेलिजेंस विभाग द्वारा की जाएगी और इसकी निगरानी पुलिस महानिदेशक (इंटेलिजेंस) करेंगे। मामले में अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
IB ने जांच से क्यों किया इनकार?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश डिप्टी सॉलिसिटर जनरल एसबी पांडेय ने अदालत को बताया कि IB का कामकाज और उसका निर्धारित क्षेत्र अलग है। कोर्ट के पूर्व आदेश में जिस तरह की जांच करने का निर्देश दिया गया था, वह IB के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती।
केंद्र सरकार की इस दलील को अदालत ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद हाईकोर्ट ने अपने पुराने आदेश में संशोधन करते हुए जांच की जिम्मेदारी UP पुलिस के इंटेलिजेंस विभाग को सौंप दी। अदालत ने पुलिस महानिदेशक (इंटेलिजेंस) को इस मामले में पक्षकार बनाने का भी निर्देश दिया है।
यह पूरा मामला 21 जुलाई 2026 को कैसरबाग कोर्ट परिसर में हुई कथित घटना से जुड़ा है। आरोप है कि दिल्ली से आए अधिवक्ताओं और उनके एक वादी के साथ मारपीट की गई और न्यायिक कार्यवाही में बाधा पहुंचाने की कोशिश हुई। घटना को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका के तौर पर मामले की सुनवाई शुरू की थी।
117 एकड़ जमीन के मामले में भी हाईकोर्ट सख्त
इसी खंडपीठ ने औद्योगिक भूमि से जुड़े एक अन्य मामले में भी महत्वपूर्ण आदेश दिया है। मोदी रबर लिमिटेड को आवंटित करीब 117 एकड़ जमीन में से लगभग 59 एकड़ भूमि के कथित अवैध हस्तांतरण के आरोपों की नए सिरे से जांच कराने का निर्देश दिया गया है।
अदालत ने राजस्व परिषद के अधिकारियों की एक समिति को छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपने को कहा है। इसके बाद सरकार को रिपोर्ट मिलने के तीन सप्ताह के भीतर उचित निर्णय लेना होगा।
मामले में पहले की जांच को लेकर भी कोर्ट ने सवाल उठाए। अदालत को बताया गया कि जिला स्तर की शुरुआती जांच में जमीन हस्तांतरण से जुड़े आरोप सही पाए गए थे। इसके बाद शासन स्तर पर जांच के लिए राजस्व परिषद के अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि, बाद में तैयार की गई रिपोर्ट को अदालत ने अनिर्णायक बताया और नई जांच का निर्देश दिया।
पिछले आदेशों के अनुपालन में हुई देरी पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर 25 हजार रुपये का हर्जाना भी लगाया है। अब अदालत की नजर नई जांच रिपोर्ट पर रहेगी। इस मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर को निर्धारित की गई है।
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