यूपी का सियासी तारण अबकी करेंगे ब्राह्मण

UP Politics 2027

आदेश शुक्ला

UP Politics 2027 : भारतीय जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां ब्राह्मणों का योगदान न हो। जीवन को यदि हम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पुरुषार्थ में बांट दें तो पाते हैं कि चारों पुरुषार्थों में ब्राह्मणों ने असाधारण योगदान दिया है। मगर सियासत में तो आजादी के बाद से ही 90 के दशक तक ब्राह्मणों का वर्चस्व कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक कायम रहा। अब जबकि 11 महीने बाद यूपी में विधानसभा का चुनाव है,

जहां ब्राह्मणों का आबादी तकरीबन 14 फीसदी है, वहां अबकी बार ब्राह्मण किसके साथ कदमताल करेंगे, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है और यह भी स्पष्ट है जिधर ब्राह्मण जाएंगे, साल 2027 के रण में उन्हीं की सरकार बनेगी। क्या है पूरा मसला और ब्राह्मण का झुकाव किधर है। सियासत की बात तो दीगर है, लेकिन आज भी अगर ब्राह्मण न रहे तो जीवन के किसी भी क्षेत्र में एक डग भी आगे बढ़ना इंसान को, कम से कम सनातनी लोगों को मुश्किल हो जाएगा। ब्राह्मणों का अहमित अब उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रही है।

आजादी के बाद से 1989 तक यूपी में छह ब्राह्मण मुख्यमंत्री हुए। पहले ब्राह्मण मुख्यमंत्री थे पं. गोविंद वल्लभ पंत। दूसरी ब्राह्मण मुख्यमंत्री थीं-सुचेता कृपलानी। तीसरे सीएम थे- पं. कमलापति त्रिपाठी। चौथे ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने- हेमवती नंदन बहुगुणा, पांचवे ब्राह्मण सीएम बने- पं. श्रीपति मिश्र और अंतिम ब्राह्मण सीएम थे- नारायण दत्त तिवारी। इन्हें प्यार से लोग एनडी तिवारी भी कहते थे। अखिलेश यादव ने जो अपना पीडीए तैयार किया है, क्या उस पीडीए के साथ आसन्न चुनाव में ब्राह्मण कदमताल करेंगे। गौरतलब है कि अभी तक ये पूरी बिरादरी मौन धारण किए हुए हैं। पिछले चुनाव (साल 2022) में भी हल्ला था कि ब्राह्मण योगी आदित्यनाथ से नाराज चल रहे हैं। लेकिन अंत में ब्राह्मणों के बहुतायत वोट भारतीय जनता पार्टी को मिले। हालांकि बीजेपी की सीटें साल 2017 के चुनाव की तुलना में घट गईं।

उसी दौरान सियासी पंडितों ने फलाफल निकाला कि कुछेक ब्राह्मण योगी की राजपूताना रेजिमेंट के कारण अखिलेश के संग चले गए थे। सपा के पाले में ब्राह्मणों को ले जाने में दो लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। एक थे- मनोज पांडेय, जो अब बीजेपी में हैं। दूसरे हैं- यूपी विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय। हालांकि माता पांडेय के बारे में लोगों की यह धारणा है कि माता बाबा सपा के ‘शो ब्वॉयÓ हैं। गौरतलब है कि जब देश आजाद हुआ, उस दौरान मौलाना अबुल कलाम आजाद भारत के पहले वजीर-ए-तालीम थे। उन्हें जिन्ना ने कहा था कि मौलाना आजाद कांग्रेस के ‘शो ब्वॉय’ हैं।

जहां तक यूपी की राजनीति का सवाल है तो ब्राह्मण और राजपूतों की लड़ाई कांग्रेस के जमाने से ही चलती आ रही है। इस जंग की शुरुआत गोरखपुर से हुई थी। कालांतर में यह इलाहाबाद तक पहुंच गई। गोरखपुर में जब तक कांग्रेस के दिग्गज राजपूत नेता वीर बहादुर सिंह जीवित रहे, जो कि यूपी के मुख्यमंत्री भी रहे और राजीव गांधी मंत्रिमंडल के सदस्य भी थे, उन्होंने 80 के दशक में अपने जीते जी हरदम ब्राह्मणों को हाशिये पर रखा।

यहां तक कि पं. कमलापति त्रिपाठी के पुत्र लोकपति त्रिपाठी जो कि वीर बहादुर मंत्रिमंडल में मंत्री थे, उन्हें नम्बर-2 का भी दर्जा नहीं मिला था। यह भी एक फैक्टर था कि पं. कमलापति त्रिपाठी इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से नाराज रहते थे। पं. कमलापति त्रिपाठी की एक खास आदत थी, जिस तरह से वीर बहादुर सिंह राजपूतों को सींचते थे, उसी तरह यूपी की राजनीति में वो ब्राह्मणों का ख्याल रखा करते थे। लेकिन वीर बहादुर सिंह राजनीति में इतने दबंग थे कि जब तक वो जीवित रहे, लाख कोशिश के बावजूद भी पं. हरिशंकर तिवारी की कांग्रेस में इंट्री नहीं हो सकी थी।

कांग्रेस में पं. हरिशंकर तिवारी की आमद तब हुई, जब वीर बहादुर ने दुनिया को अलविदा कह दिया था। ठीक इसी तरह राजपूत नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह का उदय हुआ, तब वीर बहादुर एवं वीपी सिंह की आपस में ही ठन गई थी। वीपी सिंह ब्राह्मणों के लिए ‘सॉफ्ट कार्नरÓ रखते थे। लेकिन यूपी के राजपूतों ने वीपी सिंह को अपना नेता नहीं माना। उनकी नजर में राजपूतों के एकमात्र नेता वीर बहादुर ही थे। कमोबेश वहीं हाल आज की राजनीति में भी है। यूपी में ठाकुरों के एकमात्र नेता हैं- योगी आदित्यनाथ। यूपी में राजपूतों की तादाद करीब सात-आठ फीसदी है। वहीं ब्राह्मणों की संख्या करीब 13 प्रतिशत के आसपास है।

 

भूमिहार एक से डेढ़ प्रतिशत हैं। इन सबों ने बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद आंख मूंदकर बीजेपी का साथ दिया है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि जबसे पंकज चौधरी ने बीजेपी के यूपी ईकाई की कमान संभाली है, तब से ऐसा लग रहा है कि पंकज चौधरी राजपूतों से किसी मुद्दे पर वो कैफियत तलब नहीं करते हैं, लेकिन ब्राह्मणों को आंखें तरेरने में वो तनिक भी पीछे नहीं रहते। यह बात ब्राह्मणों के दिलों में बैठ गई है। गौरतलब है कि यूपी की राजधानी में कुटुम्ब बैठक हुई तो किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन जैसे ही ब्राह्मण विधायक पीपी पाठक की अगुआई में सहभोज पर जुटे, चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। यूपी के नवागत प्रदेश अध्यक्ष भी पीछे नहीं रहे और उन्होंने नसीहतों का पिटारा ऐसा खोला कि जहां गए ब्राह्मणों पर गरजते-बरसते रहे। बताते चलें कि पंकज को राजनीतिक ककहरा बीजेपी के दिग्गज नेता रमापति राम त्रिपाठी ने ही सिखाई है।

अखिलेश यादव की अब दिली ख्वाहिश है कि अब ब्राह्मण जो सूबे में करीब 14 फीसद हैं, वो उनके संग उनकी पलटन में शामिल हो जाएं। ताकि 2027 के मार्च में वे सत्ता की सवारी कर सके। लेकिन ‘नया लुक’ अखिलेश यादव से दो टूक लहजे में सवाल कर रहा है कि अगर अखिलेश ब्राह्मणों के इतने शुभचिंतक हैं और चाह रहे हैं कि ब्राह्मण उनके साथ जुड़ जाए तो उन्हें मुनादी करनी चाहिए कि अगर वो सत्ता में आते हैं तो ढाई साल वो मुख्यमंत्री रहेंगे और ढाई साल के लिए किसी ब्राह्मण को वो सीएम की कुर्सी सौंप देंगे।

ऐसा हुआ तो शायद ब्राह्मण साल 1989 के बाद के सूखे को समाप्त करने के लिए सपा के साथ चले जाएं। अन्यथा की स्थिति में वो  PDA के ‘पी’ यानी पिछड़ा, डी यानी दलित और ए यानी अल्पसंख्यक में कहां दिखाई पड़ रहे हैं। यूपी बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता आनंद दूबे भी यही सवाल करते हैं। वो कहते हैं कि अखिलेश यादव यदि ब्राह्मणों के हितैषी हैं तो बताएं कि पीडीए में उन्होंने ब्राह्मणों को कहां रखा है। क्या वो ब्राह्मणों को धर्म परिवर्तन कराकर अल्पसंख्यकों के ‘ए’ वाले कोटे में शामिल कराना चाह रहे हैं?

वरिष्ठ पत्रकार अशोक राजपुत कहते हैं कि अखिलेश में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो ब्राह्मण सीएम की मुनादी कर सकें। यदि उन्होंने ऐसा किया तो उनके यादव मतदाता बिखर जाएंगे। बताते चलें कि यूपी में यादव बिरादरी के लोग करीब 12 फीसद हैं। अंदरूनी खबर है कि माता प्रसाद पांडेय को सपा के बहुत सारे निर्णयों की भनक तक नहीं लगती है। अखिलेश सीधे सभी फैसला लेते हैं। गौरतलब है कि अखिलेश ब्राह्मणों को मिलाने के लिए इसलिए बेचैन हैं

, क्योंकि मायावती ने अपने शुरुआती दिनों में नारा दिया था- ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’। लेकिन माया को जब इससे कोई फायदा नहीं हुआ तो वो उन्होंने पलटी मारी। ब्राह्मणों को अपने पाले में करने के लिए उन्होने नया नारा गढ़ा- ‘हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं।’ उनका यह सियासी चाल रंग लाया और लखनऊ के मशहूर वकील पं. सतीश चंद्र मिश्रा को राज्यसभा सीट मुहैया कराया। उन्हें दूसरा फायदा यह हुआ कि सतीश मिश्रा मायावती का केस-मुकदमा भी देखने लगे। तीसरा मायावती अकेले साल 2007 के विधानसभा के चुनाव में सत्ता की सवारी करने लगीं।

अखिलेश को यह नहीं समझ आ रहा है कि वो ब्राह्मणों के आगे कौन सा चारा फेंके कि वो उनकी ओर आकर्षित हो जाए। अभी हाल ही में ब्राह्मण समाज के कुछ संतों ने अखिलेश पर व्यंग्य करते हुए वोटरों को सावधान किया था- ‘सावधान, शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लेकिन उसमें फंसना नहीं।’ अब पंकज और योगी दोनों को यह साफ करना पड़ेगा कि उनकी पार्टी ब्राह्मण विरोधी नहीं शुभचिंतक है और यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक को इस दिशा में सटीक कदम उठाने होंगे।

गणतंत्र दिवस के दो दिन पहले राजधानी लखनऊ पहुंचे गृहमंत्री अमित शाह ने ब्रजेश पाठक से इस मुतल्लिक सियासी मंत्र भी दिया है। वह सियासी मंत्र क्या है, इसका खुलासा तो नहीं हुआ है लेकिन इस राजनीतिक गुफ्तगू के बाद सत्ता के गलियारे में यह बात पसर चुकी है कि ब्रजेश पाठक को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वो येन-केन-प्रकारेण ब्राह्मणों को टूटने न दीजिए, वरना ब्राह्मण टूटे तो सूबे की सत्ता हाथ से छूट जाएगी।

\साइकिल की सवारी से बहुत से लोग विधानसभा पहुंच जाएंगे और कमल का खिलना मुश्किल हो जाएगा। खबर है कि पाठक ने गृहमंत्री से यह वायदा भी किया है कि किसी भी सूरत में ब्राह्मण पीडीए के साथ नहीं जाने पाएंगे। उन्होंने इसके बारे में अपना फंडा भी गृहमंत्री के सामने साफ कर दिया है। देखना यह है कि जैसे-जैसे चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होती जाएगी वैसे-वैसे ब्राह्मण किस दिशा में अपना कदम बढ़ाते हैं। लेकिन ‘नया लुक’ ने कई आम ब्राह्मणों से बात की, जिनको सियासत से मतलब नहीं है, उन्होंने साफ-साफ कहा कि योगी आदित्यनाथ में लाख बुराइयां हों, लेकिन यूपी के शासन को उन्होंने सुशासन में बदला है। उनका यही सुशासनी मंत्र सत्ता की मलाई खाने का मौका देंगे।

गौरतलब है कि योगी की राजनीति का मूल स्वभाव स्पष्टता है। वे न धुंधली भाषा में बात करते हैं, न ही संकेतों में कोई जवाब देते हैं। यही स्पष्टता उनके समर्थकों के लिए ताकत है और सत्ता के गलियारों के लिए सबसे बड़ा संकट। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक उनका विरोध केवल विपक्षी नहीं करते, बल्कि अपनों में भी उनका विरोध है। यूपी में एक के बाद एक घटती घटनाएं, कभी प्रशासनिक विवाद, कभी सामाजिक तनाव, कभी अचानक उछाले गए मुद्दे केवल संयोग नहीं। यह वही पैटर्न है, जो पहले भी सत्ता के भीतर किसी प्रभावशाली चेहरे को सीमित करने के लिए अपनाया जाता रहा है। योगी समायोजन की राजनीति में विश्वास नहीं रखते। वे उस राजनीति के प्रतिनिधि हैं, जो ‘मैनेजमेंट’ की बजाय ‘कमांड’ से चलती है। इसलिए उन्होंने जब भी किसी सजातीय नेता का साथ दिया तो ताल ठोंक के दिया। यही कारण है कि आज यूपी नहीं पूरे देश में राजपूतों के सबसे बड़े नेता के रूप में वो स्थापित हो चुके हैं। आज देश का दो प्रतिशत वोट बैंक उनके इशारों पर कहीं भी शिफ्ट हो सकता है।

यूपी की ब्राह्मण राजनीति यूपी की ब्राह्मण राजनीति

यूपी की राजनीति में ब्राह्मण नेतृत्व को लेकर एक नई बहस तेज होती दिख रही है। हाल के घटनाक्रमों, विशेषकर लखनऊ स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन के बाद यह चर्चा और मुखर हो गई है कि प्रदेश को एक ऊर्जावान, स्वीकार्य और संवादशील ब्राह्मण चेहरा चाहिए। उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण नेतृत्व का लम्बा इतिहास रहा है। कांग्रेस के दौर में अनेक ब्राह्मण मुख्यमंत्री हुए, जिनमें अंतिम प्रमुख नाम नारायण दत्त तिवारी का रहा। उनके कार्यकाल को प्रशासनिक दक्षता और विकास उन्मुख राजनीति के लिए याद किया जाता है। वहीं भाजपा के संदर्भ में भी यह देखा गया है कि जब प्रदेश संगठन या सत्ता में ब्राह्मण नेतृत्व को प्रमुखता मिली, तब पार्टी को व्यापक सामाजिक संतुलन साधने में लाभ हुआ। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में लक्ष्मीकांत बाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने ऐतिहासिक सफलता अर्जित की।

इस पूरे परिदृश्य में बृजेश पाठक का नाम तेजी से उभरकर सामने आया है। वहीं दूसरी ओर डॉ. दिनेश शर्मा के प्रति असंतोष और तीखी नारेबाज़ी ने यह संकेत दिया कि राजनीतिक स्वीकार्यता केवल पद से नहीं, बल्कि जनसंवाद और सक्रिय उपस्थिति से तय होती है। कार्यक्रम में वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र की मौजूदगी में हुआ विरोध यह दर्शाता है कि ब्राह्मण समाज के भीतर भी पीढ़ीगत परिवर्तन की मांग उठ रही है। यह तथ्य इस बहस को बल देता है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण नेतृत्व केवल जातीय समीकरण का विषय नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन और राजनीतिक संदेश का भी प्रश्न है।

इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हुए सम्मेलन में जो घटनाक्रम सामने आया, वह केवल व्यक्तिगत विरोध या समर्थन का मामला नहीं था। यह उस मनोविज्ञान का प्रतिबिम्ब था जिसमें समाज का एक बड़ा वर्ग अपने प्रतिनिधि से सक्रिय संवाद, उपलब्धता और संवेदनशीलता की अपेक्षा करता है। डॉ. दिनेश शर्मा, जिन्हें ब्राह्मण कोटे से डिप्टी सीएम बनाया गया था और जो वर्तमान में राज्यसभा सदस्य हैं, उनके प्रति असंतोष ने यह संकेत दिया कि केवल संगठनात्मक पद या संसदीय उपस्थिति से समाज संतुष्ट नहीं होता। इसके विपरीत, बृजेश पाठक को जिस प्रकार समर्थन और सम्मान मिला, वह उनकी राजनीतिक शैली का परिणाम माना जा रहा है, सहजता, सुलभता और निरंतर सम्पर्क।

इन अहम कारणों से उभर रहा है बृजेश पाठक का नाम। पहला जन उपलब्धता, राजनीतिक गलियारों में यह धारणा प्रबल है कि पाठक आम कार्यकर्ता और नागरिक के लिए सुलभ हैं। दूसरा संवाद कौशल, छात्र जीवन से लेकर वर्तमान तक संगठनात्मक सक्रियता ने उन्हें जमीनी नेटवर्क दिया है। तीसरा संतुलित छवि, वे केवल ब्राह्मण समाज तक सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक आधार बनाने का प्रयास करते रहे हैं। और चौथा प्रशासनिक भूमिका, डिप्टी सीएम के रूप में उनकी सक्रियता ने उन्हें सत्ता और संगठन के बीच सेतु का कार्य करने का अवसर दिया है। उत्तर प्रदेश को अब एक नया ब्राह्मण चेहरा चाहिए, यह प्रश्न केवल जातीय पहचान तक सीमित नहीं है। यूपी की राजनीति बहुस्तरीय सामाजिक समीकरणों पर आधारित है, ओबीसी, दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा, अल्पसंख्यक और सवर्ण सभी की भूमिका निर्णायक है

ब्राह्मण नेतृत्व की मांग इसलिए उठती है क्योंकि यह वर्ग ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक विमर्श में वैचारिक दिशा देने वाला माना गया है। परंतु आज का मतदाता जातीय पहचान से अधिक कार्यक्षमता, पारदर्शिता और जनसम्पर्क को महत्व देता है। अध्ययन बताता है कि यदि कोई नेता, विश्वसनीयता, ऊर्जा और सक्रियता, समावेशी दृष्टिकोण इन तीनों कसौटियों पर खरा उतरता है तो वह स्वाभाविक रूप से स्वीकार्यता प्राप्त करता है।

इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हुआ घटनाक्रम सूबे की राजनीति में बदलते संकेतों का प्रतीक है। यह केवल एक कार्यक्रम का हंगामा नहीं, बल्कि सामाजिक अपेक्षाओं का प्रकटीकरण था। ब्राह्मण समाज के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की चाह हो या व्यापक राजनीतिक संतुलन की आवश्यकता, दोनों ही स्थितियों में यह स्पष्ट है कि आज का समय ऐसे नेतृत्व की मांग करता है जो जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर संवाद, सेवा और सक्रियता का उदाहरण प्रस्तुत करे। बृजेश पाठक का उभरता नाम इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। किंतु अंतिम निर्णय जनता के हाथ में है। राजनीति में स्थायी वही होता है जो निरंतर जनविश्वास अर्जित करता रहे।

एक अदद नेता की तलाश जारी…

सूबे की 403 विधानसभा सीटों में से 60 फीसदी में कम से कम दस हजार ब्राह्मण मतदाता होने के बाद भी, पूरे समाज को एक सर्वमान्य नेता की तलाश है। कांग्रेस के अलावा इस वक्त यूपी में कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं, जो इस बात का दावा कर सके कि उसके पास एक ऐसा नेता है, जिसे पूरे प्रदेश में ब्राह्मण अपना नेता मानते हों। वरिष्ठ पत्रकार अंशुमान शुक्ल कहते हैं कि 10 बरसों में बीजेपी खुद को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की पार्टी के तौर पर तब्दील करने में जुटी है। सपा ने समय-समय पर अहसास कराया है कि उसकी प्राथमिकता ब्राह्मण नहीं हैं। सोशल इंजीनियरिंग का सूत्र नाकाम होने के बाद बीएसपी ने ब्राह्मणों से किनारा कर लिया है। कांग्रेस इस वक्त एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके पास प्रमोद तिवारी की शक्ल में ऐसा नेता है, जिसे ब्राह्मण नेता कह सकता है।

गौरतलब है कि बीजेपी को साल 2014 के लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक विजय दिलाने में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे लक्ष्मीकांत बाजपेई ने अहम किरदार अदा किया था। लेकिन केन्द्र में सरकार बनते ही बीजेपी ने उन्हें हाशिये पर डाल दिया था। कुछ दिनों बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेज कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। यही हाल यूपी के पूर्व डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा का भी हुआ। योगी आदित्यनाथ के पहले कार्यकाल में उन्हें उप मुख्यमंत्री की कुर्सी दी गई। उनकी लोकप्रियता बढ़ी तो अगले कार्यकाल में उन्हें भी हटा दिया गया लेकिन ब्राह्मणों की नाराजगी देख उन्हें राज्यसभा भेजा गया। उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि पार्टी आलाकमान ने ब्राह्मण विधायकों की बैठक के बाद उनसे दबाव में ब्राह्मणों के खिलाफ बयान दिलाया।

BSP की साल 2007 में जब पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो सतीश चंद्र मिश्र सोशल इंजीनियरिंग के सूत्र के साथ ब्राह्मणों में लोकप्रिय हुए। उन्होंने प्रदेश भर में ब्राह्मण सम्मेलन किए, लेकिन उसके बाद उनका भी हाल वही हुआ। बसपा ने उन्हें और नकुल दुबे सरीखों को ब्राह्मणों का सर्वमान्य नेता बनने का अवसर नहीं दिया। इसकी बड़ी कीमत बसपा को चुकानी पड़ी। रही बात कांग्रेस की तो सूबे में वही अकेली ऐसी पार्टी है. जिसने यूपी में सत्तारूढ़ रहते हुए हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र, नारायण दत्त तिवारी और प्रमोद तिवारी सरीखे नेताओं को कद, पद और प्रभार सौंपे। आज भी प्रमोद तिवारी के अलावा कोई भी ऐसा नेता नहीं, जिसे ब्राह्मणों की सर्वमान्य स्वीकृति प्राप्त हो।

हवा का रुख भांप शांत हो गया ब्राह्मण

यूपी में हाशिये पर पहुंच गए ब्राह्मणों के बारे में वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि बीते 10 बरसों में यूपी के ब्राह्मणों ने हवा का रुख भांप कर खुद की भूमिका को संकुचित कर लिया। लक्ष्मीकांत बाजपेई, सतीश चन्द्र मिश्र, नकुल दुबे, अशोक बाजपेई, माता प्रसाद पांडेय सरीखे नेताओं का हश्र देखने के बाद ब्राह्मणों ने खुद को संगठन और सरकार तक सीमित कर लिया। इस समय सभी राजनीतिक दलों का ध्यान सबसे ज्यादा ओबीसी पर है। उसके बाद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों का वोट साधने पर केन्द्रित है। ऐसे में ब्राह्मण हवा का रुख भांप कर शांत हो गया है।

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