घंटी, जागर और हुंकार, लोकदेवता हैं पहरेदार
देहरादून से अशोक पांडेय की रिपोर्ट…
भैरवनाथ : उत्तराखंड का कुमाऊं अंचल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध संस्कृति और प्राचीन परम्पराओं के लिए जाना जाता है। हिमालय की गोद में बसे इस क्षेत्र में लोक देवताओं की मान्यता अत्यंत गहरी और जीवंत है। यहां के देवता केवल पूजा के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक न्याय, नैतिक अनुशासन, ग्राम रक्षा, प्राकृतिक संतुलन और लोक संस्कृति के संरक्षक भी माने जाते हैं। कुमाऊं के लोकदेवता जनजीवन से इतने घुले-मिले हैं कि प्रत्येक गांव, प्रत्येक परिवार और प्रत्येक पर्व-उत्सव में इनकी छाया दिखाई देती है।
कुमाऊं के देवताओं की परम्परा वैदिक, पौराणिक और स्थानीय लोकविश्वासों का अद्भुत संगम है। इन देवताओं के मंदिर प्राय: पहाड़ी चोटियों, घने जंगलों, गांव की सीमाओं या प्राचीन स्थलों पर स्थित हैं। यहां पूजा-पाठ के साथ-साथ जागर, डंगरिए, ढोल-दमाऊ और लोकनृत्य की परम्परा भी प्रचलित है, जो देवताओं की उपासना का अभिन्न अंग है। हर गांव का अपना ‘ग्राम देवता होता है, जो उस क्षेत्र की रक्षा करता है और विपत्तियों से बचाता है। लोग मानते हैं कि देवता की कृपा से फसल अच्छी होती है, पशुधन सुरक्षित रहता है और प्राकृतिक आपदाएं टल जाती हैं। यहां देवताओं की पूजा तंत्र-मंत्र, जागर, हुड़का-बोल और ढोल-दमाऊ के साथ की जाती है। जागर में गायक देवताओं की कथाएं गाते हैं। माना जाता है कि देवता अवतरित होकर लोगों की समस्याओं का समाधान बताते हैं।
कुमाऊं में देवताओं की पूजा केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। यहां ‘जागर एक विशेष लोक अनुष्ठान है, जिसमें देवताओं का आवाहन किया जाता है। जागर में ढोल-दमाऊ की थाप पर गाथाएं गाई जाती हैं और माना जाता है कि देवता डंगरिए (माध्यम) के शरीर में प्रवेश करते हैं। इसके माध्यम से देवता अपने भक्तों की समस्याओं का समाधान बताते हैं। यह परम्परा कुमाऊं की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का अनमोल हिस्सा है। आज के आधुनिक युग में जब समाज तेजी से बदल रहा है, तब भी कुमाऊं के लोक देवताओं की मान्यता कम नहीं हुई है। शहरों में बस चुके लोग भी अपने गांव के देवताओं के प्रति गहरी आस्था रखते हैं। हर वर्ष मेलों, उत्सवों और विशेष तिथियों पर लोग अपने गांव लौटते हैं और देव पूजा में भाग लेते हैं। हालांकि आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक सोच के प्रभाव से कुछ परम्पराएं कमजोर पड़ी हैं, फिर भी लोकदेवताओं का सांस्कृतिक महत्व आज भी बरकरार है।
गोलू देवता
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध लोक-देवता हैं। उन्हें ‘न्याय का देवताÓ कहा जाता है। दूर-दूर से लोग अपनी समस्याएं और मनोकामनाएं लेकर उनके मंदिरों में आते हैं और विश्वास रखते हैं कि गोलू देवता अवश्य न्याय करेंगे। मान्यता है कि गोलू देवता चंद वंश के राजा झालू राय के पुत्र थे। ईष्यालु रानियों की साजिश के कारण उन्हें बचपन में ही मारने का प्रयास किया गया और नदी में बहा दिया गया। लेकिन वे चमत्कारिक रूप से बच गए और एक ब्राह्मण परिवार में पले-बढ़े।
उनका नाम गोलू रखा गया। बचपन से ही गोलू में अद्भुत बुद्धि और न्यायप्रियता थी। वे गाँव के झगड़ों को समझदारी से सुलझाते थे। जब उन्हें अपने असली राजकुमार होने का पता चला तो वे दरबार पहुँचे और सच्चाई सामने आई। बाद में वे राजा बने और निष्पक्ष न्याय के लिए प्रसिद्ध हुए। कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन लोगों का विश्वास है कि वे देवता बन गए और आज भी न्याय करते हैं। इसी कारण उनके मंदिरों में लोग अर्जियाँ लगाते हैं और मनोकामना पूरी होने पर घंटियाँ चढ़ाते हैं। चितई (अल्मोड़ा) और घोड़ाखाल (नैनीताल) के गोलू देवता मंदिर बहुत प्रसिद्ध हैं। गोलू देवता सत्य-न्याय के प्रतीक और कुमाऊं के सांस्कृतिक पहचान भी माने जाते हैं।
भैरवनाथ
उत्तराखंड के लोकजीवन और धार्मिक परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण देवता हैं। उन्हें भगवान शिव का उग्र रूप माना जाता है और वे क्षेत्रपाल तथा ग्राम-देवता के रूप में पूजे जाते हैं। पहाड़ी समाज में भैरवनाथ को गाँव की रक्षा करने वाला और अन्याय का नाश करने वाला देवता माना जाता है। उत्तराखंड के लगभग हर जनपद में भैरवनाथ के मंदिर मिलते हैं। कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों अंचलों में उनकी पूजा बड़े श्रद्धा-भाव से होती है। केदारखंड, काशीपुर, चमोली, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जैसे क्षेत्रों में भैरवनाथ के प्रसिद्ध धाम हैं।
गांवों में उन्हें ‘भैरोंÓ या ‘भैरव बाबाÓ कहकर पुकारा जाता है। मान्यता है कि भैरवनाथ रात में गांव की परिक्रमा कर उसकी रक्षा करते हैं। इसी कारण उन्हें ‘क्षेत्रपालÓ कहा जाता है। कई स्थानों पर खेती-बाड़ी, पशुधन और बच्चों की सुरक्षा के लिए भैरवनाथ की विशेष पूजा की जाती है। जागर और लोकनृत्यों में भी भैरवनाथ का विशेष स्थान है। जागर में उनके पराक्रम और न्याय की कथाएं गाई जाती हैं। लोग मानते हैं कि भैरवनाथ शीघ्र फल देने वाले देवता हैं और सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य पूरी करते हैं। इस प्रकार भैरवनाथ आस्था, सुरक्षा और लोक संस्कृति के सशक्त प्रतीक हैं।
सैम देवता
इन्हें गोलू देवता का सहयोगी और न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। ये भी न्याय और सत्य के देवता हैं तथा गांवों में सामाजिक अनुशासन बनाए रखने में इनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। लोकमान्यता है कि सैम देवता चोरी, बेईमानी और झूठ बोलने वालों को दंड देते हैं। कई गांवों में आज भी किसी विवाद के निपटारे के लिए सैम देवता की कसम खिलाई जाती है। इनकी पूजा से लोगों में नैतिक भय और अनुशासन की भावना बनी रहती है, जिससे समाज में व्यवस्था और शांति कायम रहती है।
गंगनाथ
इस देवता को नृत्य, संगीत और जागर परंपरा से जुड़ा देव माना जाता है। अल्मोड़ा क्षेत्र में इनकी विशेष मान्यता है। इनकी पूजा के समय जागर गायन, ढोल-दमाऊ और लोकनृत्य का आयोजन किया जाता है। इससे कुमाऊँ की लोकसंस्कृति जीवंत बनी रहती है। गंगनाथ देवता को प्रसन्न करने के लिए कलाकार रात भर जागर गाते हैं और भक्त नृत्य करते हैं।
हरू-सेम (हरिया देवता)
कुमाऊं की कृषि आधारित जीवनशैली में हरू-सेम देवताओं का विशेष स्थान है। इन्हें हरिया देवता भी कहा जाता है। ये खेती, फसल और वर्षा से जुड़े देवता हैं। सूखा पड़ने, फसल खराब होने या प्राकृतिक आपदा के समय हरू-सेम की पूजा की जाती है। किसान समुदाय इन्हें वर्षा कराने वाला देव मानता है। इन देवताओं की पूजा सामूहिक रूप से की जाती है, जिसमें पूरा गांव शामिल होता है। इससे सामाजिक एकता भी मजबूत होती है और लोग प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना विकसित करते हैं।
बाणासुर
बाणासुर को भगवान शिव का परम भक्त और शक्तिशाली योद्धा माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार वह राजा बलि का पुत्र था। कुमाऊँ में बाणासुर को ग्राम रक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है। बागेश्वर और चंपावत क्षेत्रों में इनके मंदिर मिलते हैं। लोकविश्वास है कि बाणासुर गांव को बाहरी आक्रमणों, चोरी और प्राकृतिक आपदाओं से बचाते हैं। इनकी पूजा विशेष रूप से संकट के समय की जाती है, जब गांव पर खतरा मंडराता है।
काल बिष्ट देवता
काल बिष्ट को रोग, महामारी और अकाल मृत्यु से रक्षा करने वाला देव माना जाता है। इनकी पूजा विशेष रूप से तब की जाती है जब किसी गांव में बीमारी फैल जाए या कोई अप्राकृतिक घटना घटित हो। लोकमान्यता है कि काल बिष्ट देवता बुरी आत्माओं और नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाते हैं। इनके मंदिर प्राय: गांव की सीमाओं या श्मशान घाट के पास स्थित होते हैं। इनकी पूजा में विशेष तंत्र-मंत्र और जागर परम्परा का प्रयोग किया जाता है। लोक परम्परा में इन्हें गौर भैरव का अवतारी कहा जाता है।
भोलानाथ
भोलानाथ को भगवान शिव का सरल और करुणामय लोक रूप माना जाता है। पूरे कुमाऊं में भोलानाथ की पूजा की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में भोलानाथ को प्राकृतिक आपदाओं, भूकम्प, बादल फटने और भारी वर्षा से रक्षा करने वाला देव माना जाता है। इनकी पूजा अत्यंत सरल होती है और लोग इन्हें अपने परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं। यूपी के सीएम योगी जब अपने गांव जाते हैं तो इनकी पूजा करना नहीं भूलते हैं।
नंदा देवी
नंदा देवी केवल एक पर्वत ही नहीं, बल्कि कुमाऊँ की कुलदेवी और मातृशक्ति का प्रतीक भी हैं। अल्मोड़ा, कौसानी और आसपास के क्षेत्रों में नंदा देवी की पूजा विशेष श्रद्धा से की जाती है। नंदा देवी राजजात यात्रा कुमाऊं की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक यात्राओं में से एक है। यह यात्रा वर्षों में एक बार निकाली जाती है और इसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं। नंदा देवी को बेटी के रूप में पूजा जाता है और उनके विदाई उत्सव का आयोजन भी होता है, जो स्थानीय संस्कृति की अनूठी झलक प्रस्तुत करता है।
बौल देवता
बौल देवता को गांव की सीमाओं का रक्षक माना जाता है। इनकी पूजा विशेष रूप से चम्पावत जिले में होती है। लोकमान्यता है कि बौल देवता चोर-डकैतों और बुरी शक्तियों को गांव में प्रवेश नहीं करने देते। इनके मंदिर गांव के प्रवेश द्वार पर स्थित होते हैं। इनकी पूजा से ग्रामीणों में सुरक्षा की भावना बनी रहती है। उत्तराखंड में बौल देवता को भगवान श्रीकृष्ण और गणेश के बाल रूप में माना जाता है, जो कृषि और गोधन की रक्षा करते हैं।
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