
TMC तृणमूल कांग्रेस को लेकर राजनीतिक हलकों में बड़ी हलचल मची हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि पार्टी के भीतर बड़ी टूट देखने को मिल रही है। बताया जा रहा है कि 19 सांसदों की एक सूची सामने आई है, जिन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को समर्थन पत्र सौंपा है। हालांकि इस पूरे मामले पर अब तक किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
19 सांसदों की सूची का दावा, कई बड़े नाम शामिल
सूत्रों के अनुसार, इस कथित सूची में सायोनी घोष, पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान, काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, बापी हलदार, डॉ. शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार माल, अरूप चक्रवर्ती और रचना बनर्जी जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। इसके अलावा खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी, जून मलिया और पार्थ भौमिक के नाम भी इस सूची में बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इन सांसदों ने मई महीने में ही लोकसभा स्पीकर को अपना समर्थन पत्र सौंप दिया था।
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NDA को लेकर स्थिति साफ नहीं
रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया जा रहा है कि ये सांसद आगे किस राजनीतिक खेमे के साथ जाएंगे, इस पर अभी स्पष्टता नहीं है। NDA के साथ जाने को लेकर भी फिलहाल कोई आधिकारिक संकेत सामने नहीं आया है।
राज्यसभा में भी TMC को झटका
लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा में भी तृणमूल कांग्रेस को हाल के दिनों में कई झटके लगे हैं। गुरुवार को कोयल मलिक के इस्तीफे के बाद पार्टी की स्थिति और कमजोर होती दिखाई दे रही है। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ दिनों में कई सांसदों के इस्तीफों के बाद उच्च सदन में TMC की संख्या घटकर 9 रह गई है। इससे पहले सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश बरेक जैसे नेता भी पार्टी से अलग हो चुके हैं।
विधानसभा में भी बढ़ रही बगावत की चर्चा
विधानसभा स्तर पर भी असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। बागी गुट से जुड़े नेताओं का दावा है कि उनके साथ जुड़े विधायकों की संख्या बढ़कर 64 तक पहुंच गई है, जबकि TMC ने चुनाव में 80 सीटें जीती थीं। अगर यह दावा सही साबित होता है तो पार्टी के पास बहुत कम विधायक ही बचेंगे, जिससे संगठनात्मक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
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चुनाव चिह्न और पार्टी पर असर की अटकलें
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि बागी गुट एक अलग समूह के रूप में चुनाव आयोग से मान्यता की मांग करता है, तो पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी विवाद पैदा हो सकता है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक किसी भी पक्ष ने आधिकारिक बयान नहीं दिया है। ऐसे में इन दावों की पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हो सकी है।
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