अकेले जीवन चुन रहीं महिलाएं: दक्षिण भारत में ट्रेंड तेज, यूपी-बिहार में धीमी रफ्तार

South India Demographics : दक्षिण भारत के राज्यों में देश के बाकी हिस्सों की तुलना में बिना पति के रहने वाली महिलाओं (विधवा, तलाकशुदा या अलग रह रही) की संख्या अधिक पाई गई है। साल 2024 के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण भारत के सभी पांच राज्यों में ऐसी महिलाओं का अनुपात राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रवृत्ति का सबसे प्रमुख कारण जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) है। दक्षिण भारत में महिलाओं की औसत आयु देश के औसत से अधिक होती है और वे अक्सर अपने पुरुष साथी की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहती हैं। इसी वजह से वहां विधवा महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा हो जाती है।

रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

 रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पुरुषों में अपेक्षाकृत अधिक मृत्यु दर होने के कारण कई महिलाएं अपने जीवनसाथी को खो देती हैं, जिससे उनके विधवा होने की संभावना बढ़ जाती है और बिना पति के रहने वाली महिलाओं की संख्या में इजाफा होता है। इन पांच दक्षिण भारतीय राज्यों में तमिलनाडु इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां बिना पति के रह रही महिलाओं का अनुपात 11.6 प्रतिशत दर्ज किया गया है, जो राष्ट्रीय औसत से दोगुने से भी अधिक है। इसके बाद इस सूची में केरल दूसरे स्थान पर है।

दक्षिण और उत्तर भारत में महिलाओं के अकेले रहने (विधवा, तलाकशुदा या अलग रह रही) के आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। SRS 2024 रिपोर्ट के मुताबिक, देश में औसतन 5.4% महिलाएं ऐसी श्रेणी में आती हैं। लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में यह अनुपात काफी ज्यादा है। तमिलनाडु सबसे ऊपर है, जहां यह आंकड़ा 11.6% तक पहुंच गया—जो राष्ट्रीय औसत से दोगुने से भी अधिक है। इसके बाद केरल (10.4%), कर्नाटक (8.6%), आंध्र प्रदेश (8.0%) और तेलंगाना (7.6%) का स्थान आता है। इसी वजह से दक्षिण भारत के पांच राज्यों ने राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष सात में से पांच स्थान हासिल किए हैं। इसके विपरीत, पुरुषों में ऐसा कोई स्पष्ट क्षेत्रीय पैटर्न नहीं दिखता। राष्ट्रीय स्तर पर 1.6% पुरुष विधुर, तलाकशुदा या अलग रह रहे हैं। दक्षिणी राज्यों में भी यह अंतर कम ही है—कर्नाटक में 1.4%, तेलंगाना में 1.6% और तमिलनाडु में सबसे अधिक 2.9% दर्ज किया गया।

महिलाओं की जीवन-प्रत्याशा अधिक, पुरुषों की मृत्यु दर ज्यादा

इन आंकड़ों से जो तस्वीर बनती है, वह साफ तौर पर बताती है कि दक्षिण भारत में महिलाओं और पुरुषों की जीवन-प्रोफाइल अलग तरह से विकसित हो रही है, और यही आगे चलकर वैवाहिक स्थिति के अंतर को भी प्रभावित करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं की जीवन-प्रत्याशा (life expectancy) दक्षिणी राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक है। उदाहरण के लिए केरल में 15 साल की उम्र की लड़की के 60 साल तक जीवित रहने की संभावना 94.5% तक पहुंच जाती है, जो देश में सबसे अधिक है। बाकी दक्षिणी राज्यों में यह आंकड़ा लगभग 89.8% से 91.2% के बीच है, जो राष्ट्रीय औसत 90.9% के आसपास या उससे ऊपर है।

इसके मुकाबले पुरुषों की स्थिति अलग दिखती है। वर्किंग एज में पुरुषों की मृत्यु दर अधिक पाई गई है। राष्ट्रीय औसत के अनुसार हर 1,000 लोगों पर 3.6 मौतें दर्ज होती हैं, लेकिन तेलंगाना (4.6), कर्नाटक (4.5) और तमिलनाडु (4.2) जैसे राज्यों में यह दर इससे अधिक है। केवल केरल (2.9) ऐसा राज्य है जहां पुरुष मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से कम है।

इसका सीधा असर सामाजिक संरचना पर पड़ता है जब पुरुषों की मृत्यु दर कामकाजी उम्र में अधिक होती है और महिलाएं लंबा जीवन जीती हैं, तो स्वाभाविक रूप से विधवा या अकेले रहने वाली महिलाओं का अनुपात बढ़ जाता है—खासकर उन राज्यों में जहां यह अंतर अधिक स्पष्ट है।

जीवन-चक्र पर असर

दक्षिणी राज्यों में महिलाओं की शादी आम तौर पर राष्ट्रीय औसत (23.1 वर्ष) से अधिक उम्र में होती है। उदाहरण के लिए केरल में यह औसत 24.5 वर्ष है, तमिलनाडु में 23.8 वर्ष और कर्नाटक में 23.7 वर्ष दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब शादी थोड़ी देर से होती है तो महिलाओं का जीवन का एक बड़ा हिस्सा विवाह से पहले ही गुजर जाता है, जिससे “बिना जीवनसाथी” रहने की अवधि भी तुलनात्मक रूप से बढ़ जाती है।

इसके साथ एक और बड़ा कारण है—दक्षिण भारत में जनसंख्या का तेजी से वृद्ध होना। इन राज्यों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात देश में सबसे अधिक है। केरल में 15.8% महिलाएं बुजुर्ग श्रेणी में आती हैं, जबकि पुरुषों का अनुपात 14.4% है। तमिलनाडु में भी यही पैटर्न दिखता है, जहां बुजुर्ग महिलाएं 14.8% और पुरुष 13.6% हैं।

यह अंतर सभी दक्षिणी राज्यों में दिखाई देता है और इसका सीधा संबंध महिलाओं की अधिक जीवन-प्रत्याशा और पुरुषों की अपेक्षाकृत अधिक मृत्यु दर से जोड़ा जाता है। खास बात यह है कि यह प्रवृत्ति सिर्फ शहरी इलाकों तक सीमित नहीं है—केरल के ग्रामीण क्षेत्रों में भी बुजुर्ग महिलाओं का अनुपात 16.1% तक पहुंच जाता है, जो देश में सबसे अधिक है

इसका विपरीत पक्ष … बिहार की तस्वीर में साफ दिखाई देता है। बिना जीवनसाथी के रहने वाली महिलाओं के मामले में बिहार दक्षिण भारत के राज्यों के मुकाबले बिल्कुल अलग स्थिति दिखाता है। यहां यह अनुपात लगभग 2% है, जो तमिलनाडु (11.6%) की तुलना में बहुत कम है। बुजुर्ग आबादी के लिहाज से भी अंतर बड़ा है—बिहार में बुजुर्ग महिलाओं का हिस्सा करीब 7.8% है, जबकि तमिलनाडु में यह लगभग 14.8% तक पहुंचता है।

शादी की उम्र भी इस अंतर को समझाती है। बिहार में महिलाएं औसतन 21.7 साल में शादी कर लेती हैं, जबकि केरल में यह उम्र 24.5 साल तक होती है। इसके साथ पुरुषों की मृत्यु दर भी भूमिका निभाती है। बिहार में कामकाजी उम्र के पुरुषों की मृत्यु दर प्रति 1,000 पर 2.3 है, जो तेलंगाना (4.6) जैसे दक्षिणी राज्यों से काफी कम है।

उत्तर भारत के अन्य राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर—में भी यही पैटर्न दिखता है, जहां बिना जीवनसाथी रहने वाली महिलाओं का अनुपात लगभग 2.4% से 3.1% के बीच है। इन राज्यों में आबादी अपेक्षाकृत युवा है, शादी जल्दी हो जाती है और मृत्यु दर भी कम रहती है।


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