त्वरित टिप्पणी : भारतीय राजनीति के 100 वर्ष: संघ स्वीकार्य और वामपंथ का उन्मूलन

Politics
  • हिंदुत्व की सुनामी जैसे दिख रहे ये नतीजे

आचार्य संजय तिवारी

भारत के इस बार के पांच राज्यों के चुनाव परिणाम अद्भुत हैं। इन परिणामों में भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में भारतीयता का एक ऐतिहासिक प्रभाव उभर कर सामने आया है। खासकर दक्षिण भारत में तमिलनाडु से स्टालिन की पराजय और विजय की पार्टी का उभार भी अद्भुत है। जिस केरल ने भारत में पहली वामपंथी सरकार दी थी, आज उसके इस किले का ढह जाना भी ऐतिहासिक है। असम के परिणाम तो निश्चित रूप से सनातन हिंदुत्व की सुनामी ही कहे जायेंगे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संचालित राजनीतिक विचारधारा का प्रसार और वामपंथी राजनीति के संकुचन की यह 100 वर्षों की यात्रा अनेक संदेश लेकर सामने है। इन चुनावों से ठीक पहले ही भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने देश को वामपंथ से समर्थित नक्सल समस्या से मुक्त हो जाने की घोषणा इसी वर्ष मार्च के अंतिम दिनों में संसद में कर के सरकार के संकल्प से दुनिया को अवगत करा दिया था। वामपंथ समर्थित रक्त रंजित नक्सली हिंसा से मुक्त भारत वर्ष आज वामपंथी राजनीति से भी मुक्ति का इतिहास लिख रहा है।

यहां कुछ ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिन पर अवश्य दृष्टि डालनी चाहिए। आज जब बंगाल और केरल के भी चुनाव परिणाम आ चुके हैं तो इन राज्यों के 100 वर्षों के राजनीतिक इतिहास की भी जानकारी रखनी जरूरी है। यह तथ्य है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना 26 दिसंबर 1925 को कानपुर (उत्तर प्रदेश) में हुई थी। इस प्रमुख वामपंथी दल की स्थापना बंगाल के ही मानवेन्द्रनाथ राय द्वारा की गई थी और इसके पहले महासचिव सच्चिदानंद विष्णु घाटे थे। इस प्रकार, 2025 में पार्टी ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए हैं। इसकी स्थापना से जुड़े कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में पार्टी की विचारधारात्मक शुरुआत 1920 में ताशकंद में मानी जाती है, लेकिन औपचारिक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में कानपुर में ही हुआ था।

इसी प्रकार भारत में पहली कम्युनिस्ट सरकार 1957 में केरल में बनी थी। ई.एम.एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने विधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाई, जो दुनिया में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई पहली कम्युनिस्ट सरकारों में से एक थी। इस सरकार ने ऐतिहासिक भूमि सुधार कानून (Land Reform Ordinance) और शिक्षा विधेयक (Education Bill) पेश किए थे। वर्ष 1959 में, तत्कालीन केंद्र सरकार ने ‘विमोचन समरम’ (मुक्ति संघर्ष) के बाद अनुच्छेद 356 का उपयोग करते हुए इस सरकार को बर्खास्त कर दिया था।यह सरकार न केवल केरल की पहली सरकार थी, बल्कि भारत की पहली गैर-कांग्रेसी राज्य सरकार भी थी।

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अब बात करते हैं नक्सलवाद की। भारत में नक्सलवाद एक हिंसक वामपंथी उग्रवाद रहा है, जिसकी शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के ही नक्सलबाड़ी से हुई। यह विचारधारा माओ त्सेतुंग से प्रेरित है, जो सशस्त्र क्रांति के माध्यम से सत्ता परिवर्तन में विश्वास रखते हैं। मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और बिहार के आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय, यह समस्या मार्च 2026 में समाप्त हो गई। नक्सलवाद की उत्पत्ति से लेकर अब तक का इसका इतिहास समझने लायक है। वर्ष 1967 में चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में जमींदारों के खिलाफ किसान विद्रोह से शुरू हुआ था। यह माओवादी विचारधारा से प्रेरित रहा जो ‘बंदूक की नली से सत्ता’ में विश्वास करते थे । इससे प्रभावित क्षेत्र (रेड कॉरिडोर) पहले 100 से अधिक जिलों में फैले होने के बाद, यह मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ (दंतेवाड़ा, सुकमा), झारखंड और महाराष्ट्र के सीमावर्ती आदिवासी क्षेत्रों तक सीमित रह गया था । इसके उदय के कारण के रूप में कहा जाता है कि जनजातीय क्षेत्रों में विकास का अभाव, वन अधिकारों की कमी, गरीबी, और शोषक नीतियां थीं , जिनका नक्सलियों ने फायदा उठाया।

केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014 के बाद से निरंतर नक्सली घटनाओं में भारी कमी आई। सरकार की ‘समाधान’ रणनीति (SAMADHAN), जिसमें सुरक्षा बल और विकास कार्य शामिल हैं, के तहत नक्सलवाद को मार्च 2026 तक पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा गया था जिसे गृहमंत्री अमित शाह ने पूरा कर लेने की घोषणा 30 मार्च 2026 को संसद में भी कर दिया है। वामपंथ की राजनीति के साथ ही वामपंथी नक्सली खूनी रणनीति की खात्मे के बाद भारतीय राजनीति में पूरब से दक्षिण तक हिंदुत्व की सुनामी लाने वाले नायक नरेंद्र मोदी और उनके चाणक्य अमित शाह को बधाई देना ही चाहिए।

तमिलनाडु के विजय

आंध्र प्रदेश के फिल्म स्टार एन टी रामाराव की आंधी कुछ लोगों को याद होगी। तमिलनाडु में इस बार धुर हिंदू विरोधी स्टालिन को उखाड़ देने वाले विजय उससे बड़ी सुनामी लेकर आए हैं। विजय के प्रशंसक विजय को थलापति (कमांडर) विजय के नाम से जानते हैं। वह दक्षिण भारतीय (तमिल) सिनेमा के सुपरस्टार हैं। इसी बार 2026 में, उन्होंने फिल्मों से राजनीति में कदम रखा और अपनी नई पार्टी तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) के साथ चुनावी मैदान में उतरे। उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति में ब्लॉकबस्टर एंट्री की है और उनकी पार्टी एक बड़ी ताकत बनकर उभरी है। विजय का मूल पूरा नाम जोसेफ विजय चंद्रशेखर है । उनकी पार्टी का नाम तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) है जिसका मतलब है ‘तमिलनाडु विजय पार्टी’। इस बार विधानसभा चुनावों में, विजय की पार्टी ने DMK और AIADMK जैसी स्थापित पार्टियों को कड़ी टक्कर दी है। वह दक्षिण भारत के सबसे अधिक कमाई करने वाले और लोकप्रिय अभिनेताओं में से एक हैं।


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