
ईरान। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अब ईरान और अमेरिका के बीच “जंग के खर्च” को लेकर भी तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरगची ने अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि वह ईरान के साथ युद्ध की वास्तविक लागत को छिपा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए अरगची ने लिखा, “पेंटागन झूठ बोल रहा है। बेंजामिन नेतन्याहू का यह ‘जुआ’ अब तक अमेरिका को 100 अरब डॉलर का नुकसान पहुंचा चुका है, जो आधिकारिक आंकड़ों से करीब चार गुना ज्यादा है। उन्होंने यह भी कहा कि इसका असली बोझ अमेरिकी करदाताओं पर और भी अधिक पड़ रहा है।
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अरगची के मुताबिक, इस युद्ध का असर आम अमेरिकी नागरिकों पर साफ दिख रहा है। उन्होंने दावा किया कि हर अमेरिकी परिवार को हर महीने करीब 500 डॉलर तक का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है, जो लगातार बढ़ता जा रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “‘इजरायल फर्स्ट’ का मतलब हमेशा ‘अमेरिका लास्ट’ होता है। इससे पहले ईरान की संसद के स्पीकर एमबी गालिबाफ ने भी अमेरिका पर व्यंग्य किया। उन्होंने कहा कि ईरान की भौगोलिक स्थिति इतनी विशाल है कि उसे पूरी तरह घेरना अमेरिका के लिए आसान नहीं होगा। गालिबाफ ने मजाकिया अंदाज में कहा कि अगर अमेरिका अपने देश में न्यूयॉर्क से वेस्ट कोस्ट और लॉस एंजेलिस से ईस्ट कोस्ट तक दीवारें बना दे, तब भी उनकी कुल लंबाई ईरान की सीमाओं से कम ही होगी। गालिबाफ ने अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ पर भी निशाना साधते हुए उनके बयानों को गलत ठहराया। दरअसल, हेगसेथ ने अमेरिकी संसद की हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी में कहा था कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में अब तक लगभग 25 अरब डॉलर खर्च हुए हैं।
हालांकि, अमेरिका के भीतर ही इस आंकड़े पर सवाल उठने लगे हैं। कई डेमोक्रेटिक नेताओं और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि असली लागत इससे कहीं ज्यादा-करीब 630 अरब डॉलर से लेकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकती है। इससे पहले पेंटागन अधिकारियों ने भी स्वीकार किया था कि युद्ध के शुरुआती 6 दिनों में ही 11.3 अरब डॉलर खर्च हो चुके थे। गौरतलब है कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने शुरुआत में इस युद्ध के लिए 200 अरब डॉलर की मांग की थी, जो बाद के अनुमानों से काफी अलग साबित हो रही है। अब हालात ऐसे बन चुके हैं कि सिर्फ सैन्य मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी अमेरिका और ईरान आमने-सामने हैं। जंग की असली लागत को लेकर दोनों देशों के बीच चल रही यह जुबानी जंग आने वाले समय में और तेज हो सकती है।
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