आज यानी 10 अप्रैल को देशभर में बूढ़ा बसौड़ा पर्व मनाया जा रहा है। शीतला अष्टमी को कई राज्यों में बसौड़ा के नाम से जाना जाता है। “बसौड़ा” शब्द का अर्थ ही होता है बासी या ठंडा भोजन। इस दिन माता को ठंडा भोजन अर्पित करने की परंपरा है, इसी कारण इस पर्व का नाम बसौड़ा पड़ा।
बासी भोजन चढ़ाने के पीछे की मान्यता
धार्मिक कथाओं के अनुसार, एक बार किसी गांव के लोगों ने माता को गर्म भोजन अर्पित कर दिया, जिससे उनका मुख जल गया और वे क्रोधित हो गईं। तभी एक वृद्ध महिला ने उन्हें ठंडा भोजन अर्पित किया, जिससे माता प्रसन्न हुईं और उसका घर सुरक्षित रहा। तभी से माता को ठंडा या बासी भोजन चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई।
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मौसम से जुड़ा वैज्ञानिक कारण
इस पर्व के पीछे एक व्यावहारिक कारण भी माना जाता है। यह समय मौसम परिवर्तन का होता है—ठंड खत्म होकर गर्मी शुरू होती है। पुराने समय में माना जाता था कि इस दिन के बाद बासी भोजन से बचना चाहिए, क्योंकि बदलते मौसम में इससे बीमारियां फैल सकती हैं। इस तरह यह पर्व ताजे भोजन की शुरुआत का संकेत भी देता है।
शीतला अष्टमी की पूजा विधि
- पूजा का भोजन एक दिन पहले यानी सप्तमी की रात को तैयार किया जाता है।
- सुबह स्नान के बाद माता की विधिपूर्वक पूजा की जाती है।
- मीठे चावल, पूड़ी, पुए, राबड़ी जैसे ठंडे व्यंजन का भोग लगाया जाता है।
- पूजा के दौरान कथा सुनना और शीतलाष्टक का पाठ करना शुभ माना जाता है।
- पूजा के बाद वही भोजन प्रसाद के रूप में परिवार में वितरित किया जाता है।
शीतला माता की पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता को आरोग्य की देवी माना जाता है। उनकी पूजा से चेचक, खसरा और त्वचा से जुड़ी बीमारियों से रक्षा होने की मान्यता है। साथ ही यह व्रत परिवार की खुशहाली, अच्छे स्वास्थ्य और बच्चों की लंबी उम्र के लिए किया जाता है।
