बरसों बाद सुप्रीम चिंता, पंच परमेश्वर पढ़ लीजिए जज साहब…

Supreme Court Naya Look
भौमेंद्र शुक्ल
भौमेंद्र शुक्ल

  • एससी-एसटी के झूठे मुकदमों पर सख्ती की जरूरत, न्याय व्यवस्था में भरोसा कैसे बचे?
  • उन पांच करोड़ लोगों की सामाजिक-आर्थिक हानि का जिम्मेदार कौन?

सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट या सिविल कोर्ट के न्यायाधीश महोदय को मशहूर साहित्यकार प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ जरूर पढ़नी चाहिए। उस कहानी में यह शिक्षा दी गई है कि पंच के आसन यानी जज की गद्दी पर आसीन इंसान सिर्फ इंसाफ करता है। वह अगल-बगल या दाएं-बाएं नहीं देखता है। अभी-अभी सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह टिप्पणी की है कि पांच करोड़ लोग ‘एससी-एसटी एक्ट’ मामले में बेवजह बरसों-बरस तक जेल में बंद रहे। इसे अंधा कानून से अगर नवाजा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 1980 के दशक में अमिताभ बच्चन, हेमामालिनी, रजनीकांत, प्राण, प्रेम चोपड़ा और डैनी को लेकर एक नामवर फिल्म बनी थी- अंधा कानून। जिसमें बगैर कत्ल किए अमिताभ बच्चन को फंसा दिया गया था। उसे उम्रकैद की सजा हो गई थी। अंततः अमिताभ बच्चन ने सजा काटने के बाद फंसाने वाले व्यक्ति की हत्या कर दी। और उस जज के चेम्बर में घुसकर हत्या की, जिसने अमिताभ को बगैर गुनाह किए उम्रकैद की सजा सुना डाली थी।

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मगर वह ‘रील लाइफ’ की स्टोरी है, ‘रीयल लाइफ’ की नहीं। लेकिन पांच करोड़ लोगों के रीयल लाइफ में यह घटनाएं घटी हैं। जिसने हमारे कानून, न्याय-व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। क्योंकि कानून का पहला फंडा है- ‘सौ कसूरवार बच जाएं तो बच जाएं, लेकिन एक निर्दोष न फंसे।’ लेकिन यहां तो पांच करोड़ लोगों की बात है, इसके लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? कौन इसकी जिम्मेवारी उठाएगा? जो लोग 25-30 साल जेल में रहे, उनकी जिंदगी बर्बाद हो गई। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा खत्म हो गई। उनके बाल-बच्चे और परिजनों को लोग हिकारत भरी नजर से देखते हैं। उनके बच्चे अच्छी शिक्षा और व्यवस्था से वंचित हो गए होंगे। निश्चित तौर पर कइयों के परिजनों की इस तड़प में जान भी गई होगी। वो दारोगा, जिसने चंद पैसों के चक्कर में झूठा मुकदमा लिखा होगा, वो रिटायर होकर या तो मर गया होगा या घर में चैन की बंशी बजा रहा होगा। ऐसे पुलिस वालों पर कोई कार्रवाई होगी क्या? जवाब होगा-नहीं।

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यहीं नहीं इन पांच करोड़ लोगों की प्रतिष्ठा धूमिल तो हो ही गई, साथ ही साथ सरकारी खजाने पर अरबों रुपये का अलग भार पड़ा। आखिरकार इनके जेल में रहन-सहन और खान-पान के साथ-साथ दवा-उपचार का पैसा भी सरकार को वहन करना पड़ा। इस मामले ने अर्थव्यवस्था चौपट करने के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा का भी चीरहरण किया। सरकार को चाहिए कि वह ऐसी व्यवस्था करे कि एससी-एसटी एक्ट या अन्य किसी एक्ट में अगर कोई किसी निर्दोष को फंसा देता है, तब उसे उम्रकैद की सजा दिलाने का प्रावधान सरकार मुकर्रर करे। वरना अंधा-कानून फिल्म वाले दृश्य कहीं देखने को न मिल जाए। इस दुरुपयोग का एक वास्तविक किस्सा मैं सुना रहा हूं। बिहार के पटना में एक ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट थे, जो दलित समाज से ताल्लुक रखते थे। खुलेआम पैसा कमाते थे। उनके खिलाफ किसी भी जज ने जांच करने की जरा भी हिमाकत की तो वो सीधे धमकाते थे। कहते थे-‘एससी-एसएसटी एक्ट में ऐसा फंसाऊंगा की सात पुश्तें संभल नहीं पाएंगीं। एक बार मुकदमा किया तो भगवान भी नहीं बचा पाएंगे।’ कई बार बीच रात को जीटी रोड पर खड़ा होकर अपने बॉडीगार्ड के साथ तमाम ट्रक एवं गाड़ियों से मोटे माल की वसूली भी करते थे। यह मामला एक दिन पटना हाईकोर्ट पहुंचा और पटना उच्च न्यायालय ने गोपनीय जांच कराई तो सब कुछ शत-प्रतिशत सही निकला। अगले ही दिन उस न्यायिक दंडाधिकारी को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। यह नजीर है कि एससी-एसटी एक्ट का कैसे दुरुपयोग होता रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने जैसे ही कहा कि देश में पांच करोड़ एससी-एसटी के झूठे मुकदमे चल रहे हैं, देश की न्याय व्यवस्था एक बार फिर गम्भीर बहस के कटघरे में खड़ी हो गई। उनकी इस ‘सुप्रीम चिंता’ ने देश के करोड़ों चेहरों पर मुस्कान ला दिया। इनमें वो लोग शामिल हैं, जिनके ऊपर फर्जी मुकदमें चस्पा हैं। हालांकि उन लोगों के दिलों पर बड़ा पहाड़ भी टूटा, जिनके परिजन 30 बरसों तक जेल की सजा काटने के बाद निर्दोष छूटे। न्यायमूर्ति की यह चिंता भी वाजिब है कि आखिर 30 वर्षों तक झूठी शिकायत के आधार पर जेल कराने वालों के खिलाफ आपने क्या कार्रवाई की? यदि की तो कोई ब्योरा है क्या? यदि नहीं तो क्या ऐसे लोगों का मन नहीं बढ़ेगा।

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देश की सबसे बड़ी अदालत में दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने झूठी शिकायतों, फर्जी FIR और गलत हलफनामों के मुद्दे को गंभीरता से लिया है और केंद्र व राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सोशल मीडिया पर यह दावा तेजी से वायरल हो रहा है कि देश में करोड़ों झूठे मामले लम्बित हैं और इनके चलते अनेक परिवार बर्बाद हो चुके हैं। हालांकि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यह भी सच है कि न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के आरोप समय-समय पर उठते रहे हैं। याचिका में मांग की गई है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर झूठी गवाही, फर्जी शिकायत या गलत हलफनामा दाखिल करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी सजा का स्पष्ट कानूनी प्रावधान होना चाहिए। तर्क यह है कि निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक मुकदमेबाजी, सामाजिक कलंक और आर्थिक तबाही झेलनी पड़ती है। कई मामलों में लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद बरी होने तक एक पूरा परिवार टूट जाता है।

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यह मुद्दा केवल किसी एक कानून या वर्ग तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में ऐसे प्रभावी तंत्र मौजूद हैं, जो झूठे मामलों की पहचान कर सकें और दोषी शिकायतकर्ताओं को दंडित कर सकें? भारतीय दंड संहिता में झूठी शिकायत और मिथ्या साक्ष्य के खिलाफ प्रावधान जरूर हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल कितनी प्रभावशीलता से हो रहा है, यह भी विचारणीय है। उन्होंने दो टूक लहजे में कहा कि झूठी शिकायत मिले तो शिकायतकर्ता को इतना बड़ा दंड मिले कि वो मिसाल बने। आखिरकार हम लोगों के घर कैसे बर्बाद कर सकते हैं? जो अपना पूरा जीवन जेल में काट आया, उसके परिवार की सुधि कौन लेगा? आखिरकार उन्हें भी न्याय की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल इसी संतुलन की तलाश का संकेत है। यदि अदालत और सरकारें मिलकर ऐसा स्पष्ट ढांचा तैयार करती हैं, जिसमें झूठी शिकायतों पर प्रभावी दंड और वास्तविक पीड़ितों की सुरक्षा, दोनों सुनिश्चित हों, तो इससे न्याय व्यवस्था में लोगों का भरोसा और मजबूत हो सकता है।

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साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि सख्ती के नाम पर वास्तविक पीड़ितों के अधिकार प्रभावित न हों। कई बार सामाजिक दबाव, भय और असमान शक्ति-संतुलन के कारण लोग शिकायत दर्ज कराने से ही हिचकते हैं। ऐसे में संतुलन बेहद जरूरी है। न तो कानून का दुरुपयोग हो और न ही न्याय पाने की प्रक्रिया कठिन बने। अंततः सवाल यही है, न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। झूठे मुकदमों पर सख्ती और निर्दोषों की सुरक्षा, दोनों ही एक स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत हैं। इसमें सुधार की पूरी आवश्यकता है। वरन समाज और देश क्रांति की दिशा में चला जाएगा। सिविल वार की ओर रुख कर जाएगा। इसी तरह साल 2026 में आए यूजीसी एक्ट, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 19 मार्च तक रोक लगा रखी है, में तब्दीलियां नहीं की गई तो यह समाज को एटम बम पर बैठा देगा और समाज समेत देश के चीथड़े-चीथड़े उड़ जाएंगे।

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