केंद्र सरकार ने मंगलवार को एक अहम निर्णय लेते हुए राज्य के नाम में बदलाव के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की सहमति के बाद अब ‘केरल’ को आधिकारिक तौर पर ‘केरलम’ के नाम से जाना जाएगा। इस फैसले को राज्य की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह कदम राज्य के लोगों की लंबे समय से चली आ रही भावना और इच्छा को दर्शाता है।
इस फैसले पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस निर्णय की सराहना की, लेकिन साथ ही एक दिलचस्प भाषाई सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि जब राज्य का नाम ‘केरलम’ हो जाएगा, तब वहां के निवासियों को अंग्रेजी में क्या कहा जाएगा। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि ‘Keralite’ और ‘Keralan’ जैसे शब्द अब नए नाम के संदर्भ में अजीब लग सकते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य सरकार इस विषय पर नए शब्द के लिए कोई प्रतियोगिता आयोजित कर सकती है।
इस फैसले को लागू करने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब इस नाम परिवर्तन से संबंधित विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की सिफारिश मिलने के बाद इसे संसद में पेश किया जाएगा। संसद की मंजूरी के बाद ही यह बदलाव पूरी तरह से आधिकारिक रूप से लागू हो सकेगा।
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इस निर्णय पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य के लोगों को बधाई देते हुए कहा कि यह कदम राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि नया नाम राज्य की पहचान को और अधिक प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला न केवल सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे क्षेत्रीय पहचान को भी मजबूती मिलेगी। राज्य का नाम ‘केरलम’ स्थानीय भाषा और परंपरा के अधिक करीब माना जाता है।
इस फैसले ने देशभर में नाम और पहचान से जुड़े मुद्दों पर एक नई चर्चा को जन्म दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बदलाव का सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर क्या प्रभाव पड़ता है।
