नेपाल में आम चुनाव के मद्देनजर ’72 घंटे’ के बंद पर सस्पेंस बरकरार

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  • बार्डर बंद होने की स्थिति स्पष्ट न होने के कारण भारत और नेपाल से पर्यटन से जुड़े लोगों खासे परेशान: राजेश शुक्ला 

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

सोनौली/महाराजगंज। भारत-नेपाल सीमा का सबसे व्यस्त द्वार, सोनौली, इन दिनों एक अजीब सी कश्मकश और सन्नाटे के बीच खड़ा है। कारण है नेपाल में आगामी चुनाव और सीमा सील होने की अपुष्ट खबरें। चुनाव आयोग की ओर से सीमावर्ती जिलों के लिए अब तक कोई आधिकारिक नोटिस जारी न होने के कारण नेपाल के रूपंदेही जिला प्रशासन और भारतीय अधिकारी, दोनों ही स्थिति स्पष्ट करने में असमर्थ हैं। आम तौर पर चुनावों के दौरान सुरक्षा कारणों से अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को 48 से 72 घंटों के लिए पूरी तरह सील कर दिया जाता है। हालांकि, इस बार आधिकारिक आदेश की अनुपस्थिति ने स्थानीय व्यापारियों, यात्रियों और प्रशासन को ‘वेट एंड वॉच’ (इंतजार करो और देखो) की स्थिति में डाल दिया है। सीमा पर तैनात सुरक्षा एजेंसियां भी किसी लिखित निर्देश के बिना कोई ठोस जानकारी देने से बच रही हैं।

सोनौली न केवल व्यापार का केंद्र है, बल्कि यह बौद्ध सर्किट का मुख्य द्वार भी है। सीमा बंद होने की अटकलों का सबसे बड़ा असर पर्यटन क्षेत्र पर दिख रहा है।

इस समय बड़ी संख्या में विदेशी यात्रियों की नेपाल के पोखरा, काठमांडू और लुम्बिनी के होटलों में बुकिंग है। थाई बौद्ध विहार 960 के प्रबंधक राजेश शुक्ला के अनुसार, “बंद की स्थिति स्पष्ट न होने के कारण भारत और नेपाल से पर्यटन से जुड़े लोग खासे परेशान हैं। अगर समय रहते चुनाव के दौरान सीमा के नियमों का पता चल जाता, तो यात्री अपनी यात्रा को रिशेड्यूल कर पाते। स्पष्टता के अभाव में न केवल पर्यटन को नुकसान हो रहा है, बल्कि उन आम लोगों को भी परेशानी हो रही है जो रोजमर्रा के काम के लिए सीमा पार करते हैं।

सीमावर्ती जिलों के लोगों का कहना है कि प्रशासन को कम से कम एक सप्ताह पहले स्थिति स्पष्ट कर देनी चाहिए। रूपंदेही (नेपाल) प्रशासन भी भारतीय पक्ष से मिलने वाले इनपुट और चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रहा है। जब तक यह “कागजी कार्रवाई” पूरी नहीं होती, तब तक सोनौली की सड़कों पर हल्कान (परेशान) यात्रियों और मालवाहक ट्रकों की कतारें बढ़ती जा रही हैं। लोकतंत्र के पर्व (चुनाव) में सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन सीमावर्ती क्षेत्रों की आर्थिक निर्भरता को देखते हुए सूचनाओं का आदान-प्रदान त्वरित होना अनिवार्य है। यदि जल्द ही अधिसूचना जारी नहीं की गई, तो पर्यटन सीजन के बीच में यह ‘कम्युनिकेशन गैप’ बड़े आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है।

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