कम से कम तीन बच्चे पैदा करे हिंदू समाज, मोहन भागवत के बयान ने फिर बढ़ाई हलचल

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नया लुक डेस्क

लखनऊ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा हिंदू समाज में घटती जन्मदर पर व्यक्त चिंता ने एक बार फिर भारत में जनसंख्या, सामाजिक संरचना और भविष्य की जनसांख्यिकीय दिशा पर बहस को तेज कर दिया है। उनका यह कहना कि औसतन तीन से कम बच्चों वाला समाज भविष्य में समाप्ति की ओर बढ़ सकता है, केवल एक जनसंख्या संबंधी टिप्पणी नहीं बल्कि सामाजिक स्थिरता, सांस्कृतिक निरंतरता और आर्थिक संतुलन से जुड़े व्यापक विमर्श की ओर संकेत है।

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भारत में परिवार का आकार तेजी से छोटा हुआ है। शहरीकरण, बढ़ती शिक्षा, करियर प्राथमिकताएँ, जीवनयापन की बढ़ती लागत और महिलाओं की कार्यक्षेत्र में भागीदारी जैसे कारणों ने पारंपरिक संयुक्त परिवार मॉडल को छोटे परिवारों में बदल दिया है। आज का युवा दंपत्ति कम बच्चों के साथ बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन गुणवत्ता सुनिश्चित करने को प्राथमिकता देता है।
यह बदलाव केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है। दुनिया के कई विकसित देशों में जन्मदर गिरने से वृद्ध आबादी बढ़ रही है और कार्यबल कम हो रहा है, जिससे आर्थिक दबाव पैदा हो रहा है।

बीते दशकों में भारत ने जनसंख्या नियंत्रण को विकास का महत्वपूर्ण उपकरण माना। “हम दो, हमारे दो” जैसे अभियानों ने समाज में व्यापक स्वीकृति पाई। लेकिन अब चर्चा संतुलन की है, न अत्यधिक जनसंख्या, न अत्यधिक गिरावट। विशेषज्ञों का मानना है कि जनसंख्या का संतुलित ढांचा ही आर्थिक विकास, सामाजिक सुरक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता के लिए आवश्यक है। घटती जन्मदर लंबे समय में श्रमबल, सामाजिक सुरक्षा प्रणाली और पारिवारिक संरचना को प्रभावित कर सकती है।

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सामाजिक समरसता और कानून का सम्मान

अपने वक्तव्य में भागवत ने केवल जन्मदर ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कानून का सम्मान आवश्यक है और यदि कानून में कमी है तो उसे लोकतांत्रिक तरीके से बदला जा सकता है। जातिगत विभाजन को संघर्ष का कारण न बनने देने और समाज में अपनत्व की भावना विकसित करने पर उनका विशेष बल था। यह संदेश उस व्यापक सामाजिक चुनौती की ओर इशारा करता है जिसमें असमानता, सामाजिक दूरी और पहचान की राजनीति समाज की एकजुटता को प्रभावित करती है। “जो पीछे रह गए हैं उन्हें उठाना”, यह विचार सामाजिक न्याय और समावेशन की दिशा में महत्वपूर्ण है।

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जनसंख्या वृद्धि या कमी का प्रश्न केवल संख्या का नहीं है। यह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, लैंगिक समानता और सामाजिक सुरक्षा से गहराई से जुड़ा है। यदि समाज में आर्थिक स्थिरता, सुरक्षित भविष्य और गुणवत्तापूर्ण जीवन सुनिश्चित हो, तो परिवार स्वाभाविक रूप से संतुलित निर्णय लेते हैं। भारत को जनसंख्या बहस को भावनात्मक या राजनीतिक दृष्टिकोण से हटाकर दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से देखना होगा। घटती जन्मदर पर चिंता एक अवसर भी है। यह समाज को भविष्य की दिशा पर सोचने का मौका देती है। संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है समाज की गुणवत्ता, एकता और संतुलन। समन्वय, समावेशन और संतुलन — यही भविष्य की स्थिर सामाजिक संरचना की आधारशिला हो सकते हैं।

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