- भागने के बाद गढ़ी जाती है फिल्मी कहानी, लापरवाही बनी बड़ी वजह
ए अहमद सौदागर
लखनऊ। ट्राली चोरी करने के मामले में तालग्राम निवासी अंकित और ठठिया निवासी शिवा एक नाबालिग अपहरण कांड के आरोप में कन्नौज जिला जेल में बंद थे। नए वर्ष की रात को फौलाद जैसी चहारदीवारी फांदकर भाग निकलने में जेल के भीतर सुरक्षा में लगे जेलर और अधीनस्थों की ही भूमिका सामने आ रही है। इन लापरवाह जेलकर्मियों की लापरवाही का नतीजा था कि असलहों से लैस पुलिसकर्मियों के बीच से बंदी अंकित और शिवा उर्फ डिपी कबल के सहारे ही ऊंची दीवार फांदकर रफूचक्कर हो गए।
प्रारंभिक जांच पड़ताल में जेलर, डिप्टी जेलर और तीन वार्डरों की भूमिका संदिग्ध पाए जाने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित करने के साथ-साथ विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। अधिकारी पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच भी करा रहे हैं। यह महज दो बंदियों के जेल अभिरक्षा से भाग निकलने तथा उसके बाद पुलिस के लिए उन्हें दोबारा पकड़ने की चुनौती भर की बात नहीं है। दो बंदियों को जेल से भागने की सूचना जिम्मेदार अफसरों को देर में दी गई थी। दरअसल लोगों में बंदूक के दम पर खौफ जमाने वाले अपराधी अपनी संदूक के बूते खाकी को सेट करने में पीछे नहीं। जानकार बताते हैं कि पुलिस जेल के भीतर अपराधियों की माया का जाल खूब गहरा है।
जेलकर्मियों को नहीं खौफ
जेल से ही नहीं ट्रेन, कचहरी से भी कईयो अपराधी पुलिस को चकमा देकर भाग निकलते हैं।ऐसी हर वारदात के बाद अधिकारी अधीनस्थों के पेंच कसते हैं। जेल की फौलाद जैसी चहारदीवारी फांदकर या फिर अभिरक्षा से बंदियों के भाग निकलने पर आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा लिखे जाने से लेकर गिरफ्तारी तक की कार्रवाई होती है। पुलिसकर्मी सस्पेंड होते हैं। इसके बावजूद वे बार-बार सुरक्षा में चूक करते हैं।
नए साल की मस्ती पड़ी भारी
सलाखों के पीछे बंद बंदियों और वहां पर तैनात सुरक्षाकर्मियों का अपराध से नाता पुराना है। अपराधी की रकम से मौज-मस्ती करना पुलिसकर्मियों को महंगा भी पड़ता है। गौर करें तो इससे पहले भी कई बंदी और पेशी के दौरान अपराधी पुलिस अभिरक्षा से भाग चुके हैं और सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी लकीर पीटते रह गए।
