क्या मुंबई में बन सकती है बुर्कानशी मेयर

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संजय सक्सेना

मुंबई नगर निगम का चुनाव 15 जनवरी 2026 को होने जा रहा है और इससे पहले मेयर पद को लेकर राजनीति इतना गरमाई हुई है कि यह अब सिर्फ एक उम्मीदवार का चुनाव नहीं रह गया, बल्कि पहचान, भाषाई समीकरण, धर्म और सांस्कृतिक राजनीति का सबसे बड़ा मोर्चा बन चुका है। इस बार के बीएमसी चुनाव में मराठी मेयर, हिंदू मेयर, उत्तर भारतीय मेयर तथा मुस्लिम महिला मेयर जैसे मुद्दे आगे आए हैं, जिनका असर वोटरों की सोच और चुनाव के परिणाम पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। बीएमसी की 227 सीटों पर प्रत्यक्ष चुनाव होगा। उम्मीदवारों के नामांकन चरण में कुल 2,185 नामांकन दाखिल किए गए, जिनमें से 453 उम्मीदवारों ने नाम वापस ले लिया और अंततः लगभग 1,700 उम्मीदवारों ने अंतिम सूची में अपना नाम शामिल कराया। यह चुनाव महाराष्ट्र में बीएमसी समेत 29 नगरपालिकाओं के चुनावों का हिस्सा है, जिनमें 2,869 सीटों के लिए कुल 15,931 उम्मीदवार मैदान में हैं। कुल मतदाता लगभग 3.48 करोड़ हैं, जिसमें पुरुष मतदाता 1,81,93,666, महिला मतदाता 1,66,79,755 और अन्य मतदाता 4,596 शामिल हैं। बीएमसी चुनाव को आज राजनीतिक दलों ने पहचान आधारित राजनीति का सबसे बड़ा मंच बना दिया है। सबसे पहले महायुति गठबंधन (भाजपा‑शिंदे शिवसेना) ने अपनी रणनीति तैयार की और घोषणा की कि मुंबई का अगला मेयर मराठी और हिंदू होगा। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बार‑बार यह रेखांकित किया है कि वे मराठी पहचान की रक्षा करेंगे और महाराष्ट्र के मूल निवासियों के हित में काम करेंगे।

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भाजपा के बयान के बाद शिवसेना (यूबीटी) और मनसे ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा मुंबई में गैर‑मराठी और उत्तर भारतीय मतदाताओं को नजरअंदाज कर रही है। पहले भाजपा नेता कृपाशंकर सिंह ने दावा किया था कि बीएमसी में इतनी संख्या में उत्तर भारतीय नगरसेवक चुने जाएंगे कि उत्तर भारतीय मेयर बनेगा, बाद में उन्होंने अपने बयान से पल्ला झाड़ा। इसके बाद मुख्यमंत्री फडणवीस ने दोबारा कह दिया कि मेयर मराठी होगा, जिससे विवाद और गहरा गया। इसी बीच AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने एक सार्वजनिक सभा में यह मुद्दा उठाया कि अगर कोई मुस्लिम राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री या जज बन सकता है, तो मुंबई की मेयर मुस्लिम महिला क्यों नहीं बन सकती? उन्होंने कहा कि हमारा सपना यह है कि ‘कलमा पढ़ने वाली मुस्लिम महिला’ मुंबई की मेयर बने। वारिस ने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति आई लव महादेव बोल सकता है और वह मेयर बन सकता है, तो हिजाब पहनने वाली और कलमा पढ़ने वाली मुस्लिम महिला क्यों नहीं बन सकती? इस बयान के बाद राजनीतिक रंग और भी चढ़ गया क्योंकि वारिस का यह तर्क संविधान और लोकतंत्र के नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। यह सवाल पूछ रहा है कि क्या धार्मिक पहचान और संस्कृति लोकतांत्रिक अधिकारों की बाधा बन सकते हैं? मुंबई एक बहुसांस्कृतिक शहर है। यहाँ मराठी, हिंदीभाषी, गुजराती, दक्षिण भारतीय, मुस्लिम और अन्य सामाजिक‑धार्मिक समूह सहअस्तित्व में रहते हैं। इस विविधता के बीच पहचान के आधार पर राजनीति का मुद्दा जनता के बीच तीव्र बहस का विषय बन गया है।

इतिहास के पन्नों में देखें तो मुंबई नगर निगम में पहले भी मुस्लिम मेयर रहे हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा की रचनाओं के अनुसार 1934 में पहला मुस्लिम मेयर चुना गया था और उसके बाद 1963 तक कुल छह मुस्लिम मेयर रहे। प्रसिद्ध नामों में यूसुफ मेहर अली भी हैं, जिन्हें अप्रैल 1942 में बॉम्बे का मेयर चुना गया था और उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी का औपचारिक स्वागत भी किया था। इसके बाद 1963 के बाद से कोई मुस्लिम मेयर नहीं बना है, जिससे यह इतिहास राजनीतिक चर्चा का हिस्सा भी बन गया है।

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राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि बीएमसी चुनाव में सिर्फ पहचान‑आधारित राजनीति नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दे भी निर्णायक होंगे। मुंबई में ट्रैफिक, पानी की समस्या, कचरा प्रबंधन, सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य सुविधाएँ और शिक्षा जैसे मुद्दे रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करते हैं। विपक्षी दलों का दावा है कि भाजपा‑शिंदे शिवसेना महायुति इन मुद्दों की बजाय पहचान और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण पर ज्यादा जोर दे रही है ताकि वे वोट बैंक को मजबूत कर सकें। और दिलचस्प बात यह है कि चुनाव की प्रक्रिया में निर्विरोध जीत का तथ्य सामने आया है। बीएमसी समेत महाराष्ट्र के कई वार्डों में भारी संख्या में उम्मीदवारों को बिना मुकाबले जीत घोषित कर दिया गया। भाजपा के 44 उम्मीदवार निर्विरोध जीत गए और महायुति गठबंधन के कुल 68 उम्मीदवारों की जीत घोषित कर दी गई। यह स्थितियां राजनीतिक विपक्ष के लिए चिंता का विषय हैं क्योंकि लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने का आरोप लग सकता है।

आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि बीएमसी का चुनाव केवल राजनीतिक दलों का गठबंधन नहीं है, बल्कि इसमें भाषाई समीकरण भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। मुंबई में लगभग 30% मतदाता मराठी भाषी हैं, लेकिन अन्य समुदायों उत्तर भारतीय, गुजराती, मुस्लिम, दक्षिण भारतीय की भी महत्वपूर्ण संख्या है। इस तरह का आबादी विभाजन राजनीतिक दलों को रणनीति बनाते समय यह सोचना मजबूर करता है कि किस तरह के उम्मीदवार को आगे रखा जाए ताकि वे सभी समुदायों से वोट आकर्षित कर सकें। मुंबई नगर निगम की राजनीति ने यह भी स्पष्ट किया है कि धर्म और पहचान के मुद्दे वोटरों के मन में गहराई से बसे हुए हैं। जबकि एक ओर महायुति मराठी‑हिंदू पहचान को जोर दे रही है, वहीं विपक्षी दल मराठी बनाम उत्तर भारतीय के मुद्दे को उठाकर मराठी मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। AIMIM की मुस्लिम महिला मेयर की मांग ने यह सवाल उठाया है कि क्या सार्वजनिक पद किसी एक समुदाय या पहचान तक सीमित रह सकते हैं, या उन्हें लोकतांत्रिक विविधता के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए?

विश्लेषकों का मानना है कि यह पहचान‑आधारित राजनीति मतदाताओं की सोच को प्रभावित करेगी, लेकिन अंततः स्थानीय मुद्दों पर निर्णायक मत भी पड़ेगा। यदि वोटर यह महसूस करेंगे कि उनकी रोजमर्रा की समस्याएं हल नहीं हो रही हैं जैसे कि सड़कें, पानी, कचरा प्रबंधन तो वह पहचान की राजनीति से परे हटकर उन उम्मीदवारों को चुन सकते हैं जो वास्तविक समस्याओं का समाधान करने का वादा करते हैं। मतदान से पहले का मौसम दिखाता है कि राजनीतिक पार्टियाँ कड़ी तैयारी में लगी हैं। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की महाविकास अघाड़ी सीटों पर मुकाबला कर रही है और कांग्रेस‑एनसीपी भी कुछ हिस्सों में मैदान में दृढ़ता से काम कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी जैसे दल भी कुछ वार्डों में चुनौती दे रहे हैं। यह सब दिखाता है कि बीएमसी चुनाव में केवल एक या दो बड़े दलों की लड़ाई नहीं है, बल्कि बहु‑पक्षीय राजनीतिक संघर्ष है जिस पर हर समुदाय की निगाह है। अब सवाल यह उठता है कि 15 जनवरी को जब वोटों की गिनती होगी, तो क्या मुंबई के मतदाता पहचान‑आधारित राजनीति को मुख्य मानेंगे या स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देंगे? यह चुनाव केवल मेयर का चुनाव नहीं रहेगा, बल्कि यह एक बड़ा लोकतांत्रिक परीक्षण होगा कि मुंबई जैसे महानगर में वोटर किस तरह की नीति, नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को चुनते हैं। मुंबई की राजनीति ने इस चुनाव को सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान, सांस्कृतिक अधिकार और लोकतांत्रिक विविधता की लड़ाई भी बना दिया है। खिलाड़ी चाहे किसी भी दल के हों, अंत में यह मतदाता का फैसला होगा कि वे कौन‑सी पहचान को महत्त्व देते हैं और कौन सा नेतृत्व उन्हें बेहतर दिशा में ले जा सकता है।

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