पौष पुत्रदा एकादशी 2025 : संतान सुख और समृद्धि का विशेष पर्व

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राजेन्द्र गुप्ता


हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को बेहद पवित्र और फलदायी माना जाता है। इन्हीं में से एक है पुत्रदा एकादशी, जो खासतौर पर संतान सुख और वंश वृद्धि के लिए जानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन पूरे विधि-विधान से व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

कब है पुत्रदा एकादशी

साल 2025 में पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी 30 दिसंबर को पड़ रही है।

एकादशी तिथि शुरू: 30 दिसंबर सुबह 7:50 बजे

एकादशी तिथि समाप्त: 31 दिसंबर सुबह 5:00 बजे

व्रत पारण का समय: 31 दिसंबर को दोपहर 1:29 से 3:33 बजे के बीच

क्यों खास मानी जाती है पुत्रदा एकादशी?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने से संतान प्राप्ति का वरदान मिलता है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में राजा सुकेतुमान ने इसी व्रत के प्रभाव से संतान सुख प्राप्त किया था। यही कारण है कि यह व्रत खास तौर पर दंपत्तियों के बीच बहुत लोकप्रिय है।

साल में दो बार आती है पुत्रदा एकादशी

हिंदू पंचांग के अनुसार, साल में दो बार पुत्रदा एकादशी आती है। एक बार पौष माह में और दूसरी बार श्रावण मास में। दोनों ही तिथियों का विशेष धार्मिक महत्व होता है। मान्यता है कि इस व्रत से न सिर्फ संतान सुख मिलता है, बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। जो लोग नियमित रूप से एकादशी व्रत रखते हैं, उन्हें भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

पूजा विधि : इस दिन व्रत रखने से समृद्धि आती है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, साफ कपड़े पहनें। घर के मंदिर को साफ करें और भगवान विष्णु को धूप-अगरबत्ती अर्पित करें। प्रसाद चढ़ाएं और प्रार्थना करें।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत पारण विधि

सुबह स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद मंदिर की सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव कर शुद्ध करें। जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें। दीपक जलाकर आरती करें। मंत्रों का जप और विष्णु चालीसा का पाठ करें। सात्विक भोजन का भोग लगाएं। एक बात का खास ध्यान रखें कि भोग थाली में तुलसी के पत्ते जरूर शामिल करें। इसके बाद प्रसाद स्वयं भी ग्रहण करें। इस दिन मंदिर या गरीब लोगों में अन्न-धन समेत आदि चीजों का दान करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, द्वादशी तिथि के दिन दान करने से साधक को व्रत का पूर्ण फल मिलता है और जीवन में किसी भी चीज की कमी नहीं होती है।

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