वैचारिक धूर्तता और बौद्धिक बेईमानी है दीपू और हादी की मौत पर संतुलन खोजना

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  • दीपू को मारा गया क्योंकि उसने कहा “सभी ईश्वर एक हैं“हादी “ग्रेटर बांग्लादेश” का नक्शा बना रहा था, जिसमें उत्तर पूर्व, बिहार, बंगाल शामिल थे: यह भारत की संप्रभुता पर हमला था

रंजन कुमार सिंह

हमारे देश में ऐसे ढेरों नीच और पाखंडी हैं जिन्हें पहचानना आज सबसे ज़रूरी हो गया है। वही लोग जो कभी तालिबान द्वारा एक भारतीय पत्रकार की गोली मारकर की गई हत्या पर बंदूक और गोली को कोसते हुए लंबा उपदेश दे रहे थे, आज वही लोग बांग्लादेश में दीपू दास की बर्बर हत्या और भारत-विरोधी बयान देने वाले उनके शिष्य हादी की मौत को एक ही तराजू में तौलने की कोशिश कर रहे हैं। यही वह क्षण है जहाँ नैतिकता नहीं, बल्कि वैचारिक धूर्तता खुलकर सामने आती है। तथ्य यह है कि दीपू दास की हत्या किसी युद्ध या सशस्त्र संघर्ष में नहीं हुई। वह एक साधारण हिंदू युवक था, जिसे पुलिस कस्टडी से भीड़ ने खींचकर बाहर निकाला, नग्न किया गया, पीटा, फांसी पर लटकाया और फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया गया। उसका अपराध क्या था?

कथित रूप से इतना ही कि उसने कहा था कि सभी ईश्वर एक हैं। यह कोई राजनीतिक बयान नहीं था, यह कोई राष्ट्र-विरोधी गतिविधि नहीं थी, यह एक सामान्य मानवीय और आध्यात्मिक सोच थी। इसके विपरीत उसकी हत्या एक सांप्रदायिक हिंसा का वीभत्स उदाहरण है, जहाँ भीड़, पुलिस की निष्क्रियता और राज्य की विफलता तीनों एक साथ खड़े दिखाई देते हैं। दूसरी ओर हादी कोई मासूम युवक नहीं था, न ही कोई साधारण नागरिक। वह खुलकर भारत विरोधी बयान देता रहा, उसने “ग्रेटर बांग्लादेश” का नक्शा खींचा जिसमें भारत के उत्तर-पूर्व, बंगाल और बिहार को हड़पने की बात कही गई। यह सीधा भारत की संप्रभुता पर मौखिक हमला था। ऐसे व्यक्ति की हत्या के कारणों की जाँच होनी चाहिए, लेकिन उसे एक निर्दोष नागरिक की भीड़ द्वारा की गई सांप्रदायिक हत्या के बराबर खड़ा करना बौद्धिक बेईमानी के अलावा कुछ नहीं है।

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यही वह चाल है जिसमें झूठी समता रची जाती है। उत्पीड़क और पीड़ित को एक पंक्ति में खड़ा कर दिया जाता है, ताकि अपराध की प्रकृति ही धुंधली हो जाए। यह वही मानसिकता है जो तालिबान की बर्बरता पर आँसू बहाती है, लेकिन हिंदुओं की हत्या पर “दोनों तरफ हिंसा” का राग अलापती है। यही लोग बंदूक को तभी कोसते हैं जब मरने वाला उनकी वैचारिक पसंद का हो, अन्यथा वही बंदूक “प्रतिरोध” का प्रतीक बना दी जाती है। कम उम्र में ऐसी मीठी बातों में फँस जाना समझ में आता है। आदर्शवाद, मानवता और शांति के नारे युवा मन को आकर्षित करते हैं। लेकिन जब अधेड़ उम्र के लोग, जीवन का अनुभव रखने वाले लोग भी इस तरह के पाखंड के फैन बने रहते हैं, तो यह केवल भोलेपन का नहीं, बल्कि वैचारिक अंधत्व का मामला बन जाता है। वे देखना नहीं चाहते कि यह कथित मानवतावादी भाषा असल में किसकी ढाल बन रही है और किसके खून को जायज़ ठहरा रही है।

ऐसे लोग दीपू और हादी को एक जैसा बताकर असल मुद्दे से ध्यान हटा रहे है। मुद्दा यह नहीं है कि हत्या गलत है या सही, हर हत्या गलत है। मुद्दा यह है कि किसकी हत्या, क्यों की गई और किसने की। जब इन प्रश्नों को जानबूझकर मिटा दिया जाता है, तब न्याय नहीं, बल्कि अपराधियों के लिए वैचारिक सुरक्षा कवच तैयार किया जाता है। यही कारण है कि ऐसे लोगों का सबसे बड़ा योगदान शांति नहीं, बल्कि नैरेटिव मैनेजमेंट है। ये वही लोग हैं जो कल तक तालिबान को कोसते थे और आज भीड़ द्वारा जिंदा जलाए गए हिंदू युवक की हत्या पर “संतुलन” खोज रहे हैं। यही संतुलन असल में असंतुलन है, और यही सोच समाज को भ्रमित करती है, कमजोर करती है और अंततः अगला दीपू पैदा होने की जमीन तैयार करती है।

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