पौष अमावस्या आज: साल की अंतिम अमावस्या का विशेष महत्व और पूजा विधि

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राजेन्द्र गुप्ता

अमावस्या तिथि का हिंदू धर्म में बहुत ज्यादा महत्व है। यह पितरों को समर्पित है। पौष महीने में पड़ने वाली अमावस्या को पौष अमावस्या कहा जाता है। इसे साल की अंतिम अमावस्या भी माना जाता है, जिसका धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व बहुत अधिक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह तिथि विशेष रूप से स्नान, दान, तर्पण और पितरों की शांति के लिए बहुत शुभ मानी गई है।

पौष अमावस्या कब है?

वैदिक पंचांग के अनुसार, 19 दिसंबर 2025, दिन शुक्रवार को सुबह 04 बजकर 59 मिनट पर पौष अमावस्या की शुरुआत होगी। वहीं, इसका समापन 20 दिसंबर को सुबह 07 बजकर 12 मिनट पर होगा। पंचांग को देखते हुए इस साल पौष अमावस्या 19 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी।

पौष अमावस्या पर क्या करें? (पूजा विधि और उपाय)

पवित्र स्नान: इस दिन सुबह जल्दी उठकर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा) में स्नान करें। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।

सूर्य देव को अर्घ्य : स्नान के बाद, सूर्य देव को जल में लाल चंदन और लाल फूल डालकर अर्घ्य दें।

पितृ तर्पण और श्राद्ध : दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों को जल, काले तिल, सफेद फूल और कुश से तर्पण दें। उनके निमित्त श्राद्ध कर्म करें और पिंडदान भी कर सकते हैं।

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दान-पुण्य : गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, कंबल या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करें। इस दिन खीर बनाकर भगवान शिव को अर्पित करें और उसका कुछ हिस्सा पितरों के नाम से अलग निकालकर पशुओं को खिला दें, बाकी गरीबों में बांट दें।

पीपल वृक्ष की पूजा : शाम को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और 5 या 7 बार परिक्रमा करें। माना जाता है कि इससे पितृ दोष दूर होता है और शनिदेव प्रसन्न होते हैं।

व्रत और ध्यान : अपनी क्षमतानुसार निर्जला या फलाहार व्रत रख सकते हैं। शांत मन से अपने पूर्वजों को नमन करें और ईश्वर का ध्यान करें।

पितृ मंत्र: पितरों की शांति के लिए ‘ॐ पितृ देवतायै नमः’ या ‘ॐ पितृ गणाय विद्महे जगतधारिणे धीमहि तन्नो पित्रो प्रचोदयात्’ जैसे मंत्रों का जाप करें।

पौष अमावस्या का महत्व

पौष अमावस्या को ‘लघु पितृ अमावस्या’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह पितरों को याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए कर्मकांड करने का एक महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन किए गए श्राद्ध, तर्पण और दान से पितर प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। माना जाता है कि इस दिन पितृलोक से संपर्क स्थापित करने की शक्ति अधिक होती है, जिससे वंश में सुख, स्वास्थ्य और संतुलन आता है। यह पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए भी एक प्रभावी दिन माना जाता है। पौष माह भगवान सूर्य देव को समर्पित है, इसलिए इस दिन सूर्य देव की पूजा का भी विशेष महत्व है। इसके साथ ही, इस अमावस्या पर शनिदेव की पूजा करने से भी लाभ मिलता है और साढ़ेसाती व ढैय्या के प्रभाव कम होते हैं।

  • पौष अमावस्या पर क्या न करें?
  • इस दिन नाखून और बाल काटने से बचें।
  • किसी भी प्रकार के नए और शुभ कार्य की शुरुआत न करें।
  • तामसिक भोजन (मांस, मदिरा) का सेवन न करें।
  • घर में कलह या वाद-विवाद से बचें।

पौष अमावस्या का दिन हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और आत्म-शुद्धि का अवसर प्रदान करता है। इन सरल विधियों और उपायों को अपनाकर आप पितरों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सुख-शांति ला सकते हैं।

 

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