सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह के समय महिला के माता-पिता या रिश्तेदारों द्वारा दी गई नकदी, आभूषण, संपत्ति या अन्य कोई भी चीज़ तलाक के बाद महिला की निजी संपत्ति मानी जाएगी और उसे वापस लौटाई जानी चाहिए। यह अधिकार मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा-3 से सीधे मिलता है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि इस कानून की व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत समानता, गरिमा और स्वायत्तता के सिद्धांतों के साथ पूरी तरह सामंजस्य रखते हुए की जानी चाहिए। कोर्ट ने जोर दिया कि 1986 का यह कानून केवल एक सिविल दावे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पितृसत्तात्मक भेदभाव से जूझ रही महिलाओं, खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में, को आर्थिक सशक्तीकरण और सम्मान देने का माध्यम है।
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पीठ ने टिप्पणी की कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों के लिए समानता का सपना देखता है, जो आज भी पूर्ण रूप से साकार नहीं हुआ है। ऐसे में न्यायपालिका का दायित्व है कि वह सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित व्याख्या करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शादी से पहले, शादी के समय या शादी के बाद पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा दी गई संपत्ति भी तलाक की स्थिति में महिला को वापस मिलनी चाहिए।
