दो टूक : अब गठबंधन के हर दल को कांग्रेस लगने लगी बोझ…

राजेश श्रीवास्तव

कहा जाता है कि जब आपका समय खराब हो या फिर आप लगातार पराजित हो रहे हों तो आपको वो लोग भी ज्ञान देकर चले जाते हैं जिनकी कोई बिसात न हो, कमोवेश यही हाल कांग्रेस का बिहार चुनाव परिणाम आने के बाद हो गया है। कोई कांग्रेस को सलाह दे रहा है तो कोई उसके सिर पर हार का ठीकरा फोडने की कवायद में जुटा है। देश के हिंदी भाषी राज्यों यूपी बिहार में पहले से ही संघर्ष कर रही कांग्रेस जब बिहार में हाशिये पर आयी तो अब यूपी में समाजवादी पार्टी के नेता उसे अभी से 2०27 के विधानसभा चुनाव में कम सीटें देने की उलाहने देने लगे हैं और माहौल ऐसा तैयार किया जा रहा है कि उसे तीस सीटें भी मिल जायेें तो बड़ी बात है। कांग्रेस नहीं कभी सपने में भी सोचा होगा कि उप्र में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही समाजवादी पार्टी के एक प्रवक्ता ने तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी को विपक्ष के नेता का पद छोड़ने और अखिलेश की ताजपोशी की भी अपनी इच्छा जता दी। अब बेचारे कांग्रेस के नेता इन दिनों बगले झांकते घूम रहे हैं। लेकिन अब समाजवादी पार्टी को कौन समझाये कि जो हालत राजद की बिहार में हुई है कहीं वहीं हालत उसकी उत्तर प्रदेश में न हो जाये, क्योंकि जब सामने मोदी हो तो सब कुछ मुमकिन हैै। अब चुनाव जीतना आसान तो है नहीं आप के पास न इतनी क्षमता है न इतने तिकड़म । तो फिर कांग्रेस का हार जाना कौन सी बड़ी बात।

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद कुछ समय विपक्षी खेमे में खामोशी रही, लेकिन बाद में अलग-अलग सुर सामने आने लगे। सवाल यह है कि भविष्य में इंडिया गठबंधन अस्तित्व में रहेगा या नहीं? अगर अस्तित्व में रहता है तो इसके नेतृत्व की कमान राहुल गांधी के पास ही रहेगी या अखिलेश यादव अथवा ममता बनर्जी इसकी कमान संभालेंगे? समाजवादी पार्टी चाहती है कि इंडिया गठबंधन के नेतृत्व की जिम्मेदारी अब अखिलेश यादव को सौंपी जानी चाहिए। वहीं, 2०26 में बंगाल के नतीजे ममता की भूमिका तय करेंगे। दरअसल यह गठबंधन उसी दिन खत्म हो गया, जब नीतीश कुमार इसे छोड़ गए थे। शरद पवार इस गठबंधन का हिस्सा थे, लेकिन उनकी पार्टी एनसीपी ही टूट गई। यह गठबंधन केवल चर्चा में ही था। राहुल गांधी भारत की बदली हुई राजनीति के लिए योग्य नजर नहीं आते। राहुल गांधी की पूरी राजनीति कांग्रेस के आत्म-विनाश की राजनीति है। जब तक राहुल गांधी के हाथ में विपक्ष की कमान रहेगी, तब तक देश में सकारात्मक विपक्ष खड़ा नहीं हो सकेगा। तेजस्वी यादव को बिहार में जो कुछ हासिल हो सकता था, वह भी राहुल ने होने नहीं दिया। बिहार की राजनीति ने साफ कर दिया कि मुसलमानों को अगर विकल्प मिलेगा तो वो कांग्रेस का साथ नहीं देंगे।

कांग्रेस की ताकत अब खत्म हो गई है। नीतीश कुमार और ममता बनर्जी, ये दो इंडिया गठबंधन के संस्थापक सदस्य रहे। दोनों अलग हो गए। अरविद केजरीवाल भी इससे अलग हो गए। फिर यह धारणा बन गई कि इस गठबंधन का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं। हालांकि, गठबंधन के अंदर इस बात की कभी चर्चा नहीं हुई। इंडिया गठबंधन ने राहुल का नेतृत्व कभी स्वीकार नहीं किया। 99 लोकसभा सीटें लाने के बाद भी उनका नेतृत्व स्वीकार नहीं किया गया। 2023 में जब इंडिया गठबंधन की नींव रखी गई थी, तो यह लग रहा था कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ हर सीट पर इंडिया गठबंधन का एक संयुक्त उम्मीदवार होगा, लेकिन फिर हालात बदले। नीतीश कुमार जब गठबंधन से अलग हो गए, तो यह विपक्ष के लिए सबसे बड़ा झटका था। इस बार बिहार में महागठबंधन को कई सीटों पर आपस में ही दोस्ताना मुकाबला लड़ना पड़ा। बिहार के जनादेश के बाद क्षेत्रीय दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस उनके लिए फायदेमंद है या मजबूरी है। अब क्या बंगाल में ममता और तमिलनाडु में स्टालिन कांग्रेस को तवज्जो दे पाएंगे?

सही देख्ों तो इंडिया गठबंधन उस शेल कंपनी की तरह है, जिसका काम सिर्फ साल में एक बार आयकर रिटर्न दाखिल करने का होता है। घटक दलों की राजनीति दिलचस्प रही है। लालू प्रसाद यादव, ममता बनर्जी, मुलायम सिह यादव जमीन से जुड़े नेता थे। मुलायम सिह 1० साल बाद भी किसी से मिलते थे, तो उन्हें उसके गांव, परिवार के बारे में सब याद रहता था। नीतीश कुमार भी ऐसे ही नेता हैं। राहुल गांधी इस मामले में अलग हैं। वे जनता से कटे-कटे रहते हैं। राहुल चुनाव से चार दिन पहले आते हैं और एक मुद्दा उछालकर टाइगर सफारी चले जाते हैं। अब एनडीए ने विपक्ष को सिखा दिया है कि वोट कैसे मिलेंगे। वोट जनता के बीच जाकर ही मिलेंगे। राहुल गांधी मेहनत ज्यादा करते हैं, लेकिन फिर अचानक कहीं चले जाते हैं। समस्या उनकी कार्यशैली को लेकर है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन सुधारा, लेकिन उसका श्रेय राहुल गांधी को नहीं मिल पाता। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अगर सपा और कांग्रेस साथ चुनाव नहीं लड़ते तो सपा को 1० सीटें बमुश्किल मिल पातीं।

लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में तो कांग्रेस का प्रदर्शन राजद के मुकाबले अच्छा रहा था। बिहार चुनाव को लेकर एक पहलू यह है कि राहुल गांधी ने उतना प्रचार नहीं किया। दूसरा पहलू यह है कि तेजस्वी यादव को प्रोजेक्ट करने से जंगलराज का मुद्दा हावी हो गया। बिहार में तो विपक्ष ने सारा दांव तेजस्वी पर ही लगाया था। जहां तक इंडिया गठबंधन के नेतृत्व की बात है, तो वह राष्ट्रीय गठबंधन है। राष्ट्रीय स्तर पर हुए गठबंधन का नेतृत्व राष्ट्रीय दल ही कर सकता है, क्षेत्रीय दल नहीं। जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है, तो मतदाता के सामने जो पार्टी ऐसा विकल्प तैयार करे कि जो भाजपा को वोट न देना चाहे वह किसको दे, अब यह विकल्प सपा बने या कांग्रेस, यह इनको सोचना है। लेकिन यह भी तय है कि बीते लोकसभा चुनाव में अगर सपा को इतनी सीटें मिलीं तो उसके पीछे कांग्रेस का साथ होना ही है पर यह सपा को समझाये कौन।

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