हे भगवान! क्या हो रहा है ये, अब युवा हार रहे ज़िंदगी

  • अवसाद या पारिवारिक कलह:  क्या कारण है कि युवा मौत को लगा रहे गले
  • हद से ज्यादा अपेक्षा और आपसे में विश्वास की कमी बड़ी परेशानी

दादी दादा अब साथ नहीं रहते। मां बाप के साथ उठना बैठना अब के बच्चों को अच्छा नहीं लगता। लेकिन इसका बड़ा दुष्परिणाम भी यही पीढ़ी भुगत रही है। गोरखपुर से सटे देव भूमि देवरिया के नाम से विख्यात इस जिले की पांच घटनाएं दिल को झकझोरने के लिए काफी है। दो दिन के अंदर जिले के पांच लोगों ने आत्महत्या कर लिया है। किसी में इसकी वजह पारिवारिक कलह बताई जा रही है तो कई में एकाकीपन। परिवारिक कलह व मानसिक तनाव जानलेवा साबित हो रहे हैं। सवाल उठता है कि आखिर इन घटनाओं पर रोक कैसे लगेगी। पुलिस जांच में सामने आया है कि अधिकांश मामलों में विवाद या घरेलू तनाव आत्मघाती कदम की वजह बना परिवार के अंदर संवाद की कमी भी इसकी वजह बताई जा रही है।

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मनोवैज्ञानिक डॉ विजित जायसवाल का कहना है कि हर व्यक्ति में तनाव झेलने की क्षमता अलग होती है, इसलिए संवेदनशील व्यवहार जरूरी है। आत्महत्या कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं होता, बल्कि लंबे समय तक चले आ रहे अवसाद, निराशा व पारिवारिक दबाव का परिणाम होता है।

डॉ प्रणव आनंद कहते हैं कि  डिप्रेशन कोई नई बीमारी नहीं है। काउंसिलिंग और उपचार से इन घटनाओं को रोका जा सकता है।

लार थानाक्षेत्र के नेमा में मंगलवार की रात 27 वर्षीय चंद्रकला देवी ने दो वर्षीय बेटे कार्तिक के साथ फांसी लगाकर आत्महत्या कर दी। पुलिस ने दहेज के लिए प्रताड़ना का केस ससुराल वालों के विरुद्ध दर्ज किया।

बरहज थानाक्षेत्र के बरिया गांव में सोमवार की रात 30 वर्षीय रविंद्र कुमार पुत्र संपत प्रसाद ने पंखे की कुंडी से फंदा लगाकर जान दे दी। लोगों ने उसके नशे का आदी होने की बात कही है।

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वहीं लार के शास्त्री नगर वार्ड में 26 वर्षीय सोनू कन्नोजिया ने मंगलवार की शाम फांसी लगाकर जान दे दी। परिवार में पत्नी के अलावा तीन बच्चे हैं।

देवरिया के रामनाथ मेहल्ले के रहने वाले योग प्रशिक्षक 28 , वर्षीय सुनील कुमार पुत्र मुन्नीलाल ने मंगलवार को कमरे मे पंखे से लटककर जान दे दी। स्वजन के मुताबिक, पत्नी के दीपावली के पहले नाराज होकर मायके जाने से वे आहत थे। वह दो वर्ष से पत्नी को लेकर परिवार से अलग रहते थे। उनके तीन बच्चे हैं। व्यक्ति यह सोचते हैं कि वे अपनी सहायता करने में पूरी तरह अक्षम है। उनके भीतर निराशा का भाव आने लगता है। अंदर ही अंदर घुटते रहते है। इसके लिए जरूरी है। यदि कोई व्यक्ति एकाकीपन महसूस कर रहा हो तो तत्काल उससे संवाद करें । उसकी काउंसिलिंग कराएं। जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक से दिखाएं व उपचार कराएं। तभी इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाई जा सकती है।

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डॉ विजित कहते हैं कि 20 से 30 आयु वर्ग के युवा अपने माता-पिता से दूर होते जा रहे है। संवाद की कमी देखी जा रही है। ये अपनी कोई बात माता-पिता से साझा नहीं करते। तनाव में आ जाते हैं। वहीं डॉ प्रणव कहते हैं कि कई बार नई उम्र के पति पत्नी भी आपस में कई चीजें साझा नहीं करते। साथ ही क्षमता से अधिक एक दूसरे से अपेक्षाएं हैं। लोग अपने लाइफ की सच्चाई से दूर आभासी दुनिया की ज्यादा तवज्जो देने लगते हैं। जिससे तनाव बढ़ता जाता है। परिवार के सदस्यों को संवाद करते रहना चाहिए। आप यदि किसी को ऐसे एकाकी हाल में देखते हैं तो उनसे बातचीत करना जरूरी होता है। साथ ही समाज को भी जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। वह किसी को ऐसे अकेले न रहने दे जो अपनी परेशानियों से दो चार हो रहे हैं। सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने वाले मानस गार्डन लखनऊ के अवनीश तिवारी बताते हैं कि अब युवा अपने विवाहेत्तर संबंधों के कारण परेशान हैं। जिनकी शादी नहीं हुई है वो ब्रेकअप से परेशान रहते हैं। ये भी अवसाद में जाने का बड़ा कारण बन जाता है।

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