मिहिरा : कथक की सनातन अध्यात्म के मूल स्वरूप

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  मिहिरा:  कृष्ण के प्रेम में डूबी मीरा की भक्ति, समर्पण और सम्मिलन की अद्भुत प्रस्तुति

आचार्य संजय तिवारी

भारतीय सनातन अध्यात्म की शास्त्रीय रंग परंपरा भी है। कथा से उपजी भक्ति को इसी परंपरा ने मंदिरों के माध्यम से स्थापित कर मानवीय संवेदना में पिरो कर इसे जनस्वीकृति दी थी। कालांतर में आक्रमणों और बाह्य प्रभावों ने इस श्रृंखला को तोड़ा या विराम दिया। कुछ प्रस्तुतियां विलीन हुईं और कुछ को नया स्वरूप मिला।

कथा से निकाल कर इसे वाह्य संस्कृतियों ने गीतों, ग़ज़लों और अन्य आधार स्वरों में ढालने की कोशिश की। इसी क्रम में मंदिरों से कथक के स्वर बाहर कर इसे ठुमरी और गजल में रंग दिया गया। यह क्रम चल रहा था।

कथक गजल के माध्यम से मंदिरों के बाहर निकल कर कोठों और दरबारों में छमका। कथक जैसे नृत्य विधा को वर्षों तक इसी रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा। बीते वर्ष के अंतिम दिनों में कथक की भक्ति परंपरा की कथा फिर जीवंत हुई और घुंघरू के स्वर कृष्ण भक्ति में रम गए।

कथक की यह ऐसी मधुमति यात्रा शुरू हुई जिसके लिए प्रख्यात शास्त्रीय अभिनेत्री , कथक नृत्यांगना माया कुलश्रेष्ठ की जितनी प्रशंसा की जाय वह बहुत कम होगी।

माया ने कथक को कृष्ण के प्रेम में डूबी मीरा की भक्ति, समर्पण और सम्मिलन की अद्भुत प्रस्तुति देकर इसे इसकी मूल शास्त्रीय शैली में स्थापित किया, यह ऐतिहासिक है। कथक की सनातन अध्यात्म के मूल स्वरूप की नई यात्रा शुरू हुई। यह अद्भुत है।

नृत्य से निर्वाण तक, कथक की लय में मीरा का पुनर्जन्म, ‘मिहिरा’ में दिखी भक्ति, विद्रोह और समर्पण की गाथा तबले की थाप और घुंघरुओं की झंकार जब एक ही लय में एकाकार हो जाती है, तो नृत्य केवल दृश्य नहीं रह जाता वह स्मृति बन जाता है।

स्मृति उस समय की, उस स्त्री की और उस भक्ति की, जिसने प्रेम को विद्रोह और समर्पण को साधना बना दिया।

कथक की परंपरा में सजी एक ऐसी ही संध्या में मीरा की गाथा ने मंच पर आकार लिया। तबले पर लगातार जितनी गति और लय के साथ उंगलियां गिर रही थीं पांव में बंधें घुंघरू ठीक उसी गति के साथ रुनझुन झनक पैदा कर रहे थे।

तीनताल के पलटों और कायदों में बंधी लय, पैरों की थाप, उंगलियों की मुद्राएं और नयनों के उनसे मेलजोल में इतनी समानता-इतनी परस्परता थी कि ऐसा लगे कि जैसे एक न हो तो दूसरा भी बंद हो जाए। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में दर्ज है।

‘यतो हस्तः ततो दृष्टिः,
यतो दृष्टिः ततो मनः’

यानी जहां हाथ (मुद्रा) हो वहां नजर होनी चाहिए और जहां नजर पहुंचे मन को भी वहीं होना चाहिए। मन कहां था? मन तो न जाने कब आज से 500 साल पीछे वहां जा चुका था, जहां मेड़ता के एक गांव में सात वर्ष की एक बालिका खेल-खेल में श्रीकृष्ण को अपना पति मान लेती है और फिर तो उस सांवरे के रंग में ऐसा रंगी कि उसकी रंगत आज भी भक्ति परंपरा के सुनहरे इतिहास में ऐसी सजी-संवरी मिलती है कि भुलाई नहीं भूलती

इतिहास के पन्ने जब भी पलटे जाते हैं तो कभी उनसे आवाज आती है, ‘मेरे ते गिरधर गोपाल’, तो कहीं सुनाई दे जाती है ‘स्याम का चाकर बनने की प्रसन्नता की धुन’ तो कहीं हृदय की अंतस गहराइयों में घर बना लेती है एक पुकार, जो कहती है ‘बसौं मेरे नैनन में नंदलाल’।

मंच पर उतरी भक्त मीरा की महागाथा

इंडिया हैबिटेट सेंटर के मंच पर मीरा की गाथा जीवंत हो उठी। कथक की नृत्य परंपरा में सजी, तीनताल में बंधी हुई और राग यमन, पीलू समेत कुछ अन्य भाव पूर्ण शास्त्रीय रागों की मिश्रित राग परंपरा में सजी पदावलियां जैसे-जैसे नृत्य का विषय बनतीं वह अपना अर्थ पा जाती थीं।

अंजना वेलफेयर सोसाइटी के बैनर तले कथक नृत्यांगना माया कुलश्रेष्ठ ने हिंदी साहित्य की भक्ति परंपरा की सिरमौर और संत कवियत्री मीरा की गाथा को नृत्य का विषय बनाया और उसे अपनी साथी कलाकारों के साथ प्रस्तुत किया. मीरा का केंद्रीय किरदार भी माया ने ही निभाया. उन्होंने पवित्रता, भक्ति, समर्पण, त्याग, सिद्धि और निर्वाण इन सभी भावों को विभिन्न नृत्य मुद्राओं के जरिए मंच पर उकेरा।

सूर्यदेव से प्रेरित था मीरा का नाम

इस नृत्य प्रस्तुति का नाम उन्होंने ‘मिहिरा’ रखा, लेकिन क्यों? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए माया बताती हैं कि आज हम जिन्हें मीरा नाम से जानते हैं, वह असल में ‘मिहिरा’ ही थीं। मिहिरा नाम सूर्यदेव के एक वैदिक नाम मिहिर से निकला है। जब मीरा का जन्म हुआ तो उनके दादाजी ने उनका नाम मिहिरा रखा था।

जिस दौर में कन्या का जन्म उदासी का भाव ले आता था, उस दौर में एक पुत्री को स्वीकारना और उसे सूर्य की शक्ति के पर्याय का नाम देना, अपने आप में एक बड़ा कदम रहा होगा। मीरा के भीतर जो भक्ति आधारित, प्रेम से भरा और समर्पण के रूप में विद्रोही भाव जन्मा उसकी शुरुआत शायद यहीं से होती है।

मेवाड़ और चित्तौड़ के दर्ज इतिहास में जहां मीरबाई का जीवन परिचय लिखा गया है, कई लेखकों ने उन्हें उनके जीवन के शुरुआती नाम ‘मिहिरा’ से ही पुकारा है। यही मिहिरा आगे चलकर लोकभाषा और बोली में मीरा बन जाता है।

मानवीय आकांक्षा से दिव्य मिलन तक

इस मौलिक प्रस्तुति में माया कुलश्रेष्ठ मीरा की यात्रा को शास्त्रीय और समकालीन नृत्य शैलियों के समृद्ध ताने-बाने में पिरोती हैं। उनकी कोरियोग्राफी मीरा के रूपांतरण को सामने रखती है। जहां वह पहले एक राजकुमारी, फिर एक राजा की पत्नी बनती हैं।

वह सांसारिक खेल से गृहस्थ की ओर बढ़ती हैं, लेकिन इसके साथ ही बढ़ती जाती है उनकी भक्ति और श्रीकृष्ण के प्रति उनका समर्पण, फिर वह राजमहल की सीमाओं से निकलकर भक्ति के असीम पथ तक, अपनी सरल प्रार्थनाओं से उन्मुक्त कीर्तन तक, मानवीय आकांक्षा से दिव्य मिलन तक की यात्रा तय करती हैं।

नृत्य में उनकी इस यात्रा को शब्द देते हैं मीरा के ही कई पद, जिन्हें कुछ बदलावों के साथ और भावपूर्ण बना दिया गया।

जाऊं मैं गिरधर के घर जाऊं,
लोक-लाज सब तोड़ निभाऊं,

संसार कहे जो, कहने दूं,
मैं तो श्याम नाम रस पाऊं।

सशक्त अभिनय, प्रभावशाली ध्वनि और काव्यात्मक मंच-सज्जा के साथ ‘मिहिरा’ सत्य की खोज में जुटी एक वैरागी का जीवन बन जाती है। मंच पर उकेरा गया हर एक दृश्य मीरा के पदों से प्रेरित है, जो उनके साहस, समर्पण और उस उज्ज्वल प्रेम को सामने रखता है जिसने अपने समय की रूढ़ियों को चुनौती दी।

‘मिहिरा’ केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक अनुभूति है। नारी शक्ति, आध्यात्मिक जागरण और उस कला का उत्सव है जो मानव हृदय की गहराइयों को आज भी प्रकाशित करती है। मिहिरा के माध्यम से माया ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा को एक प्रकार से पुनर्परिभाषित भी किया है और इसके मूल स्वरूप को पुनर्स्थापित भी।

यह अद्भुत इसलिए है क्योंकि सैकड़ों वर्षों से इस महान परंपरा को किसी ने शोधित करने का साहस नहीं जुटाया। माया ने यह साहस भी जुटाया और खूब अच्छे से सफलता भी अर्जित की। निश्चित रूप से माया कुलश्रेष्ठ इस सदी की सर्वश्रेष्ठ नृत्यांगना हैं जिन पर सनातन भारतीय शास्त्रीय परंपरा गर्व करेगी।

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