उमेश चन्द्र त्रिपाठी
फरेंदा /महराजगंज । लोकतंत्र की मजबूती अपनी भाषा में ही सम्भव है, भारत में संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा एवं राजभाषा अधिनियम के बारे में वर्णित है। हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने का पहला प्रस्ताव दक्षिण भारत से आयंगर जी के माध्यम से आया। यह कहना है दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. चितरंजन मिश्र का, उन्होंने सोमवार को लाल बहादुर शास्त्री स्मारक पी.जी. कॉलेज आनन्दनगर, महराजगंज में हिंदी विभाग और राष्ट्रीय सेवा योजना के संयुक्त तत्वावधान में “राष्ट्रभाषा हिंदी : चुनौतियां एवं संभावनाएं” विषय पर आयोजित वैचारिक संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधित कर रहें थे।
उन्होंने कहा कि हिंदी ही भारतीय मानस को स्वाधीन चेतना दें सकती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहें महाविद्यालय के प्रबंधक डॉ. बलराम भट्ट ने कहा कि हिंदुस्तान में हिंदी दिवस व हिंदी पखवाड़ा मनाया जाना अपने आप में विडंबना है क्योंकि हम अपनी भाषा को छोड़कर विदेशी भाषा को सिखने में ऊर्जा लगा रहें है, इससे युवा न तो ढंग से हिंदी बोल पा रहें है और न ही अन्य भाषा । अपनी भाषा ही सृजनात्मकता को लाती है और उसी से देश का विकास होता है। प्राचार्य डॉ. राम पाण्डेय ने अतिथियों का परिचय कराते हुए कहा कि उधार की भाषा से कोई भी राष्ट्र समृद्ध नहीं हो सकता, अतः हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने से देश की एकता-अखंडता तथा लोकतंत्र मजबूत होगा।
कार्यक्रम का शुभारम्भ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्ज्वलित कर किया। अनुष्का व निशु ने सरस्वती वंदना एवं विशाल व अनुष्का ने स्वागतगीत प्रस्तुत किया। मंच का संचालन डॉ. मनोज कुमार एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रीति यादव ने किया। इस अवसर पर डॉ तृप्ति त्रिपाठी, डॉ. शिव प्रताप सिंह, बृजेश कुमार वर्मा, अजीत सिंह, डॉ. प्रवीण कुमार मिश्र, डॉ. सोनी भट्ट, डॉ. बाल गोविन्द मौर्य, डॉ. चन्द्र प्रकाश, डॉ. जितेंद्र प्रसाद, डॉ. वैभवमणि त्रिपाठी, डॉ. डी.के. चौबे, डॉ. बी.के. मालवीय, डॉ. अनिल मिश्र, डॉ. अखिलेश मिश्र, डॉ. अर्चना दीक्षित, भागीरथी भट्ट, सौरभ भट्ट, दिनेश भट्ट, धर्मेंद्र सिंह एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहें ।
