केशव मौर्य के सहारे भाजपा का ओबीसी दांव, संगठन और सत्ता के संतुलन से 2027 की तैयारी

keshav maurya
अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय जनता पार्टी में उत्तर प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर पिछले कई महीनों से चल रहा मंथन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिले अपेक्षाकृत कमजोर जनादेश के बाद संगठन के पुनर्गठन की जरूरत महसूस की जा रही है। राज्य में अब तक भूपेंद्र चौधरी के बाद किसी नए प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा नहीं हो सकी है, और इस विलंब को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं में सवाल भी उठने लगे हैं। इस बीच उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की बढ़ती सक्रियता, दिल्ली में लगातार शीर्ष नेताओं से मुलाकातें और ओबीसी समीकरण को लेकर उनका नाम चर्चा के केंद्र में आ गया है।उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन लोकसभा चुनाव में चिंताजनक रहा। जहां 2019 में भाजपा ने सहयोगियों सहित 64 सीटें जीती थीं, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 36 रह गई। इसमें भी भाजपा अकेले 33 सीटें जीत पाई, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 43 सीटों पर कब्जा जमाकर स्पष्ट संकेत दे दिया कि विपक्ष की सामाजिक रणनीति ने भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाई है। खासतौर पर ओबीसी और दलित समुदाय के मतदाताओं का झुकाव सपा के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले की ओर गया।
ऐसे में भाजपा के रणनीतिकारों को यह समझ में आ गया है कि यदि 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को जीत की हैट्रिक बनानी है, तो संगठन को फिर से सशक्त करना होगा। यही वजह है कि पार्टी अब ऐसा चेहरा तलाश रही है, जो न सिर्फ संगठनात्मक अनुभव रखता हो, बल्कि सामाजिक समीकरणों को साधने में भी सक्षम हो। इस समीकरण में सबसे उपयुक्त नाम एक बार फिर उभर कर आया है केशव प्रसाद मौर्य का।8 जुलाई को केशव प्रसाद मौर्य की दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकातों ने चर्चाओं को हवा दी। यह मुलाकातें केवल शिष्टाचार नहीं मानी जा रही हैं, बल्कि इन्हें संगठन के पुनर्गठन और आगामी चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। खुद केशव मौर्य ने इस बात की पुष्टि की है कि इन बैठकों में 2027 की जीत की रणनीति पर चर्चा हुई। यह वही केशव मौर्य हैं, जिनके नेतृत्व में 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 में से 312 सीटें जीतकर इतिहास रचा था। उस समय वे प्रदेश अध्यक्ष थे और उन्होंने पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का काम किया था।
मौर्य की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे भाजपा के मूल कार्यकर्ता रहे हैं, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से होते हुए पार्टी की मुख्यधारा में आए। उनका व्यक्तित्व एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर उपमुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले नेता का है, जो पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। यही वजह है कि संगठन को फिर से सक्रिय और ऊर्जावान बनाने के लिए उनके नाम पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।केशव मौर्य का नाम भाजपा के लिए इस समय और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि पार्टी को एक बार फिर ओबीसी समुदाय को अपने साथ मजबूती से जोड़ना है। भाजपा को अच्छी तरह से यह एहसास हो चुका है कि विपक्ष, खासकर सपा, ओबीसी वोट बैंक को खींचने की पूरी कोशिश में है। अखिलेश यादव ने पीडीए फार्मूले को जिस तरीके से पेश किया है, उसमें ओबीसी और दलित वर्ग को प्रमुखता दी गई है। ऐसे में भाजपा को जवाब उसी अंदाज में देना होगा। और यह काम केशव मौर्य जैसे कद्दावर ओबीसी नेता ही कर सकते हैं, जिनकी सामाजिक स्वीकार्यता व्यापक है।
केशव प्रसाद मौर्य और अखिलेश यादव

हालांकि, प्रदेश अध्यक्ष पद पर फैसला केवल सामाजिक समीकरणों के आधार पर नहीं लिया जाएगा। इसके पीछे संगठन और सत्ता के बीच संतुलन की भी बड़ी भूमिका है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ को 2027 में मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में दोबारा प्रोजेक्ट किया जाना तय है। लेकिन समय-समय पर पार्टी के अंदर से ऐसी आवाजें उठती रही हैं कि केशव मौर्य को भी सीएम पद का दावेदार घोषित किया जाना चाहिए। ऐसे में पार्टी के लिए यह जरूरी हो जाता है कि मौर्य को संगठन में लाकर उन्हें सत्ता की दौड़ से बाहर रखा जाए, ताकि योगी आदित्यनाथ का रास्ता साफ रहे।इस पूरी रणनीति के पीछे केंद्रीय नेतृत्व की सोच यह है कि पार्टी को एक ऐसा चेहरा चाहिए, जो न सिर्फ सामाजिक समीकरणों को साधे बल्कि संगठन को भी धार दे। और इस पैमाने पर केशव मौर्य खरे उतरते हैं। यही कारण है कि अमित शाह ने हाल ही में एक कार्यक्रम में मौर्य को ‘प्रिय मित्र’ कहकर संबोधित किया, जबकि योगी आदित्यनाथ को ‘लोकप्रिय मुख्यमंत्री’ बताया। यह संकेत है कि पार्टी नेतृत्व दोनों नेताओं को संतुलित रूप से आगे बढ़ाना चाहता है।

इस बीच भाजपा के भीतर और भी कई नामों पर विचार किया जा रहा है। ओबीसी वर्ग से स्वतंत्रदेव सिंह, अमर पाल मौर्य, धर्मपाल सिंह लोधी, बीएल मौर्य और बाबूराम निषाद के नाम चर्चा में हैं। वहीं दलित समुदाय से बेबी रानी मौर्य का नाम भी सामने आया है। ब्राह्मण चेहरे के तौर पर पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा, लक्ष्मीकांत वाजपेयी और केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के नामों पर विचार हो रहा है। यदि पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश को साधना चाहती है, तो जितिन प्रसाद और महेश शर्मा जैसे नेता विकल्प हो सकते हैं।

हालांकि भाजपा की रणनीति यह भी रही है कि पार्टी आमतौर पर उन नेताओं को अहम पद देती है, जिनका नाम सार्वजनिक रूप से ज्यादा चर्चा में नहीं होता। हाल ही में राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली में मुख्यमंत्री पद की नियुक्तियों ने यही साबित किया है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि मौर्य का नाम ही फाइनल है, लेकिन यह जरूर है कि वे इस रेस में सबसे आगे हैं।प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. दिनेश शर्मा ने स्पष्ट किया है कि पार्टी की एक तय प्रक्रिया होती है। पहले सभी प्रदेश इकाइयों के चुनाव कराए जाते हैं, फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होता है और उसके बाद प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति होती है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब प्रदेशों में लगभग चुनाव हो चुके हैं, इसलिए राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति किसी भी समय हो सकती है।

उत्तर प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर देरी के पीछे चार प्रमुख कारण माने जा रहे हैं पहला, नया अध्यक्ष किस जाति या वर्ग से होगा; दूसरा, क्या वह पूर्वांचल से होगा या पश्चिम यूपी से; तीसरा, क्या वह विपक्ष के पीडीए समीकरण को तोड़ पाएगा; और चौथा, क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उस नाम से सहज होंगे। सूत्रों की मानें तो पार्टी इन चारों सवालों पर गहन मंथन कर रही है और जल्द ही निर्णय लिया जाएगा।अभी तक पार्टी की रणनीति यही रही है कि 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए संगठन को पहले से तैयार किया जाए। इसीलिए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर पार्टी जल्दबाजी नहीं दिखा रही है। लेकिन यह भी सच है कि संगठनात्मक स्तर पर खालीपन लंबे समय तक नहीं चल सकता। कार्यकर्ताओं को दिशा देने के लिए प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है। और यही वजह है कि अब पार्टी पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वह जल्द से जल्द इस नियुक्ति को अंतिम रूप दे।

अगर केशव मौर्य को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है, तो भाजपा एक साथ कई निशाने साध सकेगी एक, संगठन को अनुभव और जनाधार से लैस नेतृत्व मिलेगा; दो, ओबीसी समाज को संदेश जाएगा कि पार्टी उनके भरोसे पर कायम है; और तीन, सत्ता और संगठन के बीच संतुलन बना रहेगा, जिससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को चुनौती नहीं मिलेगी।अब सबकी निगाहें दिल्ली पर हैं, जहां से भाजपा के बड़े फैसले होते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा एक बार फिर केशव मौर्य पर भरोसा जताएगी या किसी नए चेहरे को सामने लाकर चौंकाएगी। लेकिन इतना तय है कि प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति भाजपा की 2027 की रणनीति का पहला बड़ा संकेत होगी। और संभव है कि यह संकेत संगठन में नई ऊर्जा और विपक्ष को सीधी चुनौती देने की दिशा में पहला कदम हो।

Spread the love

Dimple Yadav
homeslider Raj Dharm UP

छात्रों पर लाठीचार्ज किया जाना बेहद निंदनीय एवं अलोकतांत्रिक

Dimple Yadav  समाजवादी पार्टी ने दिल्ली में सांसद डिम्पल यादव के नेतृत्व में छात्रों की आवाज उठा रहे समाजवादी पार्टी के सांसदों को गिरफ्तार करने की निंदा की। समाजवादी पार्टी ने कहा कि छात्रों पर लाठीचार्ज किया जाना बेहद निंदनीय एवं अलोकतांत्रिक है। समाजवादी पार्टी के सभी सांसद डिंपल यादव के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों से […]

Spread the love
Read More
Sealed Row House
Central UP homeslider Raj Dharm UP Uttar Pradesh

विकास प्राधिकरण के अफसरों को नहीं दिख रहा अवैध निर्माण

Sealed Row House सील रॉ हाउस और बिल्डिंग में धड़ल्ले से चल रहा निर्माण कार्य होटल से सामने खाली पड़ी जमीन पर अस्थाई निर्माण कर किया जा रहा कब्जा अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड में 15 बच्चों की जान चले जाने के बाद भी लखनऊ विकास प्राधिकरण के अधिकारी सुधरने का नाम भी ले रहे […]

Spread the love
Read More
Yogi
homeslider Raj Dharm UP

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे शुरू, छात्रों-व्यापारियों को बड़ा फायदा

Yogi  सरकार में एक और मील का पत्थर, 45 मिनट में लखनऊ से कानपुर जनता को समर्पित हुआ लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे 2018 में बनी योजना, 1648 दिनों की मेहनत के बाद सपना साकार 4500 करोड़ रुपये की परियोजना ने बदली दो महानगरों की तस्वीर नौकरीपेशा, छात्र, व्यापारी और उद्योगों को मिलेगा सबसे बड़ा लाभ उत्तर प्रदेश […]

Spread the love
Read More