DGP एक्शन मोड में, पुलिस अधीक्षकों से मांगा पाँच साल का कच्चा चिट्ठा

SC ST

SC-ST “अगर किसी आपराधिक घटना में भीड़ में SC-ST समुदाय के लोग हैं तो वहां SC-ST Act लागू नहीं होगा”

रंजन कुमार सिंह

SC-ST एक्ट के इस्तेमाल को लेकर झारखंड में बड़ा भूचाल आया हुआ है। ​झारखंड हाईकोर्ट ने ‘अली अंसारी बनाम झारखंड राज्य’ मामले में एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो कानून का खेल बदल देगा। कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अगर किसी घटना को अंजाम देने वाली भीड़ या ग्रुप में खुद कुछ लोग SC-ST समुदाय से हैं, तो वहां एट्रोसिटी एक्ट (SC-ST Act) लागू ही नहीं होगा ! ​इस लैंडमार्क फैसले के बाद अब पुलिस एक्शन में है। झारखंड के DGP ने 21 जुलाई को एक हाई-लेवल रिव्यू मीटिंग बुलाई है और सभी जिलों के SSP/SP से 6 बड़े एजेंडों पर रिपोर्ट तलब की है।

​DGP ने पुलिस कप्तानों से पूछा है,

  • पिछले 5 साल में SC-ST एक्ट के कितने मामले झूठे पाए गए?
  • जांच में ढिलाई क्यों हो रही है और कितने केस पेंडिंग हैं?
  • पीड़ितों को मुआवजा मिला या फाइलें दब गईं?

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​निचोड़: अब कानून के नाम पर फर्जीवाड़ा करना आसान नहीं होगा। पुलिस अब ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ करने के मूड में है!  यह मामला बोकारो सेक्टर-12 थाना कांड संख्या 66/2020 से जुड़ा है। एफआईआर में IPC की कई धाराओं के साथ SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(u) भी लगाई गई थी। निचली अदालत ने आरोपियों की Anticipatory Bail की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों का अवलोकन किया। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि जिस समूह पर घटना को अंजाम देने का आरोप है, उसमें कुछ लोग स्वयं SC और ST समुदाय से भी थे।

इसी आधार पर अदालत ने अपने आदेश में कहा कि  “If a group is formed in which some of the persons are the community of SC/ST, then offence of SC/ST Act does not get attracted.” सरल भाषा में समझें तो, कोर्ट का कहना था कि जिस मामले की सुनवाई हो रही थी, उसमें आरोपितों के समूह में खुद SC/ST समुदाय के लोग भी शामिल थे। इसलिए प्रथम दृष्टया अदालत ने माना कि उस विशेष मामले में SC/ST एक्ट लागू नहीं होता। अदालत ने यह भी देखा कि आरोप General and Omnibus प्रकृति के थे तथा उस समय चोट से संबंधित कोई मेडिकल रिपोर्ट रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपियों को Anticipatory Bail प्रदान कर दी। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने उस मामले के उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अग्रिम जमानत दी। इस आदेश की चर्चा आज फिर इसलिए हो रही है क्योंकि झारखंड में SC/ST एक्ट के मामलों की समीक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है और इसलिए HC के इस आदेश का बार-बार उल्लेख किया जा रहा है।

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