राजनीति, युद्ध और अधूरा सच: राख से उठते सवाल

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राजनीति, युद्ध और अधूरा सच:

प्रणय विक्रम सिंह

सात अप्रैल 2026 की वह दोपहर केवल एक तारीख नहीं थी, वह एक ऐसा क्षण था, जब शब्दों ने विश्व राजनीति की नई दिशा को छू लिया। वाशिंगटन में खड़े होकर डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि “हमने अपने सारे सैन्य उद्देश्य हासिल कर लिए हैं… पूर्ण विजय… 100 प्रतिशत।” उनके स्वर में ठहराव नहीं, ठसक थी, एक ऐसा आत्मविश्वास, जो युद्ध के बाद अक्सर विजेताओं के चेहरों पर उतर आता है। लेकिन इतिहास जानता है कि विजय का सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि वह स्वयं को पूर्ण मान लेती है। इस घोषणा के ठीक एक दिन बाद पेंटागन में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को एक ऐतिहासिक सफलता बताया। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य शक्ति को वर्षों के लिए निष्प्रभावी कर दिया गया है। उस समय यह सब सुनते हुए ऐसा लगता था मानो युद्ध समाप्त हो चुका है और परिणाम स्पष्ट है।

परंतु युद्ध की धूल जब बैठती है, तब ही उसके निशान दिखते हैं और वे निशान अक्सर बयान से अधिक बोलते हैं। ईरान की धरती पर उस युद्ध के निशान अभी भी धुएं की तरह तैर रहे हैं। टूटे हुए रनवे, जली हुई सैन्य फैक्ट्रियां और समुद्र में डूबे जहाज ये सब उस प्रचंड प्रहार की गवाही देते हैं, जो अमेरिका और उसके सहयोगी इज़राइल ने मिलकर किया। 13,000 से अधिक हमले, नौसेना का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा समाप्त, हथियार कारखानों का व्यापक विनाश और वायु रक्षा प्रणाली का लगभग ध्वंस, ड्रोन, बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल क्षमताओं को गंभीर आघात, यह किसी साधारण सैन्य अभियान का चित्र नहीं था, यह एक संरचना को जड़ से हिला देने वाला प्रहार था।

पर सबसे गहरी चोट वहां लगी, जहां आंकड़े नहीं पहुंचते, पर जख्म सबसे गहरा लगता है, मतलब शीर्ष नेतृत्व पर आघात। ईरान के कई शीर्ष सैन्य कमांडर इस संघर्ष में मारे गए। निर्णय लेने वाली वह परत, जो युद्ध के समय राष्ट्र का मस्तिष्क होती है, अचानक शून्य में बदल गई। यह स्थिति उस वटवृक्ष की तरह प्रतीत होती है, जिसकी शाखाएं भले बची हों, पर जड़ों को भीतर से कमजोर कर दिया गया हो।

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लेकिन युद्ध केवल विनाश का गणित नहीं है, यह प्रभाव का विज्ञान भी है। इसे केवल प्रहारों की संख्या से नहीं, बल्कि परिणामों की स्थिरता से आंका जाता है। और यहीं से प्रारंभ होती है वह जटिलता, जो इस युद्ध को ‘पूर्ण विजय’ के दावे से परे ले जाती है। ईरान टूटा जरूर, पर झुका नहीं। उसकी सत्ता संरचना कायम रही। और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण उसने अपने भूगोल को हथियार बना लिया। होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो वर्षों से वैश्विक व्यापार का मौन मार्ग था, अब शक्ति का प्रतीक बन गया। इस संकीर्ण जलमार्ग पर ईरान की पकड़ पहले से कहीं अधिक सशक्त हो गई। दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा अब उस दरवाजे से गुजरता है, जिसकी चाबी ईरान के हाथ में है।

ईरान अब इस मार्ग का ‘द्वारपाल’ बन चुका है। अर्थात जहां एक ओर उसकी सैन्य संरचना कमजोर हुई, वहीं उसकी सामरिक स्थिति सशक्त हुई। यह वही विरोधाभास है, जो इस युद्ध को जटिल बनाता है। और यहीं से वह अंतर स्पष्ट होने लगता है, जो विजय के उद्घोष और यथार्थ के बीच मौजूद होता है। युद्धभूमि पर घोषित सफलता, जब कूटनीतिक मेज तक पहुंचती है, तो कई ऐसे प्रश्न छोड़ जाती है, जिनसे बचा नहीं जा सकता। अमेरिका-ईरान समझौते का असफल होना केवल कूटनीतिक विफलता नहीं, बल्कि उसी यथार्थ का प्रतिबिंब है।

प्रश्न है कि जब अधिकांश शीर्ष नेतृत्व ‘शहीद’ हो गया, जब आधा मुल्क तबाह-ओ-बर्बाद हो गया, इजरायल समझौते में शामिल भी नहीं हुआ, लेबनान पर हमले जारी हैं, हमास और हिज्बुल्लाह लगातार निशाने पर हैं, तब ईरान सीजफायर की मेज पर आया क्यों? विश्व शांति के लिए? या हालात की मजबूरी? यह निर्णय By Choice था या By Force? अब इन सवालों से भी महत्वपूर्ण वह प्रश्न, जो इस पूरे युद्ध के पीछे छिपा था…परमाणु कार्यक्रम।

क्या वह समाप्त हुआ?

उच्च संवर्धित यूरेनियम अब भी ईरान के पास है। वह शांत दिखाई देने वाला तत्व, जो भविष्य की सबसे बड़ी आशंका बन सकता है, अब भी वहीं है। यह उस अंगारे की तरह है, जिसे राख से ढंक दिया गया हो, पर जो भीतर ही भीतर जलता रहता है। युद्ध के इन बड़े-बड़े विमर्शों के बीच एक और कहानी है, जो अक्सर दब जाती है। वह कहानी है इंसानों की। 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत और सैकड़ों घायल और दूसरी ओर, ईरान में 1,665 नागरिकों का जीवन समाप्त हो जाना, जिनमें 248 बच्चे थे। ये आंकड़े नहीं, अधूरी कहानियां हैं, ऐसे घरों की, जहां अब दरवाजे तो हैं, पर दस्तक देने वाला कोई नहीं। ये केवल आंकड़े नहीं, ये वे अनकहे आर्तनाद हैं, जो किसी भी विजय के उत्सव को मौन कर देते हैं। इस युद्ध ने केवल दो देशों को नहीं बदला, इसने दुनिया को भी प्रभावित किया। नाटो के भीतर मतभेद उभरे, रूस को अप्रत्यक्ष लाभ मिला और खाड़ी देशों ने अपने सुरक्षा समीकरणों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया। कुछ विशेषज्ञों ने तो यहां तक कहा कि यह युद्ध आने वाले वर्षों में परमाणु हथियारों के प्रसार का सबसे बड़ा कारण बन सकता है।

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क्योंकि यह संदेश स्पष्ट हुआ, जिसके पास परमाणु शक्ति नहीं, वही सबसे अधिक असुरक्षित है। ईरान के भीतर भी इस युद्ध की प्रतिध्वनि दूर तक जाएगी। उसके शीर्ष नेतृत्व का कमजोर होना केवल सत्ता का संकट नहीं, बल्कि विचारधारा का संकट भी है। इस युद्ध में मुस्लिम ब्रदरहुड का बुलबुला भी फूट गया। पाकिस्तान समेत विश्व के बड़े इस्लामिक गणराज्य अमेरिका के साथ नजर आए।

जब नेतृत्व टूटता है, तो केवल संरचना नहीं, विश्वास भी टूटता है। और इसी बीच, युद्ध का एक और चेहरा सामने आता है, थकान का। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इस संघर्ष में अपने सैन्य संसाधनों का व्यापक उपयोग किया है। मिसाइलें, रक्षा प्रणालियां इंटरसेप्टर आदि सबका उपयोग हुआ है। अब इन सबको पुनः तैयार करना होगा और यह पुनर्निर्माण केवल समय ही नहीं, अपार धन भी मांगेगा। इन सबके बीच भारत खड़ा है, न तो इस युद्ध का पक्षधर, न ही दर्शक मात्र।

भारत के लिए यह संघर्ष केवल एक समाचार नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा प्रश्न है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आने वाला तेल भारत की जीवनरेखा है। ऐसे में भारत का दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से संतुलित और संयमित है। वह जानता है कि युद्ध समाधान नहीं, संवाद ही स्थायित्व देता है।

तो क्या यह वास्तव में ‘पूर्ण विजय’ है?

शायद नहीं। अंततः, यह स्पष्ट होता है कि विजय का उद्घोष भले हो चुका हो, पर यथार्थ अभी भी प्रश्नों में खड़ा है। अमेरिका ने युद्धभूमि पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है, परंतु क्या उसने वह स्थिरता सुनिश्चित की है, जिसकी उसे तलाश थी? यह प्रश्न अभी भी हवा में तैर रहा है। युद्ध की कहानियां केवल जीत और हार में नहीं लिखी जातीं, वे लिखी जाती हैं राख में, रक्त में और उन सवालों में, जो समय के साथ और गहरे होते जाते हैं। और इस युद्ध की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि… विजय घोषित हो चुकी है, पर इतिहास का निर्णय अभी बाकी है।

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