
बदलते समय के साथ जहां एक ओर विकास और समृद्धि के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बेरोजगारी और आर्थिक असमानता समाज के बड़े हिस्से के लिए एक गंभीर संकट बनती जा रही है। प्रस्तुत रचना इसी विडंबना को उजागर करती है-जहां कुछ वर्ग ऐश्वर्य में डूबा है, वहीं गरीब तबका रोटी और रोजगार के लिए जूझ रहा है।
संवेदनाओं से भरी पंक्तियां
बासंती मन बासंती तन, पतझड़ में भी खिले सुमन,
कहीं मृत्यु का गरल कंठ है, कहीं जन्म का बाल रुदन।
अग-जग के हे नाथ! बताओ इतना परिवर्तन क्यों है,
कहीं अमीर करोड़ों खेलें, कहीं भूख से बेहाल तन है।
ये भी पढ़ें
बेरोजगारी की मार
इतना कठिन हुआ जीवन, जिसके पास न खेती-व्यापार,
नहीं नौकरी मिली कहीं, नेता कहते—“विकास अपार”।
रोटी को जो तरस रहे, क्या उनके बच्चे पढ़ पाएंगे?
आयुष्मान, आवास की योजनाएं क्या उन तक पहुंच पाएंगे?
ये भी पढ़ें
आज मनाई जा रही है शिव दमनक चतुर्दशी, जानें महत्व और पूजा विधि
समाज की सच्चाई
चाहे सवर्ण हों या वंचित, धर्मों में बंटे या एक समान,
इंसानियत का माहौल क्या सबको मिलेगा इस देश महान?
जिनके पास नहीं है कुछ भी, क्या वे वोट दे पाएंगे?
क्या लोकतंत्र में उनकी आवाज़ सुनी जा पाएगी?
अंदर की पीड़ा
भले तन पर वस्त्र सजे हों, मन उनका रोता है,
भविष्य की अनिश्चितता में हर दिन वह खोता है।
किसकी बात मानें, किसका साथ निभाएं,
भाषणों की चमक खाएं या पेट की आग बुझाएं?
ये भी पढ़ें
विकास बनाम वास्तविकता
नेता करते बड़े-बड़े वादे, देशभक्ति की बातें,
पर जिनके पास रोजगार नहीं, वे कैसे दिन काटें?
सड़कें बनें, उद्योग लगें—यह सब अपनी जगह सही,
पर जब रोटी ही न मिले, तो विकास अधूरा ही सही।
