मिडिल ईस्ट: ऊर्जा से ‘पानी के युद्ध’ तक: ईरान-इसराइल टकराव ने खाड़ी में बढ़ाया जल संकट, कुवैत पर हमले से हड़कंप

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मिडिल ईस्ट में ‘पानी की जंग’: ईरान-इजराइल संघर्ष का खतरनाक मोड़

नया लुक डेस्क

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध अब केवल ऊर्जा संसाधनों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह तेजी से पानी के संकट में बदलता दिख रहा है। हालिया घटनाओं ने संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में यह संघर्ष “पानी की जंग” का रूप ले सकता है। दरअसल, इज़राइल ने ईरान के खोंदाब (Khondab) स्थित हेवी वॉटर उत्पादन प्लांट को निशाना बनाकर उसे गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने भी पुष्टि की है कि यह प्लांट अब काम नहीं कर रहा है। यह प्लांट अराक के पास स्थित था और लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का केंद्र बना हुआ था। इज़राइली डिफेंस फोर्स (IDF) के अनुसार, यह प्लांट हेवी वॉटर का उत्पादन करता था, जिसका उपयोग परमाणु रिएक्टरों में होता है और इससे हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम तैयार करने की क्षमता भी जुड़ी रही है। इस हमले के बाद क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ गया।

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कुवैत पर जवाबी हमला और जल संकट की आशंका

इज़राइल के हमले के जवाब में ईरान ने कुवैत के दोहा वेस्ट पावर और वाटर डिसेलिनेशन स्टेशन को निशाना बनाया। इस हमले में एक भारतीय कामगार की मौत हो गई और प्लांट को भारी नुकसान पहुंचा।

कुवैत अपनी करीब 90% पेयजल जरूरतों के लिए समुद्री पानी को मीठा बनाने (डिसेलिनेशन) पर निर्भर है। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद 400 से अधिक डिसेलिनेशन प्लांट दुनिया के कुल मीठे किए गए पानी का लगभग 40% उत्पादन करते हैं। ऐसे में किसी भी बड़े प्लांट पर हमला पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है। हालांकि, ईरान ने इन हमलों में अपनी भूमिका से इनकार करते हुए आरोप इज़राइल पर मढ़ दिए हैं और इसे क्षेत्र को अस्थिर करने की साजिश बताया है।

पानी की जंगका खतरा

Atlantic Council की चेतावनी के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में 90% से अधिक डिसेलिनेशन उत्पादन केवल 56 प्लांट्स पर निर्भर है। इसका मतलब यह है कि कुछ प्रमुख ठिकानों को निशाना बनाकर पूरे क्षेत्र को जल संकट में धकेला जा सकता है। उपग्रह तस्वीरों में कुवैत के वाटर प्लांट को भारी नुकसान दिख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तरह के हमले जारी रहते हैं, तो लाखों लोगों के सामने पानी का संकट खड़ा हो सकता है।

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पूरी तरह निर्भर है खाड़ी क्षेत्र

मिडिल ईस्ट के कई देश पूरी तरह डिसेलिनेशन पर निर्भर हैं,

  • कतर: 100% पानी समुद्री जल से
  • कुवैत: लगभग 90%
  • सऊदी अरब: करीब 70%

इसका मतलब साफ है कि किसी भी प्लांट पर हमला सीधे नागरिक जीवन को प्रभावित करता है।

एक मिसाइल और खत्म हो सकता है पानी

विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में न तो पर्याप्त जल भंडार हैं और न ही नदियां। बारिश भी बेहद कम होती है। ऐसे में एक मिसाइल या ड्रोन हमला लाखों लोगों को पानी से वंचित कर सकता है। 2009 की एक अमेरिकी स्टडी में भी चेतावनी दी गई थी कि यदि डिसेलिनेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को नष्ट किया जाए, तो सऊदी अरब की राजधानी रियाद को एक हफ्ते के भीतर खाली करना पड़ सकता है। आज स्थिति और अधिक गंभीर हो चुकी है।

तेजी से बढ़ता सैन्य टकराव

ईरान पर आरोप है कि वह अब रणनीतिक रूप से पानी के प्लांटों को निशाना बना रहा है। सऊदी अरब ने अपने पूर्वी क्षेत्र की ओर आए ड्रोन और मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया है। इसके साथ ही होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम जलडमरूमध्यों के बंद होने की 20–25% संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा हुआ, तो स्वेज नहर से मलक्का जलडमरूमध्य तक वैश्विक व्यापार पूरी तरह प्रभावित हो सकता है।

 

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