इजरायल-ईरान युद्ध… इस आग की इंतहा क्या है…?

Untitled 14 copy 9
भौमेंद्र शुक्ल
भौमेंद्र शुक्ल
  • किसे पुकारेंगे ये मासूम… एक धमाका और 40 जिंदगी के साथ-साथ सैकड़ों सपनें तबाह…
  • पांच दर्जन के आसपास घायलों में से कौन बचेगा और कौन नहीं… किससे पूछें सवाल…?

आज इजरायल ने ईरान पर बमबारी कर मासूम 40 बच्चियों के खून से अपने हाथ को रंग लिया। वैसे सभ्यता के आरम्भ से ही मनुष्य की प्रथम ख्वाहिश रही है कि वह शांति से जीवन गुजारे, लेकिन शांति से जीवन बसर करने के लिए उसने जितनी ही कोशिश की, उतना ही वह युद्ध में फंसता चला गया। प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध और अब यह विश्व महायुद्ध दुनिया को किस मुहाने पर ले जाकर खड़ा करेगा, इसकी कल्पना मात्र से मानवता और इंसानियत अभी से ही सिहर उठी है। जर्मनी के मशहूर दार्शनिक जॉर्ज विलियम फ्रेड्रिक हेगेल ने अपने दर्शन शास्त्र में हमेशा, अपनी फलसफां में युद्ध को ‘जस्टिफाई’ किया है और इंसान की तरक्की के लिए उसे आवश्यक बताया है। हेगल की मानें तो किसी नदी का पानी स्थिर हो जाए तो उसमें कीड़े लग जाते हैं। उसी तरह एक देश, दूसरे देश पर चढ़ाई, लड़ाई नहीं करता है तो उस देश के फौजियों के देह और दिमाग में कीड़े लग जाने की पूरी सम्भावना रहती है। हेगेल की मशहूर लाइन है- ‘दि गन इज नॉट ए चांस इनवेंशन, बट दि ह्युमैनिटी नीडेड इट एंड मेड इंट एपियरेंस फोर्थविथ’। यानी कि मानवता को बंदूक की जरूरत पड़ी और उसने बंदूक का ईजाद कर लिया, ताकि वह अपने दुश्मनों को सुल्टा सके। चाहे वह दुश्मन घर का हो या बाहर का। आज इजरायल और अमेरिका ने मिलकर जो ईरान की दुर्गति शुरू की है और जहां पर पूरी दुनिया बम और बारूद के ढेर पर बैठ चुकी है, उससे तो यही लगता है कि अबकी बार अंतिम तौर पर विध्वंश होकर ही रहेगा। इसे कोई रोक नहीं सकता है। यह युद्ध उसी की साफ झलक है।

ये भी पढ़ें

पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर युद्ध जैसे हालात: रातभर हमले, दर्जनों सैनिकों की मौत का दावा

इतिहास के पन्ने इस सच्चाई के गवाह हैं कि कारण कुछ भी हो (सीमाओं की रक्षा, स्वाभिमान की लड़ाई या सामरिक संतुलन) अंत में जंग की कीमत आम इंसान ही चुकाता है। देश की सीमाएं सुरक्षित रहें, संप्रभुता अक्षुण्ण रहे और भविष्य की पीढ़ियां भयमुक्त जीवन जी सकें, इसी संकल्प के साथ राष्ट्र युद्ध का निर्णय लेते हैं। लेकिन हर बार एक प्रश्न हमारे सामने खड़ा हो जाता है। क्या मासूमों की जान लेने के लिए हम यह जंग लड़ रहे हैं? युद्ध हमेशा आंसुओं का सैलाब लेकर आता है। जंग विनाशक होता है, ये अपने पीछे खंडहर, आंसू और बिलखते परिजनों को छोड़ जाता है। ये अब तक किताबों में पढ़ा था। लेकिन जैसे ही यह खबर मोबाइल स्क्रीन पर नुमायां हुईं कि एक स्कूल पर हमला हो गया। साथी पत्रकार विनीत ने यह खबर जैसे ही शेयर की थोड़ी देर के लिए दिमाग सुन्न हो गया। आंखें मानों पथरा गईं। जुबां से कुछ निकलता, लेकिन हलक साथ नहीं दे रहा था। दिमाग चकरघिन्नी हो गया। कई सीन नुमायां हुए। उसमें एक आप भी पढ़िए।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

सुबह की घंटी बजी होगी। छोटी-छोटी मासूम बच्चियां अपने-अपने बस्ते संभालकर कतार में लगी होंगी। किसी की चोटी ठीक से बंधी होगी, किसी की नहीं। कोई अपनी सहेली से पेंसिल मांग रही होगी, कोई कॉपी पर फूल बनाते हुए मुस्कुरा रही होगी। सब अलमस्त अपने क्लास में होंगे, लेकिन तभी ‘धमाका’ हुआ होगा और सब सपने धूल-धूसरित। सीन खत्म। आगे बताने के लिए अल्फाज नहीं है। आप जोड़ लीजिए… या सोच लीजिए। लेकिन मेरा दिल आगे का सीन नहीं सोच पा रहा है। मासूमों को क्या पता था कि किताबों, कविताओं और सपनों से भरा उनका दिन अचानक युद्ध की विभीषिका में बदल जाएगा।

ये भी पढ़ें

पाक की नापाक हरकतः खुलकर आमने-सामने की जंग में आने को तैयार दो इस्लामी देश

ईरान के होरमोज़गान प्रांत के मिनाब शहर स्थित एक गर्ल्स एलिमेंट्री स्कूल पर हुए अमेरिकी-इज़रायली हमले की खबर दिल दहला देने वाली है। ईरानी सरकारी मीडिया और स्थानीय प्रशासन के हवाले से सामने आई रिपोर्टों में बताया गया है कि इस हमले में 40 से अधिक मासूम छात्राओं की मौत हो गई, जबकि दर्जनों बच्चियां घायल हैं। कुछ जिंदगी-मौत से जूझ रही हैं। जो स्कूल शिक्षा, सुरक्षा और भविष्य का प्रतीक होना चाहिए था, वह अचानक चीखों, धूल और मलबे का मैदान बन गया। रांची के वरिष्ठ पत्रकार और साथी रंजन कुमार सिंह का फोन आया, कहा- ‘दुनिया किस मुहाने पर खड़ी है, चार दर्जन बच्चियों के हत्या की खबर देखकर मन कचोट रहा है। उन मासूमों ने किसी का क्या बिगाड़ा था? दहशतगर्द ऐसा करते तो दिल न दुखता, लेकिन इजरायल ने किया, सोचकर मन बैठ रहा है।’ फोन पर बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ रहा था। तभी उन्होंने एक घटना का जिक्र कर दिया। जिसे जानकर एक मिनट के लिए ऐसा लगा कि इजरायल ने तो छोटी गलती की। इससे भी क्रूर थी वो। हमास के आतंकियों ने इजरायल में हमले के समय छह दिन, जी हां सिर्फ छह दिन के दो नवजात बच्चों को ओवन में जिंदा पकाकर, रोस्ट कर के खाया था। शायद तभी से अब तक इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का क्रोध ठंडा नहीं हुआ है, नहीं हो रहा है। ठंडा होना भी नहीं चाहिए…।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

ये भी पढ़ें

बरसों बाद सुप्रीम चिंता, पंच परमेश्वर पढ़ लीजिए जज साहब…

अब जब एपस्टिन फाइल की घटनाएं सामने आईं तब ओवन में रोस्ट करके खाने वाली सनक का निहितार्थ समझ में आया। लम्बे समय तक जवान रहने के लिए बच्चे-बच्चियों का, खासकर डरे हुए बच्चे-बच्चियों का खून पी रहे और मांस खा रहे हैं ये रसूखदार लोग। डरे हुओं का इसलिए कि डर शरीर में एक खास रसायन पैदा करता है और यही रसायन जवान रहने के लिए जिम्मेदार है। अब दोबारा लौटते हैं आज की घटना पर। ईरान में चीख-पुकार मची हुई है। हर जगह चिल्ल-पों। हाय-तौबा। रमजान का पाक महीना चल रहा है। लेकिन वो खुदा की इबादत नहीं कर पा रहे हैं। जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे हैं। जिन घरों के चिराग बुझ गए, वो क्या खाक इबादत कर पाएंगे?

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

युद्ध के नक्शे बनाने वाले रणनीतिकारों के लिए आज की घटना भले ही ‘साइड इफेक्ट’ लगे, लेकिन जिन घरों की चौखटों पर अब बस्ते टंगे रह जाएंगे, जिन मांओं की गोद खाली हो गई, जिन पिताओं की उंगलियाँ अब किसी छोटी हथेली को थाम नहीं पाएंगी। उनके लिए यह सिर्फ एक घटना नहीं, जीवन भर का दंश है। ऐसा शोक, जो कभी मिटेगा नहीं… जिसे याद कर आंसू कभी थमेंगे नहीं। आख़िर उन बच्चियों का क्या दोष था? वे तो पढ़ने गई थीं। उन्हें भूगोल में देशों की सीमाएं पढ़नी थीं। इतिहास में सभ्यताओं की कहानी जाननी थी। गणित में जोड़-घटाना सीखना था। उन्हें युद्ध का अर्थ नहीं मालूम था। उन्हें यह भी नहीं पता था कि दुनिया की राजनीति कभी-कभी बच्चों के सपनों से बड़ी हो जाती है।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

ये भी पढ़ें

न उम्र की सीमा हो… गर्लफ्रेंड के साथ होटल गया 56 साल का आदमी, दिल दे गया धोखा…

युद्ध केवल सैनिकों के बीच नहीं लड़ा जाता। यह खेतों में, घरों में, स्कूलों में और अस्पतालों में भी अपने निशान छोड़ जाता है। एक तरफ सीमा पर तैनात जवान अपनी जान हथेली पर रखकर देश की रक्षा करते हैं, तो दूसरी ओर किसी मां की गोद सूनी हो जाती है, किसी बच्चे का भविष्य अनाथ हो जाता है। गोलियों और बमों की आवाज़ केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहती, वह समाज की आत्मा तक को झकझोर देती है। यदि राष्ट्र की अखंडता और नागरिकों की सुरक्षा पर आंच आती है तो जवाब देना आवश्यक हो जाता है। परंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि युद्ध अंतिम विकल्प हो, पहला नहीं। कूटनीति, संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की संभावनाएं समाप्त हो जाने के बाद ही हथियार उठाने की नौबत आनी चाहिए। क्योंकि एक बार युद्ध छिड़ जाने के बाद उसके दुष्परिणाम पीढ़ियों तक पीछा नहीं छोड़ते।

ये भी पढ़ें

बीजेपी से नाराज ब्राह्मणों पर सभी दलों का दांव

आज के दौर में युद्ध की प्रकृति और भी भयावह हो चुकी है। आधुनिक हथियारों की मारक क्षमता इतनी व्यापक है कि सीमाएं और नागरिक क्षेत्र के बीच का फर्क मिट जाता है। तकनीकी युद्ध में ‘कोलैटरल डैमेज’ जैसे शब्द भले ही सैन्य रणनीति का हिस्सा हों, पर हकीकत में यह शब्द मासूम जिंदगियों की त्रासदी को ढंकने का प्रयास मात्र हैं। हर ‘अनचाही मौत’ के पीछे एक परिवार की पूरी दुनिया उजड़ जाती है।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

अंततः प्रश्न वही- क्या हम केवल सीमाओं की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं या इंसानियत की भी? यदि युद्ध अपरिहार्य हो, तो वह न्याय और सुरक्षा के लिए हो, न कि प्रतिशोध और विनाश के लिए। क्योंकि इतिहास उन राष्ट्रों को अधिक सम्मान देता है, जिन्होंने शक्ति के साथ-साथ संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का परिचय दिया। युद्ध कभी समाधान नहीं होता, वह केवल एक कठोर आवश्यकता बनकर सामने आता है। इसलिए हर बार जब रणभेरी बजे, हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि शांति की आवाज़ दबने न पाए। इतिहास गवाह है कि हर युद्ध अपने पीछे खंडहर, आँसू और इसी तरह की अधूरी कहानियां छोड़ जाता है। लेकिन जब गोलियों और बमों की गूंज बच्चों की हँसी को निगल जाती है, तब मानवता की पराजय सबसे साफ दिखाई देती है। युद्ध के मैदान में सैनिक मरते हैं, पर युद्ध का सबसे क्रूर चेहरा तब सामने आता है जब स्कूलों की दीवारें ढहती हैं और किताबों पर धूल जम जाती है। आज मिनाब की उन बच्चियों के नाम दुनिया की अंतरात्मा पर लिखे जाने चाहिए। यह केवल एक देश की त्रासदी नहीं, पूरी मानवता का प्रश्न है। क्या हम ऐसी दुनिया बना रहे हैं, जहां बच्चों के लिए स्कूल भी सुरक्षित नहीं रहेंगे? जब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता, तब तक हर युद्ध जीतने के बावजूद मानवता हारती रहेगी।

Spread the love

Gupt Navaratri
homeslider Religion

गुप्त नवरात्र में बन रहे हैं कई शुभ योग, जानें पूरी पूजा विधि

Gupt Navaratri आषाढ़ गुप्त नवरात्र 2026 में आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा तिथि 14 जुलाई की दोपहर से शुरू होकर 15 जुलाई की सुबह तक रहेगी। इसी आधार पर 15 जुलाई 2026 को घटस्थापना की जाएगी और इसी दिन से नवरात्र का आरंभ माना जाएगा। यह पर्व 23 जुलाई 2026 को नवमी तिथि पर समाप्त होगा। घटस्थापना […]

Spread the love
Read More
Today's Horoscope
Astrology homeslider

तुला, वश्चिक और धनु राशि वालों को आज मिलेगी खुशखबरी

आज का दिन सभी 12 राशियों के लिए अलग-अलग संकेत लेकर आया है। किसी राशि के लिए करियर और कारोबार में सफलता के योग बन रहे हैं, तो कुछ लोगों को धन, स्वास्थ्य और पारिवारिक मामलों में सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी। जानिए मेष से मीन तक सभी राशियों का दैनिक राशिफल और समझें कि […]

Spread the love
Read More
Education homeslider

सपनों की कोई उम्र नहीं! मां ने हासिल की मास्टर डिग्री, बेटी ने दूर बैठकर मनाया जश्न

Inspirational Story  : सोशल मीडिया पर इन दिनों एक भावुक कर देने वाली कहानी तेजी से वायरल हो रही है। यह कहानी सिर्फ एक मां की मास्टर डिग्री हासिल करने की नहीं, बल्कि उन तमाम संघर्षों की है जिन्हें पार करते हुए उन्होंने अपने सपनों को पूरा किया। हजारों किलोमीटर दूर दुबई में बैठी उनकी […]

Spread the love
Read More