
यह अवसर सरोजनीनगर की जनता के लिए गर्व का विषय है, और उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए सकारात्मक संकेत। लोकतंत्र की मजबूती केवल कानूनों से नहीं, बल्कि उन व्यक्तित्वों से होती है जो उन्हें जीवंत बनाते हैं। राजेश्वर सिंह का यह संचालन उसी जीवंत लोकतांत्रिक परंपरा की एक सशक्त कड़ी के रूप में देखा जाएगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दसवें दिन लखनऊ की सरोजनीनगर विधानसभा से लोकप्रिय विधायक डॉ० राजेश्वर सिंह ने अधिष्ठाता (पीठासीन अधिकारी) के रूप में सदन की कार्यवाही जिस दक्षता, संयम और प्रभावशीलता से संचालित की, वह न केवल संसदीय परंपराओं का सम्मान था, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद का उत्कृष्ट उदाहरण भी। विधानसभा का संचालन करना केवल नियम पढ़ देना या समय प्रबंधन भर नहीं है। यह एक ऐसी भूमिका है जिसमें, सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन, भावनात्मक और राजनीतिक तापमान का नियंत्रण, विषय की गंभीरता को बनाए रखना, इन सभी तत्वों का समन्वय आवश्यक होता है।
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बजट सत्र के दौरान अक्सर तीखी बहसें, आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक टकराव की स्थितियाँ बनती हैं। ऐसे में पीठासीन अधिकारी का संयम ही सदन की दिशा तय करता है। दसवें दिन की कार्यवाही में यह स्पष्ट दिखा कि राजेश्वर सिंह ने अपने प्रशासनिक अनुभव, विधिक समझ और राजनीतिक परिपक्वता का समुचित उपयोग किया। राजेश्वर सिंह की पृष्ठभूमि केवल एक जनप्रतिनिधि की नहीं है, बल्कि वे प्रशासनिक और विधिक तंत्र की गहरी समझ रखते हैं। यही कारण है कि सदन में उनकी भाषा संयमित, निर्देश स्पष्ट और निर्णय संतुलित रहे। जब विपक्ष के कुछ सदस्यों ने तीखे स्वर में अपनी बात रखी, तब उन्होंने, बीच में अनावश्यक व्यवधान ना डालते हुए, विपक्ष को पर्याप्त समय दिया। लेकिन उनके बोलने की तय समय-सीमा का पालन भी सुनिश्चित किया। यह संतुलन ही संसदीय गरिमा की पहचान है।
लोकतंत्र में बहस टकराव नहीं, बल्कि समाधान का माध्यम होती है। बजट सत्र में राज्य की वित्तीय नीतियों पर चर्चा हो रही थी, ऐसे में हर सदस्य अपनी जनता की अपेक्षाएँ सामने रखना चाहता है। राजेश्वर सिंह ने सदन को केवल औपचारिक मंच नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जीवंत संवाद का अवसर बनाया। उन्होंने कई बार सदस्यों को यह स्मरण कराया कि, “सदन की गरिमा बनाए रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।” यह वाक्य केवल औपचारिक टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कार का संकेत था। लखनऊ के सरोजनीनगर क्षेत्र से आने वाले विधायक के रूप में राजेश्वर सिंह की छवि एक सक्रिय और जनसरोकारों से जुड़े नेता की रही है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा और रोजगार जैसे विषयों पर उनकी स्पष्ट प्राथमिकताएँ रही हैं। जब वे अधिष्ठाता की कुर्सी पर बैठे, तो यह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, यह सरोजनीनगर की जनता के विश्वास का भी सम्मान था।
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उत्तर प्रदेश जैसा विशाल राज्य, जिसकी जनसंख्या कई देशों से अधिक है, वहाँ का बजट सत्र राष्ट्रीय महत्व का विषय बन जाता है। कृषि, उद्योग, बुनियादी ढाँचा, कानून-व्यवस्था, सामाजिक न्याय, हर क्षेत्र पर गहन विमर्श आवश्यक होता है। दसवें दिन की कार्यवाही में विशेष रूप से, ग्रामीण विकास योजनाएँ। शहरी अवसंरचना। महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम। युवाओं के लिए रोजगार योजनाएँ। इन मुद्दों पर चर्चा हुई। ऐसे विषयों पर बहस के दौरान भावनाएँ तीव्र होना स्वाभाविक है, किंतु संचालन की कुशलता ने वातावरण को संतुलित बनाए रखा। भारत की संसदीय परंपरा ब्रिटिश मॉडल से प्रेरित होते हुए भी अपनी विशिष्टता रखती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा की अपनी ऐतिहासिक गरिमा है। ऐसे में पीठासीन अधिकारी का दायित्व और बढ़ जाता है। राजेश्वर सिंह ने, नियमावली का सटीक हवाला दिया। सदस्यों को प्रक्रिया की जानकारी दी, अनावश्यक हंगामे को सीमित रखा यह दर्शाता है कि वे केवल राजनीतिक व्यक्ति नहीं, बल्कि संसदीय परंपराओं के सजग संरक्षक भी हैं। सदन संचालन के दौरान सबसे कठिन क्षण वह होता है जब सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हों। उस दिन भी कुछ क्षण ऐसे आए जब स्वर ऊँचे हुए। लेकिन उन्होंने किसी पक्ष विशेष का समर्थन करते हुए नहीं, बल्कि नियमों के आधार पर निर्णय दिए। यही लोकतांत्रिक निष्पक्षता है, और यही किसी भी पीठासीन अधिकारी की सबसे बड़ी कसौटी होती है। आज की राजनीति में अक्सर संवाद की कमी और ध्रुवीकरण की चर्चा होती है। ऐसे समय में यदि कोई जनप्रतिनिधि संयम, मर्यादा और संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करे, तो वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनता है। राजेश्वर सिंह का संचालन यह संदेश देता है कि, राजनीति केवल वक्तृत्व कला नहीं, बल्कि सुनने और संतुलित निर्णय लेने की क्षमता भी है।
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सरोजनीनगर से सदन तक: एक यात्रा
सरोजनीनगर क्षेत्र लखनऊ के तेजी से विकसित होते क्षेत्रों में से एक है। यहाँ शहरीकरण, औद्योगिक गतिविधियाँ और ग्रामीण परिवेश तीनों का संगम है। ऐसे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करना स्वयं में चुनौतीपूर्ण है। जब इस क्षेत्र का विधायक सदन में अधिष्ठाता बनकर कार्यवाही संचालित करता है, तो यह उस क्षेत्र के राजनीतिक महत्व और जनविश्वास का प्रतीक बन जाता है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतना नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है। असहमति का सम्मान, विविध विचारों का समावेश और नियमों का पालन, और जनहित सर्वोपरि रखना। दसवें दिन की कार्यवाही ने यह सिद्ध किया कि यदि नेतृत्व संतुलित हो, तो बहस भी रचनात्मक हो सकती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दसवें दिन का संचालन केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का सशक्त संकेत है। राजेश्वर सिंह ने यह प्रदर्शित किया कि, नेतृत्व में संयम हो, निर्णय में निष्पक्षता हो और भाषा में मर्यादा हो, तो सदन की गरिमा स्वयं सुरक्षित रहती है।
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